ECI: ऐसे वक़्त में जब पूरा देश चुनाव आयोग और बीजेपी की मिलीभगत को समझ चुका है और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़को पर उतर आया है, देश के 42 पूर्व जजों और 272 इंटेक्चुअल्स ने चुनाव आयोग के बचाव में खुला पत्र लिखा है और इस पत्र में इन्होने चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिशों पर चिंता जताई है. सवाल यह है कि ये बुद्धिजीवी आखिर हैं कौन? और क्या सच में इन्हें लोकतंत्र की चिंता है?
42 पूर्व जजों और 272 नागरिकों ने 7 अक्टूबर को खुला पत्र लिखकर चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिशों पर चिंता जताई है. इन्होंने इस खुले पत्र में लिखा है कि “पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी और विपक्षी दलों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग, वोट चोरी और EVM पर बिना सबूत के आरोप लगाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. संस्थाओं की आलोचना करना हर किसी का लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन उन्हें चोर और समझौता करने वाला बताकर बदनाम करना लोकतान्त्रिक अधिकार नहीं है.एसआईआर की प्रक्रिया तो Representation of the People Act 1950 की धारा 21(3) के तहत वोटर लिस्ट को साफ और सटीक बनाने की कानूनी प्रक्रिया है. हारने पर EVM को दोष देना और जीतने पर उसी से सरकार बना लेना जनता के भरोसे को तोड़ने जैसा है. भरोसा ही लोकतंत्र की मुद्रा है. अगर चुनावों की विश्वसनीयता पर ही रोज सवाल उठाए जाएंगे तो अराजकता बढ़ेगी और देश का नुकसान होगा”
42 पूर्व जजों और 272 बुद्धिजीवियों ने लोकतंत्र की बात करते हुए जो खुला पत्र लिखा है असल में तो यह पत्र लोकतंत्र की चिंता के नाम पर सवाल पूछने के अधिकार को ही बदनाम करने की कोशिश है. इनसे कोई पूछे कि चुनाव आयोग पर सवाल उठाना उसे बदनाम करने की साजिश कैसे हो सकती है? चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और जब उसकी कार्यप्रणाली ही शक के दायरे में हो तो सवाल उठाना लोकतंत्र के खिलाफ कैसे है?
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