इधर धार्मिक संगठन फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ के पोस्टर जला रहे थे उधर जनता थिएटर में फिल्म को चटखारे ले कर देख रही थी. देखतेदेखते फिल्म ने करोड़ों की कमाई कर 100 करोड़ी क्लब में एंट्री भी मार ली. ये बेचारे फिल्म पर फतवा जारी कर उसे बैन करने का सपना देखते रह गए. इन्हें पता ही नहीं चला कि अंजाने में जो फिल्म की फ्री में पब्लिसिटी की है, उस से फिल्म की कमाई में इजाफा ही हुआ है.
पब्लिक को सालों पुरानी रामलीला नहीं बल्कि आज की बिंदास और बोल्ड ‘…राम-लीला’ ज्यादा पसंद है.
बौलीवुड में रितिक रोशन बेहद सुलझे हुए इंसान माने जाते हैं. लेकिन निजी जिंदगी में बच्चों के चहेते सुपरहीरो ‘कृष’ और उन की पत्नी के बीच रिश्ते कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं. रितिक ने साफ कर दिया है कि उन की पत्नी सुजेन उन से तलाक ले रही हैं. 17 साल पुराने इस रिश्ते के ऐसी स्थिति तक पहुंचने के कारणों पर दोनों मुंह नहीं खोल रहे. बहरहाल, ऐसी बातें इश्क और मुश्क की तरह छिपी नहीं रह पातीं.
आमिर खान साल में इक्कादुक्का फिल्में भले ही करते हों लेकिन पब्लिसिटी के मामले में कई बिजी कलाकारों को भी पीछे छोड़ देते हैं. कभी सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी से चर्चा बटोरते हैं तो कभी बयानबाजी से. इस बार वे होमो- सैक्सुअल समुदाय के लिए खासे परेशान दिख रहे हैं. हुआ यों कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 11 दिसंबर को समलैंगिक रिश्तों को अपराध करार दिया गया है. इस आदेश पर आमिर अलगअलग मंचों पर निराशा व्यक्त करते फिर रहे हैं. उन के मुताबिक, न्यायालय का यह आदेश मानवाधिकारों का उल्लंघन है. अब आमिर आने वाले समय में इस समुदाय विशेष पर कोई फिल्म या सीरियलबाजी करें तो चौंकना नहीं चाहिए.
किसी हौलीवुड के एक्शन सीन जैसा ही हादसा हुआ. जब तेज स्पीड से पौल वाकर की कार पेड़ से टकराई और पलभर में जल कर राख हो गई. गौरतलब है कि पौल वाकर की 30 नवंबर को नौर्थ लास ऐंजिलस में एक कार ऐक्सिडैंट में मौत हो गई. हौलीवुड की सुपरहिट फिल्म सीरीज फास्ट ऐंड फ्यूरियस से पौपुलर हुए 40 वर्षीय पौल वाकर किसी इवैंट के लिए निकले थे. लेकिन जरूरत से ज्यादा स्पीड के चलते कार ने ऐसा नियंत्रण खोया कि यह उन का आखिरी सफर बन गया. पौल 25 से ज्यादा फिल्मों और दर्जनभर टीवी प्रोग्राम्स में काम कर चुके थे. पिछले दिनों पौल फास्ट ऐंड फ्यूरियस 7 में काम कर रहे थे. इस हादसे के चलते फिल्म फिलहाल अधर में लटक गई है.
साल का आखिरी महीना शादी का सीजन कहा जा सकता है. इस सीजन में मिस इंडिया वर्ल्ड और बौलीवुड ऐक्ट्रैस सयाली भगत ने मुंबई के एक होटल में अपने फैमिली फ्रैंड और उद्यमी नवनीत प्रताप के साथ सात फेरे लिए. आम फिल्मी शादियों की तरह उन की शादी में बौलीवुड का कोई चेहरा नजर नहीं आया.
सयाली ने 2007 में आई फिल्म ‘द ट्रेन’ में इमरान हाशमी के साथ अपना फिल्मी कैरियर शुरू किया था लेकिन उस के बाद उन्हें खास काम नहीं मिला. इस बीच उन के अफेयर और कंट्रोवर्सी जरूर सुर्खियां बनते रहे. सयाली के अलावा इस माह फिल्म ‘रागिनी एमएमएस’ की अभिनेत्री कैनाज मोतीवाला ने भी शादी कर अपने लगभग खत्म कैरियर को अलविदा कह दिया.
निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने अपनी फिल्म ‘बुलेट राजा’ में गोलियों की धांयधांय तो खूब कराई है परंतु निशाना लगाने में वे बारबार चूकते नजर आए हैं. फिल्म को बिकाऊ बनाने के लिए उन्होंने इस में मसाले डाले हैं. अगर हम उन की पिछली फिल्मों ‘पान सिंह तोमर’ और ‘साहेब, बीवी और गैंगस्टर’ पर नजर डालें तो पाएंगे कि उन फिल्मों में एक कलात्मकता थी, बाकायदा कहानी थी, मगर इस फिल्म में सिर्फ गोलियों की गूंज के अलावा कुछ नहीं है.
फिल्म की पृष्ठभूमि में तथाकथित उत्तर प्रदेश की राजनीति है जो पूरी तरह बनावटी है. राजा मिश्रा (सैफ अली खान) की लखनऊ शहर में रुद्र (जिमी शेरगिल) से मुलाकात होती है, जो एक कूरियर कंपनी में नौकरी करता है. दोनों में दोस्ती हो जाती है. एक दिन रुद्र के घर उस के चाचा परशुराम (शरत सक्सेना) के परिवार वालों पर एक बाहुबली अखंडवीर के आदमी हमला कर देते हैं. राजा और रुद्र मोरचा संभालते हैं. परशुराम उन्हें जेल से बाहर निकलवाता है. दोनों परशुराम की सेना में शामिल हो जाते हैं. परशुराम के साथ बरसों से रह रहा लल्लन (चंकी पांडे) धोखे से परशुराम की हत्या कर देता है. अब राजा और रुद्र लल्लन को मार डालते हैं. दोनों एक पावरफुल मिनिस्टर रामबाबू (राज बब्बर) से जुड़ जाते हैं और एक फाइनैंसर बजाज (गुलशन ग्रोवर) को मार डालते हैं.
यहां उन की मुलाकात एक युवती मिताली (सोनाक्षी सिन्हा) से होती है. राजा उस से प्यार कर बैठता है और उस के साथ कोलकाता चला जाता है. इधर, एक नामी गुंडा सुमेर यादव (रवि किशन) रुद्र को मार डालता है. पता लगने पर राजा वापस लखनऊ लौटता है. शहर में उस का खौफ पैदा हो जाता है. राजा सुमेर यादव को मार कर बदला लेता है. अब राजनीतिक दबाव में आ कर रामबाबू इंस्पैक्टर अरुण सिंह (विद्युत जामवाल) को राजा को मारने के लिए भेजता है. वह राजा को घेर कर उस पर गोलियां चलाता है और उसे मरा जान कर चला जाता है. उधर, राजा फिर से उठ कर खड़ा होता है.
फिल्म की यह कहानी और पटकथा स्वयं तिग्मांशु धूलिया ने लिखी है. फिल्म में किरदार बहुत ज्यादा हैं. कौन क्या कर रहा है, समझने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ता है. फिल्म की गति काफी तेज रखी गई है, खासकर मध्यांतर के बाद. क्लाइमैक्स अटपटा है.
जिन दर्शकों ने सैफ अली खान की ‘ओमकारा’ फिल्म देखी होगी उन्हें इस फिल्म में सैफ का किरदार वैसा ही लगेगा. जिमी शेरगिल के साथ उस की ट्यूनिंग काफी अच्छी रही है. जिमी शेरगिल भी जंचा है. मगर फिल्म में उस के मरते ही जैसे फिल्म की भी जान निकल जाती है.
सोनाक्षी सिन्हा के हिस्से में 2 गाने और इतराना भर ही आया है. वह आई और ‘तमंचे पे डिस्को’ किया बस. माही गिल ने एक बार फिर सैक्सी अंदाज में ‘डौंट टच माई बौडी’ गाने पर परफौर्म किया है. विद्युत जामवाल को अभी ऐक्ंिटग सीखनी होगी. वैसे उस ने ऐक्शन सीन अच्छे कर लिए हैं.
फिल्म के संवाद अच्छे हैं, जैसे ‘ब्राह्मण रूठा तो रावण…’ और ‘हम आएंगे तो गरमी बढ़ाएंगे.’ फिल्म में गाने ठूंसे गए लगते हैं. फिर भी 2 गाने ‘तमंचे पे डिस्को’ और ‘डौंट टच माई बौडी’ म्यूजिक लवर्स की हिट लिस्ट में हैं. छायांकन अच्छा है.
‘राउडी राठौड़’ और ‘वांटेड’ जैसी हिट फिल्में देने वाले दक्षिण भारत के निर्देशक प्रभुदेवा ने इस बार लंबे समय से फिल्मों में असफल हो रहे शाहिद कपूर पर अपना दांव खेला है. प्रभुदेवा को उम्मीद थी कि एक बार फिर वह जीत की हैट्रिक बनाएगा मगर अफसोस, प्रभुदेवा का यह लंगड़ा घोड़ा फिल्म ‘आर राजकुमार’ में भाग नहीं सका है.
शाहिद कपूर ने इस फिल्म में जम कर डांस किए हैं. सुपरहीरो बनने की कोशिश की है, खूब ऐक्शन किया है, हीरोइन को पटाने के लिए छिछोरी हरकतें की हैं, पर वह जम नहीं पाया है. फिल्म में उस का लुक एक फटीचर, दढि़यल, पतलेदुबले, मरियल से लड़के का है. उसे इतना नाटकीय दिखाया गया है कि वह अकेले ही 100-100 गुंडों का सफाया कर देता है, बारबार मरणासन्न हो कर भी उठ खड़ा होता है और एक ही घूंसे से विलेन को मार डालता है.
प्रभुदेवा ने इस फिल्म को 70-80 के दशक की फिल्मों जैसा बनाया है. मनमोहन देसाई ने इस तरह की फिल्में खूब बनाई हैं. फिल्म की कहानी, पटकथा खुद प्रभुदेवा ने लिखी है. कहानी का आलम तो यह है कि आप ढूंढ़ते रह जाओगे कि कहानी है क्या. फिर भी हम आप को बता देते हैं. राजकुमार उर्फ रोमियो (शाहिद कपूर) धरतीपुर नाम के एक काल्पनिक गांव में आता है, जहां शिवराज (सोनू सूद) और परमार (आशीष विद्यार्थी) अफीम की खेती करते हैं और उस की तस्करी करते हैं. रोमियो शिवराज का माल लुटने से बचा कर उस का विश्वासपात्र बन जाता है. एक दिन रोमियो, परमार की भतीजी चंदा (सोनाक्षी सिन्हा) को देखता है तो उस पर लट्टू हो जाता है. दोनों में प्यार हो जाता है. इधर शिवराज चंदा के साथ शादी करने के लिए परमार से हाथ मिला लेता है. अब शिवराज और रोमियो के बीच दुश्मनी हो जाती है. शिवराज के गुंडे रोमियो को मार डालना चाहते हैं परंतु रोमियो अकेले ही शिवराज और उस के गुंडों को मार कर चंदा का हाथ थाम लेता है.
फिल्म की विशेषता है इस के डांस और गाने. प्रभुदेवा खुद भी डांस डायरैक्टर हैं. उन्होंने पूरा ध्यान डांस और गानों पर दिया है. ‘एबीसी पढ़ ली बहुत अब करूंगी तेरे साथ गंदी बात…गंदी बात’, ‘साड़ी के फौल का कभी मैच किया रे’ गीत काफी अच्छे बन पड़े हैं. एक गाने में विलेन सोनू सूद भी खूब नाचा है. प्रीतम चक्रवर्ती ने अच्छा म्यूजिक दिया है.
प्रभुदेवा ने ऐक्शन पर भी काफी ध्यान दिया है. उन्होंने इस फिल्म में वही मसाला डाला है जो ‘राउडी राठौड़’ में डाला था. इस फिल्म से यह तो साफ हो गया है कि शाहिद कपूर केवल अपने कंधे के सहारे किसी फिल्म को खींच नहीं सकता. सोनाक्षी सिन्हा ने वही सब किया है जो वह ‘राउडी राठौड़’ में कर चुकी है. इस बार उस ने अपने पिता वाले डायलौग ‘खामोश’ को दोहराया है.
जिंदगी में अगर कोई ट्रेजेडी हो जाए तो उसे याद करकर के दुखी होने के बजाय जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए. किसी प्रियजन के बिछुड़ जाने के बाद बजाय उदास रहने और डिप्रैशन ओढ़ लेने के इंसान को सहज हो जाना चाहिए. जाने वाला तो चला गया, उस के साथ आप की जिंदगी खत्म नहीं हो जाती. जीवन तो चलता रहता है. यही संदेश देती है फिल्म ‘क्लब 60’.
60 साल या उस से ज्यादा उम्र के लोगों के जीवन पर बनी इस फिल्म में कमर्शियल ऐंगल नहीं है, फिर भी यह दर्शकों को काफी हद तक बांधे रखती है. निर्देशक ने फिल्म में संतुलन बनाए रखा है. एक तरफ तो उस ने प्रमुख किरदारों के जीवन की त्रासदी को दिखाया है, दूसरी तरफ क्लब में रोजाना मिलते, टैनिस खेलते 5 ऐसे 60 साल के दोस्तों को दिखाया है जो न सिर्फ क्लब में खेलने आते हैं वरन आपस में हंसीमजाक भी करते हैं, एकदूसरे के सुखदुख में भागीदार भी बनते हैं. उन सब की अपनीअपनी त्रासदी है, मगर वे बीते कल को भूल कर आज में जीते हैं. वे एकदूसरे को छेड़ते हैं, एकदूसरे से झगड़ते हैं. सबों के जीवन में गम होते हुए भी वे गमों से दूर हैं.
‘क्लब 60’ शहरी जीवन की फिल्म है और जीवन के प्रति पौजिटिव नजरिया दर्शाती है. इस तरह की अच्छी फिल्में यदाकदा ही बनती हैं. निर्देशक ने अपनी बात खूबसूरती से कही है.
इस फिल्म की कहानी एक कपल 60 वर्षीय डा. तारिक शेख (फारूक शेख) और 52 वर्षीय डा. सायरा शेख (सारिका) से शुरू होती है. उन का युवा बेटा इकबाल शेख अमेरिका में पढ़ने जाता है. वहां एक सिरफिरे द्वारा की गई गोलीबारी में उस की मौत हो जाती है. तारिक और सारिका पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है. डिप्रैशन में आ कर तारिक अपनी जान देने की कोशिश करता है. तभी उन की जिंदगी में उन्हीं की बिल्डिंग में रहने वाला मनूभाई शाह (रघुबीर यादव) आता है. वह बिन बुलाए मेहमान की तरह आता है और तारिक व सायरा की जिंदगी में हलचल मचा जाता है. वह तारिक को ‘क्लब 60’ जौइन करने को कहता है.
क्लब 60 में मनूभाई शाह के कुछ और दोस्त भी हैं. एक है जय मनसुखानी (सतीश कौशिक). उस का बेटा अपनी पत्नी व बेटे के साथ अमीर ससुराल में घरजंवाई बन कर रहता है. दूसरा है जफर भाई (टीनू आनंद). उस की बीवी व बेटा उसे अकेला छोड़ कर अमेरिका जा बसे हैं. एक मिलिट्री से रिटायर्ड ढिल्लन (शरत सक्सेना) है. उस की बीवी उसे छोड़ कर प्रेमी के साथ चली गई है. एक रिटायर्ड इनकम टैक्स अफसर मिस्टर सिन्हा है जिस की पत्नी हर वक्त व्हीलचेयर पर बैठी रहती है और बेटे की मौत हो चुकी है.
मनूभाई डा. तारिक को क्लब का मैंबर बनवा कर रोजाना उसे क्लब लाता है. धीरेधीरे डा. तारिक में जीने की ललक पैदा होने लगती है और वह बेटे का गम भुला कर उन्हीं दोस्तों में रमने लगता है. अचानक एक दिन मनू भाई शाह को अटैक पड़ता है. उसे बे्रन हेमरेज हो जाता है. डा. सायरा अपने पति को मनू भाई शाह का औपरेशन करने को कहती है. वह उस में आत्मविश्वास पैदा करती है. डा. तारिक औपरेशन करते हैं और मनूभाई शाह बच जाता है.
इन सभी किरदारों को एकसूत्र में बांधने का काम मनूभाई शाह के किरदार ने किया है. इस किरदार की भूमिका में रघुबीर यादव ने कमाल की ऐक्ंिटग की है. निर्देशक ने उसे जिंदादिल इंसान दिखाया है जो मौका मिलने पर किसी से भी फ्लर्ट कर लेता है. उस की टीशर्ट्स पर ‘सैक्सी’ लिखा रहता है. यहां तक कि वह अपने बिस्तर में एक कौलगर्ल से मजे भी लेता है. वह अपने दुख को भुला चुका है. उस के परिवार की एक प्लेन दुर्घटना में मौत हो चुकी है. निर्देशक को कम से कम मनूभाई शाह के एक कौलगर्ल के साथ बैडरूम सीन से बचना चाहिए था.
निर्देशक ने हर कलाकार से बेहतर काम लिया है. फारूक शेख और सारिका का काम सब से अच्छा है. फिल्म के संवाद अच्छे हैं. एक किरदार जफर भाई से गवाया गया गीत ‘काश हम तुम मिले नहीं होते’ अच्छा बन पड़ा है. फिल्म का छायांकन अच्छा है.