रात को चांद मेरी छत पे टहलने आया
उसने देखा बड़ा गुमसुम, बड़ा उदास मुझे
पास आकर बड़े हौले से दी आवाज़ मुझे
मैं उसे देखकर हैरान हुई जाती थी
मेरे सीने में मेरी सांस रुकी जाती थी
उसकी आंखें चमक रही थीं इक शरारत में
मुस्कुराया वो मुझे देखकर इस हालत में
फिर बढ़ाते हुए मेरी तरफ़ वो दस्ते-अदब
पूछ बैठा मेरी ख़ामोश तबीयत का सबब
मैं जो रहती थी ज़माने के छलावों से अलग
झूठे लोगों से, फ़रेबों से, दिखावों से अलग
मैंने पाया ही नहीं भीड़ के क़ाबिल खुद को
रास आयी फ़क़त तन्हाई की महफ़िल मुझको
इससे पहले कि ये बातें मैं उससे कह पाती
और कुछ देर मैं दुनिया से अलग रह पाती
दिल में उठते हुए तूफ़ान थम गये जैसे
शब्द होंठों पे थरथरा के जम गये जैसे
उसकी बाहों में गिरफ़्तार हो चुकी थी मैं
एक दुल्हन-सी लालो-ज़ार हो चुकी थी मैं
रात को चांद मेरी छत पे टहलने आया

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