Lord Macaulay: प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करना जरूरी है क्योंकि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था गुलामों की फौज तैयार करती है. यहां सवाल यह है कि अगर मैकाले से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही उन्नत थी तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था से निकली महान हस्तियां नजर क्यों नहीं आतीं? तमाम भारतीय इतिहासकार, डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और नेता मैकाले की शिक्षा लागू होने के बाद ही क्यों पैदा हुए? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित होने वाली पहली पीढ़ी में भारत की ऊंची जाति के लोग ही क्यों थे? अगर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो ऊंची जाति के लोगों ने इस का बहिष्कार क्यों नहीं किया?
अयोध्या में राममंदिर ध्वजारोहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैकाले की शिक्षा नीति को ले कर कहा कि मैकाले ने मानसिक गुलामी की नींव रखी. प्रधानमंत्री ने आने वाले 10 सालों में मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करने का टारगेट रखा है. इस से यह साफ होता है कि अंगरेजों के जमाने से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी चल रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि लौर्ड मैकाले आखिर कौन थे और उन के एजुकेशन सिस्टम से मानसिक गुलामों की फौज कैसे पैदा होती है.
मैकाले की शिक्षा नीति से मानसिक गुलामों की फौज खड़ी होती है, यह नैरेटिव आरएसएस की विचारधारा की उपज है. संघ की नजर में लौर्ड मैकाले ही नहीं, विलियम बैंटिक, ज्योतिराव फुले, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी जैसे लोग विलेन ही हैं. वर्ष 1945 में नाथूराम गोडसे द्वारा संपादित पत्रिका ‘अग्रणी’ में दशहरे पर प्रकाशित एक कार्टून में रावण के 10 सिरों में 10 महान हस्तियों को दर्शाया गया था. उन में कुछ वे लोग थे जो देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे और कुछ सामाजिक क्रांति के नेता थे. उन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डा. अंबेडकर जैसे लोग शामिल थे.
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
- 24 प्रिंट मैगजीन





