International Politics: अमेरिका +इजरायल के ईरान से चल रहे वार ने कई मिथ तोड़े हैं. सोशल मीडिया पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जो कट्टर चर्च फौलोअर्स हैं उन्हें बुरी तरह शौक लगा है कि ईरान जिसे इंटरनैट की एबीसीडी नहीं आती होगी, कैसे इस तरह की मिसाइलें बना चुका था कि अमेरिका की टैं बोल गई.

इस की जिम्मेदारी पूरी तरह अमेरिकी पढ़ाईलिखाई और नौलेज एक्वीजीशन में घुसी इंटरनैट रिवोल्यूशन है. इंटरनैट ने हर हाथ से किताब छीन ली और उसे मोबाइल पकड़ा दिया जिस में नौलेज अपनेआप नहीं आती, ढूंढ़ो, तो दिखती है. अपनेआप तो गौसिप आता है, ईमेल आते हैं, ग्रुप मैसेज आते हैं, चैट होती है जिस में न लैंग्वेज होती है न लौजिक.

ईरान कोई खुले दिमाग वाला देश नहीं है पर वह चाहे धर्म का गुलाम हो, इंटरनैट का गुलाम नहीं है. ईरान ने इंटरनैंट का इस्तेमाल मैसेजिंग के लिए किया वरना उन्होंने आपसी किताबें पढ़नेलिखने के सदियों पुराने ट्रैडिशन को जिंदा रखा है.

पियू रिसर्च ने पाया था कि अमेरिकी हर समय सोशल मीडिया से जुड़े रहते हैं और दिन में 5-6 घंटे वे औनलाइन रहते हैं. उन का पेनेट्रेशन 100 परसैंट है. यानी, सभी अमेरिकियों के पास इंटरनैट है. जबकि, ईरानी एक घंटा भी इंटरनैट पर नहीं रहते. वहां जिन्हें इंटरनैट कनैक्शन मिल सकता है उन में से भी 70 फीसदी केवल बात करने लिए मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं.

भारत में अब सोशल मीडिया का इस्तेमाल देशनिर्माण के लिए नहीं बल्कि धर्मप्रचार के लिए हो रहा है और जम कर धर्म का धंधा हो रहा है. भारत में इंटरनैट लोगों को 15वीं सैंचुरी में ले जा रहा है. अमेरिका का पेंटागन सोच रहा था कि कट्टरपंथी ईरान इंडियंस की तरह ही होगा. ईरानियों ने फौरन वार इक्विपमैंट खरीदे, उन्हें खोल कर सम झा, इंप्रूव किया और अपने पहाड़ों का एडवांटेज लेते हुए उन्हें गुफाओं में बनाना शुरू कर दिया.

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