Ayatollah Ali Khamenei: ईरान के धार्मिक तानाशाह अयातुल्लाह अली खामेनेई की इजराइली-अमेरिकी जेटों द्वारा उस समय मिसाइल छोड़ कर हत्या कर देना जब वे अपने देश की राजधानी तेहरान में सैनिक कमांडरों, सलाहकारों व वैज्ञानिकों के साथ मंत्रणा कर रहे थे, अचंभित करने वाली घटना है. हालांकि, इस पर ज्यादा दुख प्रकट नहीं किया जा सकता. खामेनेई ने अपने 37 साल के राज में ईरान की तेल संपदा का उपयोग जनता के भले के लिए कम, दूसरों के साथ निरर्थक युद्धों पर ज्यादा किया था.
ठीक अमेरिकी, इजराइली और ईरानी युद्ध से पहले सप्ताहों तक ईरान के शहर के शहर खामेनेई के खिलाफ उबल रहे थे. वहां की जनता सत्ता परिवर्तन और खूंखार शासन से छुटकारा पाना चाहती थी जिस ने औरतों की आजादी भी छीनी और लाखों आदमियों को भी तड़पातड़पा कर मारा.
सभ्यता का प्रतीक रहा फारस ईरान बनतेबनते एक डरावना भयावह देश बन गया था जिस की सरकार का उद्देश्य इसलाम की रक्षा करना था, जनता की सेवा नहीं.
खामेनेई ने चाहे इसलाम के लिए जो भी करने का वादा किया हो और चाहे जो भी उस की कीमत जनता से ली हो, बदले में जनता को कुछ दिया नहीं. ईरानी जनता ने जो किया वह अपने बलबूते पर किया. सरकार तो केवल धर्म की रक्षा और सैनिक शक्ति बढ़ाने में लगी रही.
सिर्फ बड़ा चोगा पहनने से कोई व्यक्ति शांति, दया, सहृदयता, हमदर्दी का प्रतीक नहीं बन जाता. सभी धर्मों के धर्मगुरु सादा जीवन बिताते दिखते हैं पर असल में उन के पास अपार शक्ति होती है जिसे शासन के साथ मिल कर वे जनता पर थोपते हैं. अयातुल्लाह अली खामेनेई इस से अलग नहीं थे. 1979 की इसलामिक क्रांति के बाद अयातुल्लाह खामेनेई की मुत्यु के बाद खामनेई ने ईरान को उन आजादियों से फिर वंचित कर डाला जिस के लिए शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन पलटा गया था. दोनों धर्मगुरुओं ने धर्म के नाम पर जनता का जम कर दोहन किया.
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