श्रम कानून में बदलाव की वजह उद्योगपतियों को सहूलियत देना नहीं बल्कि मनुवादी सोंच का विकास करके सांमतवादी व्यवस्था को कायम करना है. बसपा जैसे जिन राजनीतिक दलों को इसका विरोध करना चाहिये वह केवल बयानों तक सीमित रह गये है. समाज के जिस बहुजन समाज के अधिकारों की रक्षा के लिये बसपा का गठन हुआ था वह खुद अब मौन है. इससे बेखौफ मनुवादी सोंच रखने वालों के हौसले बुलंद है. वह अपने राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के एजेंडे पर आगे बढ रहे है. मजदूरों के अधिकारों की रक्षा और रोजगार देने के नाम पर दलित समाज को फिर से बुधंआ मजदूरी के दलदल में ढकेलने की मूहिम चल रही है.

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