Prime Minister Narendra Modi: अभी हाल ही में आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री ने स्टूडेंट्स से कहा कि सिर्फ सवाल मत पूछिए, बल्कि सवालों के जवाब खोजने का साहस भी रखिए. सवाल पूछो क्योंकि जिज्ञासा ही विज्ञान और लोकतंत्र की रीढ़ है. प्रधानमंत्री की यह बात सुनकर लगा कि शायद सत्ता को अब एहसास हुआ है कि बिना सवाल के समाज आगे नहीं बढ़ सकता लेकिन गहराई से देखें तो यह भी जुमला ही साबित होता है क्योंकि बीजेपी के पिछले 12 साल का रिकॉर्ड सवाल पूछने वाले की जबान पर ताला लगाने का ही रहा है इसलिए प्रधानमंत्री की कथनी और करनी में बड़ा फर्क नजर आता है. सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने अब तक खुद कितने सवालों का सामना किया है? क्या धर्म की राजनीती करने वाले प्रधानमंत्री धर्म से जुड़े सवालों का जवाब दे सकते हैँ?

दुनिया का इतिहास यही रहा है कि जहां भी सवाल बंद हुआ, वहां इंसान का विकास भी रुक गया. धर्म और विज्ञान में, राजतंत्र और लोकतंत्र में सबसे बड़ा अंतर सिर्फ इतना ही है धर्म और राजतंत्र में सवालों के लिए जगह नहीं होती जबकि विज्ञान और डेमोक्रेसी की बुनियाद ही सवालों पर टिकी होती है. धर्म पर सवाल उठते ही नास्तिक और विधर्मी होने का ठप्पा लग जाता है वहीं राजा से सवाल पूछने पर देशद्रोही साबित कर दिया जाता है.

धर्म ने कहा मनुष्य को भगवान ने बनाया. इस पर सवाल करना पाप हो जाता है. राजा ने कह दिया मैं बायोलॉजिकल तरीके से पैदा नहीं हुआ. इस पर सवाल करना देशद्रोह हो जाता है. धर्म से सवाल करना हो तो यह पूछा जा सकता है कि ईश्वर ने मनुष्य को कैसे बनाया? इस सवाल के जवाब में धर्म के पास पचासों कहानियाँ तैयार हैँ लेकिन धर्म से यह प्रश्न नहीं पूछा जा सकता कि ईश्वर ने मनुष्य को बनाया इसका सबूत क्या है? इसी तरह अगर राजा से सवाल पूछना हो तो यह पूछा जा सकता है कि राजा आम चूसकर खाता है या काटकर खाता है लेकिन यह नहीं पूछा जा सकता कि उसके राज में बच्चों कि शिक्षा बर्बाद क्यों है?

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