BRICS organization: ब्रिक्स जब अस्तित्व में आया था, तब उसके पीछे एक बड़ी उम्मीद थी. दुनिया में अमेरिका और पश्चिमी देशों के बढ़ते वर्चस्व को चुनौती देने के लिए विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ब्रिक्स के बहाने एक मंच पर लाया गया था, ताकि पश्चिम की दादागिरी को चुनौती दी जा सके. उसके दबाव को कम किया जा सके. भारत, रूस, चीन और ब्राजील जैसे बड़े देशों के साथ बाद में दक्षिण अफ्रीका भी जुड़ा. संदेश साफ था कि दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर फैसला सिर्फ पश्चिमी देश नहीं करेंगे.
लेकिन 20 साल बाद भी भारत सहित ब्रिक्स में शामिल तमाम देश अमेरिका के आगे दुम हिलाते ही नजर आते हैं. शीत युद्ध के बाद दुनिया में अमेरिका का दबदबा लगातार बढ़ता गया और विकासशील देशों की आवाज हमेशा कमजोर रही. ब्रिक्स पश्चिमी वर्चस्व को तोड़ने में कभी सफल नहीं हुआ. हां, इन बीस सालों में उसने अपनी एक पहचान जरूर बना ली है और नए देश लगातार इससे जुड़ रहे हैं. लेकिन केवल संगठन का बड़ा होते जाना उसकी सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता है.
गैर-पश्चिमी देशों के एक समूह के रूप में उभरने वाला ब्रिक्स जिन बड़े उद्देश्यों को लेकर शुरू हुआ था, वे अभी तक पूरे नहीं हुए हैं. मसलन, वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, संयुक्त राष्ट्र में अधिक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, आईएमएफ और विश्व बैंक में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाना और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव. इनमें से किसी भी मोर्चे पर ब्रिक्स ऐसी निर्णायक ताकत नहीं बन पाया, जिसकी वजह से पश्चिमी देशों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़े.
सबसे बड़ा सवाल डॉलर के वर्चस्व का है. ब्रिक्स के गठन के पीछे एक अहम विचार यह भी था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता से बाहर निकाला जाए. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़े और ऐसी वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था तैयार हो, जिसमें अमेरिका और पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं का दबदबा कम हो. लेकिन दो दशक बाद भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का दबदबा कायम है. ब्रिक्स अभी तक इसका कोई ऐसा मजबूत विकल्प नहीं खड़ा कर पाया है, जिसे दुनिया व्यापक स्तर पर स्वीकार करे .
ब्रिक्स में शामिल देशों के हित और राजनीतिक सोच भी एक-दूसरे से काफी अलग है. चीन और भारत के बीच सीमा विवाद है. रूस और पश्चिम के बीच युद्ध चल चुका है और उसके प्रभाव आज भी वैश्विक राजनीति पर हैं. ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं. कई सदस्य देश एक-दूसरे के करीबी साझेदार नहीं बल्कि कहीं-कहीं प्रतिद्वंद्वी भी हैं. इस संगठन में शामिल देशों की आर्थिक स्थिति, राजनीतिक व्यवस्था और विदेश नीति भी अलग-अलग है. अमीर और गरीब देशों के हित भी एक जैसे नहीं हैं. ऐसे में यह उम्मीद करना कि ये देश मिलकर पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ एक साझा रणनीति बना लेंगे, आसान नहीं है.
ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार जरूर बढ़ा है और सहयोग बढ़ाने की कोशिशें भी हो रही हैं, लेकिन अभी यह सहयोग उस स्तर तक नहीं पहुंचा है, जहां ब्रिक्स के सभी सदस्य मिलकर एक मजबूत और आत्मनिर्भर आर्थिक शक्ति बन सकें. चीन इस समूह की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है. उसके पास पूंजी, तकनीक और विशाल बाजार है. वह अगर ब्रिक्स के छोटे और कमजोर देशों में बड़े पैमाने पर निवेश और तकनीकी सहयोग करे तो इस समूह की आर्थिक ताकत काफी बढ़ सकती है, लेकिन चीन की प्राथमिकता फिलहाल अपने व्यापार और अपने आर्थिक हितों को बढ़ाने पर ज्यादा दिखाई देती है.
रूस की अर्थव्यवस्था भी युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण दबाव में है. भारत की तकनीक, पूंजी और निवेश के कई क्षेत्रों में पश्चिम पर निर्भरता खत्म ही नहीं हो रही है. इसलिए सिर्फ यह कह देना कि ब्रिक्स दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बन रहा है, हास्यास्पद बात ही है. इतने सारे विरोधाभासों के बीच एक मजबूत और एकजुट राजनीतिक मोर्चा बनाना या साझा रणनीति पर काम करके अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को दरकिनार कर पाना फिलहाल संभव नहीं है. पश्चिमी व्यवस्था की आलोचना करना आसान है, लेकिन उसके विकल्प के रूप में नई व्यवस्था खड़ी करना कहीं ज्यादा मुश्किल काम है.
फिर भी ब्रिक्स के पास कुछ ऐसे रास्ते हैं, जिन पर आगे बढ़कर वह अपनी उपयोगिता साबित कर सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रिक्स देश आपस में डिजिटल भुगतान की ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर सहमत होते हैं, जिससे स्थानीय मुद्राओं में व्यापार आसान हो जाए, तो यह एक बड़ा कदम होगा. इससे न केवल डॉलर पर निर्भरता कम करने का राजनीतिक संदेश जाएगा, बल्कि छोटे कारोबारियों के लिए भी सदस्य देशों के बीच व्यापार करना आसान होगा. इसके लिए भरोसेमंद भुगतान प्रणाली, मुद्रा विनिमय की सुविधा, बैंकिंग नेटवर्क और एक-दूसरे के वित्तीय नियमों के बीच तालमेल बनाना जरूरी है.
2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत कर रहा है. भारत को एक तरफ पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते बनाए रखने हैं और दूसरी तरफ ब्रिक्स के मंच पर विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की चुनौती है. भारत को अमेरिका और यूरोप के साथ भी संबंध रखने हैं और रूस, चीन तथा दूसरे उभरते देशों के साथ भी. ऐसे में भारत दबी जुबान भी पश्चिम विरोधी बातें नहीं कर सकता है. उसे तो पहले अपने हित साधने होंगे. भारत इतना भर कर सकता है कि वह ब्रिक्स के मंच से आईएमएफ, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर ले.
ब्रिक्स की उपलब्धि अभी तक मात्र इतनी है कि उसने गैर-पश्चिमी देशों को एक साझा मंच दिया है. लेकिन क्या केवल बैठकें करना, घोषणाएं जारी करना और हर साल सम्मेलन आयोजित करना किसी संगठन की सफलता मानी जा सकती है? ब्रिक्स का विस्तार उसकी उपलब्धि हो सकता है, लेकिन उसकी सफलता तभी मानी जाएगी जब वह दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को बदलने में वास्तविक प्रभाव पैदा करे. वरना अभी तक तो यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय मंच है, जहां हर साल अनेक देशों के नेता मिलते हैं, बढ़िया भोजन करते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं, घोषणाएं करते हैं और फिर दुनिया अपनी पुरानी राह पर चल पड़ती है. ब्रिक्स के दो दशकों का सार यही है कि वह न तो पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती दे पाया, न डॉलर का विकल्प बना पाया, न वैश्विक संस्थाओं में बड़ा सुधार कर पाया और न ही सदस्य देशों के बीच राजनीतिक मतभेद खत्म कर पाया. BRICS organization





