Azerbaijan Hijab Ban: वर्ष 2024 में ईरान की लड़कियां हिजाब को ले कर सड़कों पर उतर आई थीं, कुछ ऐसा ही प्रोटैस्ट इस समय अजरबैजान की सड़कों पर चल रहा है. लेकिन दोनों में जमीन और आसमान का अंतर है. ईरान में स्कूल और कालेजों में लड़कियों पर जबरन हिजाब थोपा गया था और हिजाब न पहनने पर मोरल पुलिसिंग की व्यवस्था की गई थी. वहीं, अजरबैजान में मामला बिलकुल उलटा है. यहां की सैकुलर सरकार ने स्कूल और कालेजों में हिजाब पहनने पर पूरी तरह रोक लगा दी है. हिजाब पहनने वाली लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद कर दिए हैं. अजरबैजान का यह फैसला कितना सही है?

अजरबैजान 97 फीसदी मुसलिम आबादी वाला देश है, फिर भी यह मुसलिम नहीं, बल्कि एक सैकुलर राष्ट्र है जो कंस्टीट्यूशन से चलता है. अजरबैजान ने पिछले महीने 2 नियम लागू किए. 21 सितंबर को छात्रों के लिए और 6 अक्टूबर को टीचरों के लिए नया ड्रैसकोड. अब कोई भी कपड़ा जो स्कूल यूनिफौर्म से अलग हो या सैक्युलर शिक्षा के सिद्धांत के खिलाफ हो, वह नहीं पहना जा सकता. हालांकि कानून में हिजाब शब्द लिखा नहीं है लेकिन इस ड्रैसकोड के लागू होने के बाद हिजाब पहनने वाली छात्राओं और टीचरों को स्कूल गेट से लौटाया जाने लगा.

इस के बाद 21 सितंबर, 2026 से पूरे अजरबैजान में प्रदर्शन शुरू हो गए. इस प्रोटैस्ट के कई वीडियो वाइरल हुए जिन में छात्राएं रोते हुए स्कूल के बाहर खड़ी हैं. अजरबैजान के गृह मंत्रालय ने सोमवार को 37 लोगों को पब्लिक और्डर बिगाड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया और उसी दिन एक्स,  टिकटौक और इन्स्टाग्राम पर भी रोक लगा दी.

इधर तुर्की, जो अजरबैजान को अपना सब से करीबी भाई देश कहता है, भड़क गया. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान के सलाहकार ओकताय साराल ने एक्स पर लिखा, ‘अजरबैजान में हिजाबी छात्राओं की शिक्षा रोकना तानाशाही है. हिजाब बाधा नहीं, आस्था की जरूरत है.” ओकताय साराल के इस बयान के बाद ही इस्तांबुल में अजरबैजान एम्बैसी के बाहर भी प्रोटैस्ट हुआ.

जवाब में अजरबैजान की सत्ताधारी पार्टी येनी अजरबैजान पार्टी ने कहा, “तुर्की का यह बयान पौपुलिस्ट और गैरजिम्मेदाराना है. इस से दोनों देशों के रिश्ते खराब होंगे. हमारे नियम समानता, धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन पर आधारित हैं. यह हमारा आंतरिक मामला है, तुर्की हमारे घर में दखल न दे.”

सवाल यह है कि इस पूरी लड़ाई में औरत कहां है? वह कहीं नहीं है. अजरबैजान की सरकार और तुर्की की सरकार दोनों मर्दों की सरकारें हैं और दोनों औरत के सिर पर अपना झंडा गाड़ना चाहती हैं. एक कहती है हिजाब उतारो तो तुम सैक्युलर हो, दूसरी कहती है हिजाब पहनो तो तुम मुसलमान हो. दोनों में औरत की मरजी, उस की शिक्षा, उस की इच्छा कहीं नहीं है.

हिजाब कोई आसमानी कपड़ा नहीं है. यह 7वीं सदी के अरब के पितृसत्तात्मक समाज का प्रोडक्ट है, जहां औरत को मर्द की नजर से बचाने के लिए उसे काले कपड़े से ढक दिया गया. कुरान की आयत 24:31 और 33:59 औरत को ढकने की बात करती हैं, न कि मर्द की नजर को कंट्रोल करने की. हिजाब का असली मकसद औरत को छिपाना था ताकि मर्द पाक रहे. यह मर्दवादी सोच आज भी वैसी ही है.

अगर कोई लड़की अपनी मरजी से हिजाब पहन रही है तो उसे शिक्षा से रोक देना ठीक तो नहीं है लेकिन सच बात यह है कि हिजाब पहनने के पीछे लड़की की मरजी से ज्यादा कट्टर मुसलिम फैमिली की कंडीशनिंग असली वजह होती है. अजरबैजान कहता है, हम सैक्युलर हैं, इसलिए यूनिफौर्म जरूरी है लेकिन सैक्युलरिज्म का मतलब यह नहीं है कि लड़की को स्कूल से ही निकाल दो. हिजाब बैन के नाम पर लड़कियों ने स्कूल छोड़ दिया, उन का ड्रौपआउट बढ़ गया. यह सैक्युलरिज्म नहीं, स्टेट पितृसत्ता है. एक पितृसत्ता कहती है ढको, दूसरी कहती है उतारो, दोनों में कंट्रोल मर्द का ही है.

तुर्की का पक्ष और भी पाखंडी है. एर्दोगान की सरकार खुद तुर्की में हिजाब को राजनीतिक हथियार बनाती है. तुर्की में जब दूसरी सरकार थी तो उस ने स्कूलों, कालेजों में हिजाब कंपलसरी किया था तब एर्दोगान की पार्टी ने उस का विरोध किया था क्योंकि तब हिजाब से वोट मिलता था. आज अजरबैजान हिजाब बैन कर रहा है तो तुर्की विरोध कर रहा है क्योंकि उसे मुसलिम दुनिया का नेता बनना है. असल में तो ओकताय साराल को अजरबैजान की लड़कियों की शिक्षा की चिंता नहीं है, उसे तुर्की में इसलामिस्ट वोट की चिंता है. अगर चिंता होती तो तुर्की में जो लड़कियां हिजाब नहीं पहनना चाहतीं, उन्हें परिवार द्वारा जबरन पहनाए जाने पर भी वे इतना ही बोलते.

अजरबैजान का सैक्युलरिज्म भी आधाअधूरा है. संविधान के अनुच्छेद 7 में देश को सैक्युलर कहा गया है, अनुच्छेद 18 में धर्म और राज्य को अलग कहा गया है. लेकिन इसी संविधान के अनुच्छेद 48 में आस्था की स्वतंत्रता भी दी गई है. मतलब, दोनों चीजें एकसाथ हैं. फिर आप कैसे तय करोगे कि हिजाब सैलक्युलर शिक्षा के खिलाफ है? असल में तो अजरबैजान की सरकार का असली डर हिजाब नहीं, ईरान है. अजरबैजान की मीडिया में प्रदर्शनकारियों को ईरानी एजेंट कहा जा रहा है क्योंकि अजरबैजान को डर है कि ईरान जैसा इसलामिक कट्टरवाद यहां न फैल जाए.

दमन का रास्ता सैकुलरिज्म का हिस्सा नहीं है. अजरबैजान को हिजाब बैन के नाम पर लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद कर देना सैकुलर रास्ता नहीं है. हिजाब थोपने से पहले स्कूलकालेज की लड़कियों को भरोसे में लेना ज्यादा जरूरी है. अजरबैजान को पहले लड़कियों की आवाज सुननी चाहिए, न कि बाकू में बैठे मंत्रियों की और अंकारा में बैठे मौलानाओं की. जब तक औरत की शिक्षा और उस की चौइस सैंटर में नहीं होगी तब तक यह लड़ाई सैक्युलरिज्म बनाम इसलाम नहीं, बल्कि एक पितृसत्ता बनाम दूसरी पितृसत्ता की रहेगी और नुकसान सिर्फ लड़कियों का होगा. Azerbaijan Hijab Ban

 

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