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प्रीति की फजीहत

पंजाबी हस्ती हरभजन मान को चैक बाउंस होने के मामले में कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है. इस से पहले भी प्रीति जिंटा को चैक बाउंस के लंबे केस में उलझना पड़ा था. दरअसल, कुछ साल पहले प्रीति ने एक फिल्म का निर्माण किया था जिस की पटकथा अब्बास टायरवाला ने लिखी थी. जब अब्बास को प्रीति ने पेमैंट का चैक दिया तो वह बाउंस हो गया. इस मामले को ले कर अब्बास ने केस कर दिया. बहरहाल कुछ दिन पहले ही शहर की एक मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट अदालत ने अभिनेत्री प्रीति जिंटा को एक पटकथा लेखक द्वारा दायर चैक बाउंस के मामले में बरी कर दिया. उन के वकील ने अदालत में दलील दी कि चैक बिना बताए जमा किया गया. अदालत ने इस दावे को स्वीकार कर लिया. लेकिन प्रीति की जो फजीहत होनी थी हो ही गई.

नो जोक्स, प्लीज

अभिनेता अभिषेक बच्चन इन दिनों सोशल मीडिया में जम कर कोसे जा रहे हैं. कोई उन्हें सब से कम प्रसिद्ध सितारा बता रहा है तो कोई बेरोजगार. पिछले दिनों जब अभिषेक बच्चन भारतपाक का क्रिकेट मैच देखने कोलकाता पहुंचे तो उन की उपस्थिति को ले कर जम कर ट्विटर पर मजाक उड़ा. कहा गया कि इतनी भी बेरोजगारी ठीक नहीं कि हर मैच देखने पहुंच जाओ.

हालांकि अभिषेक बच्चन अपने सैलिब्रिटी स्टेटस का मजाक उड़ते देख चुप नहीं रहे और अपने चिरपरिचित अंदाज में ट्विटर पर उन पर कसे जा रहे तंज का जवाब दिया. इस से पहले भी जब किसी ने उन की बेटी आराध्या के बारे में मजाकिया ट्वीट किया था तो बच्चन ने मुंहतोड़ जवाब दिया था. सोशल मीडिया में इस तरह की बहसबाजी से अभिषेक खबरों में जरूर आ गए लेकिन किसी पब्लिक प्लेटफौर्म पर सरेआम इंसल्ट करना ठीक नहीं.

नैशनल अवार्ड

63वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के तहत इस बार स्पैशल इफैक्ट्स और कटप्पा जोक्स के लिए चर्चित रही फिल्म ‘बाहुबली’ को बैस्ट फिल्म का अवार्ड हासिल हुआ जबकि  फिल्म ‘पीकू’ के लिए अमिताभ बच्चन ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, कंगना राणावत को ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नैशनल अवार्ड दिया गया.

फिल्म ‘मसान’ के लिए निर्देशक नीरज घेवान को सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का पुरस्कार मिला. बाजीराव मस्तानी के लिए संजय लीला भंसाली को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, ‘तलवार’ के लिए विशाल भारद्वाज ने सर्वश्रेष्ठ रूपांतरित पटकथा का पुरस्कार अपने नाम किया. जूही चतुर्वेदी और हिमांशु शर्मा ने भी संयुक्त अवार्ड जीता.

कैदियों की पड़ताल

फिल्मों में अभिनेता खुद को किरदार में ढालने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. अभिनेता पूरब कोहली कुछ ऐसा ही कर रहे हैं. पूरब हौलीवुड के ‘होमलैंड’ सीरीज की इंडियन रीमेक टीवी सीरीज के लिए जम कर तैयारी कर रहे हैं. इस सीरीज में पूरब एक कैदी का किरदार निभा रहे हैं, जिस के लिए पूरब ने अपने बाल काफी छोटे करवा दिए हैं. एक कैदी के किरदार में खुद को ढालने के लिए पूरब इन दिनों जेल के चक्कर लगा रहे हैं और कैदियों से भी मिल रहे हैं. इतना ही नहीं, कैदियों की मानसिक व्यवस्था समझने के लिए पूरब कैदियों के मनोवैज्ञानिक से भी मिल रहे हैं.

क्रिकेटरों की सियासी पारी

क्रिकेट में राजनीति आम बात है, बात चाहे खेल संघों की हो या फिर चयन समिति की. खिलाड़ी अकसर राजनीति के शिकार होते रहे हैं पर कई खिलाड़ी ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने क्रिकेट के मैदान से संन्यास ले कर राजनीति के मैदान में सियासी पारी खेली है. ताजा मिसाल भारतीय टीम के पूर्व क्रिकेटर श्रीसंत हैं जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने केरल के तिरुवनंतपुरम विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा है. केरल विधानसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा कुछ नहीं मिलने वाला है. उस की कोशिश यही है कि कम से कम इज्जत बच जाए, इसलिए उस ने खाली बैठे श्रीसंत को उतार कर अपनी साख बचाने की जुगाड़ भिड़ाई है.

मैच फिक्सिंग के मामले में फंसे श्रीसंत पर बीसीसीआई ने क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा रखा है. राजनीति में बड़ा ब्रेक मिलने पर श्रीसंत उत्साहित हैं. श्रीसंत से पहले दर्जनों क्रिकेटर राजनीति में सियासी पारी खेल चुके हैं. मोहम्मद कैफ, मोहम्मद अजहरुद्दीन, कीर्ति आजाद, चेतन चौहान, मनोज प्रभाकर, चेतन शर्मा, विनोद कांबली और युवराज सिंह के पिता योगराज सियासी मैदान में उतर कर कुछ खास नहीं कर पाए. सचिन तेंदुलकर कांगे्रस के टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं, पर सचिन ने राजनीति से अपनेआप को फिलहाल दूर रखा है.

खिलाडि़यों को उन की शोहरत की वजह से राजनीतिक पार्टियां मैदान में उतार तो देती हैं पर या तो वे पहली ही पारी में फिसड्डी हो जाते हैं या फिर चुनाव जीत गए तो न तो वे अपने क्षेत्र में दिखाई देते हैं और न ही संसद या विधानसभा में. सिवा नवजोत सिंह सिद्धू के, कोई भी खिलाड़ी लंबी पारी नहीं खेल पाया. हालांकि क्रिकेटर कभी भाजपा को फले नहीं हैं. सिद्धू पंजाब में पार्टी के गले की हड्डी बने हुए हैं तो कीर्ति आजाद बिहार में पार्टीविरोधी बयान दे कर फसाद खड़े करते रहे हैं. श्रीसंत को राजनीति के मैदान में खुद को साबित करना होगा और न भी कर पाए तो उन का नुकसान कुछ नहीं होने वाला है. जो बिगड़ेगा वह भाजपा के खाते में दर्ज होगा.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम

सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक उपेक्षाओं की कमी के बावजूद भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्व एकदिवसीय मैचों में कुछ सफलता जरूर हासिल की लेकिन आईसीसी विश्व महिला टी-20 चैंपियनशिप में वेस्टइंडीज से हार कर बाहर हो जाने से निराशा हुई. सुकून देने वाली बात यह है कि खिलाडि़यों का आत्मविश्वास बढ़ा है. बीसीसीआई ने महिला क्रिकेटरों के लिए वार्षिक अनुबंध की व्यवस्था शुरू कर दी. यह अलग बात है कि पुरुष खिलाडि़यों को जितना पैसा मिलता है उतना महिला खिलाडि़यों को नहीं मिलता.

अब तो महिला क्रिकेट मैचों का टीवी पर सीधा प्रसारण भी हो रहा है पर स्टेडियम में देखने के लिए दर्शक नहीं मिल रहे और न ही क्रिकेटप्रेमी महिलाओं के मैच को देखने के लिए चिपक कर बैठ पाते हैं. यदि यही मैच पुरुष वर्ग के होते हैं तो तमाम चैनलों में विशेषज्ञ बैठ कर डिसकस करते हैं, सटोरिए सट्टा लगाने की जुगत में माथापच्ची करते हैं. पर महिला वर्ग में ऐसा नहीं होता. महिला टीम की कप्तान मिताली राज कई बार यह स्वीकार कर चुकी हैं कि महिला क्रिकेट का ढांचा व्यवस्थित करने पर ध्यान देना चाहिए, पर ऐसा हो नहीं रहा. बीसीसीआई ने भी महिला टीम के साथ हमेशा उदासीन रवैया अपनाया. ऐसा इसलिए क्योंकि बीसीसीआई को लगता है कि महिला क्रिकेट के लिए न तो दर्शकों में रुचि है और न ही स्पौंसर मिलते हैं इसलिए घाटे के सौदे में वह क्यों अपना माथा खपाए. यदि बीसीसीआई चाहे तो प्रचार के बलबूते और महिला टीम को सुविधा दे कर टीम को मजबूत बना सकता है, नियमित मैच करा सकता है. इस के लिए बीसीसीआई को अपनी मानसिकता बदलनी होगी तभी महिला टीम को वह सम्मान मिल पाएगा जो पुरुष वर्ग की टीम को मिलता है.

शेयर मार्केट में चमक, निवेशकों में उत्साह

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक में होली तक लगातार चौथे सप्ताह तेजी दर्ज की गई. मार्च माह शेयर बाजार के लिए उत्साहभरा रहा. होली से पहले सूचकांक लगातार चौथे दिन तेजी पर बंद हुआ. इस से पहले के सप्ताह में सूचकांक 2 माह के उच्च स्तर पर बंद हुआ था. विदेशी बाजारों से सकारात्मक समाचारों तथा विदेशी निवेशकों के उत्साहजनक स्तर पर किए गए निवेश के कारण बाजार में तेजी का माहौल बना रहा. रुपए में भी डौलर के मुकाबले इस अवधि में मजबूती का रुख रहा, जिस का बाजार के माहौल पर अच्छा असर देखने को मिला. बैंक ऋण ब्याज दरों में कटौती किए जाने की उम्मीद के कारण भी विदेशी निवेशकों का रुख लगातार सकारात्मक बना रहा. विदेशी मुद्रा भंडार के मजबूत रहने तथा चालू खाता घाटा के कम रहने जैसे कई कारणों का बाजार में अच्छा असर देखने को मिला.

जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में सूचकांक के मजबूत रहने की उम्मीद है. इस बीच, उत्पाद शुल्क में एक प्रतिशत कर के विरोध में हड़ताल कर रहे सर्राफा कारोबारियों को सरकार ने भरोसा दिलाया है कि उन के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा सरकार के इस आश्वासन से उम्मीद है कि बाजार में पहले की तरह भी रौनक बनी रहेगी.

बेरोजगारों को लूटने वाली एजेंसियों की बाढ़

युवा बेरोजगारों के फर्जी रोजगार के झांसे में फंसने की खबरें इन दिनों बहुत पढ़ने को मिल रही हैं. देश के हर कोने में बेरोजगार युवकों को लूटा जा रहा है. रोजगार पाने के लिए जमीन, जायदाद तथा जेवर बेच कर दलालों को पैसा सौंपने वाले युवकों की संख्या में नित इजाफा हो रहा है. हालात सिर्फ रिश्वत दे कर लुटने तक सीमित नहीं रह गए हैं. रेलवे, मैट्रो, यहां तक कि गृहमंत्रालय में रिक्त पदों के लिए भी फर्जी फौर्म किताब की दुकानों पर बिक रहे हैं. ये सब फर्जी फौर्म महज 20-30 रुपए की कमाई के लिए बिक रहे हैं. मतलब यह कि जहां जिस को मौका मिला, बेरोजगारों को लूटने में लगा हुआ है.

हद तो तब हो गई जब पिछले दिनों केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने आम जनता के लिए परामर्श जारी करते हुए कहा कि बेरोजगार युवक कृषि मंत्रालय में रोजगार दिलाने के नाम पर ठगी करने वाली फर्जी एजेंसियों के जाल में नहीं फंसें. कृषि मंत्रालय ने यह परामर्श देश की राजधानी दिल्ली के एक संगठन किसान मित्र योजना की रोजगार की पेशकश को देखते हुए जारी किया है. यह एजेंसी इस कदर अराजक हो कर काम कर रही थी कि वह स्वयं को सरकार की रोजगार एजेंसी की तरह पेश कर रही थी. यह एजेंसी

14/2 किसान भवन, शहीद भगतसिंह मार्ग पीरागढ़ी, नई दिल्ली से संचालित हो रही थी.

भारत सरकार की रोजगार देने वाली एजेंसी के तौर पर स्वयं की पहचान बता कर लूटने वाली इस एजेंसी के संचालक को सलाखों के पीछे भेजने के बजाय सरकार ने परामर्श जारी किया है. सरकार का यही लचीलापन और सरकारी एजेंसियों के इसी निकम्मेपन की बदौलत युवकों को लूटने वाले डकैतों का संसार दिल्ली जैसे महानगर में बेझिझक पनप रहा है.

दिल्ली में बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसी जगहों पर पोस्टर चिपके हैं, जिन पर लिखा है, ‘अनपढ़ से ग्रेजुएट युवक चाहिए’. फोन नंबर पर संपर्क करने पर पता चलता है कि बेरोजगार युवकों से 5-5 हजार मांगे जाते हैं और फर्जी जगह उन्हें नौकरी करने के लिए भेजा जाता है. सरकारी एजेंसियां इन गिरोहों पर अंकुश लगाने में असमर्थ हैं. इस डकैती का पैसा पुलिस तक भी पहुंचता है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारी 40 फीसदी आबादी युवा है. वर्ष 2014 के आंकड़े के अनुसार, हर 3 स्नातक में हमारे यहां एक व्यक्ति बेरोजगार है.

स्मार्टफोन ने कैमरों के बाजार का बिगाड़ा मिजाज

कैमरों की दुनिया निराली है. ऐसा भी कैमरा होता था जिसे उठाने के लिए 2 लोगों की जरूरत होती थी. अब कैमरे से किए जाने वाले सारे काम परिवार के हर सदस्य के हाथ में मौजूद स्मार्टफोन ने संभाल लिए हैं जिस के चलते कैमरों का बाजार अब ढहता हुआ नजर आ रहा है. किफायती कीमतों पर अच्छी गुणवत्ता के कैमरे आकर्षक फीचर के साथ स्मार्टफोन पर उपलब्ध हैं. नतीजतन, डिजिटल कैमरों की मांग में भी लगातार गिरावट आ रही है. एक साल के दौरान फीचर कैमरों की मांग में 35 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की जा चुकी है. यह खुलासा वाणिज्य एवं उद्योग मंडल यानी एसोचेम के एक सर्वेक्षण में हुआ है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि स्मार्टफोन में लगे शानदार कैमरों की वजह से डिजिटल कैमरों का बाजार सिकुड़ रहा है. बाजार में 10 हजार रुपए तक के ऐसे स्मार्टफोन मौजूद हैं जो इतनी कीमत पर मिलने वाले डिजिटल कैमरे से कम नहीं हैं. इस कीमत के 78 फीसदी स्मार्टफोन 10 हजार रुपए तक मिलने वाले कैमरे की खूबियों से लैस हैं.

मोबाइल फोन का इस्तेमाल फोटो खींचने, फोटो भेजने तथा वीडियो बना कर भेजने में किया जा सकता है. इसलिए डिजिटल कैमरे का महत्त्व स्वाभाविकरूप से कम होता जा रहा है. कैमरा बाजार के लिए यह सुखद खबर नहीं है. यह ठीक है कि इलैक्ट्रौनिक्स मीडिया के बढ़ते प्रचलन और प्रसार ने कैमरों की दुनिया के चेहरे पर रौनक बरकरार रखी है लेकिन जनसामान्य की पहुंच डिजिटल कैमरों तक जरूरी है. इस के लिए डिजिटल कैमरों को बहुआयामी बनाए जाने की जरूरत है

बच्चों के लिए वित्तीय योजना पर गंभीर नहीं

जीवन बीमा क्षेत्र की निजी कंपनी अवीवा लाइफ इंश्योरैंस कंपनी इंडिया लिमिटेड ने हाल ही में एक अलग तरह का सर्वेक्षण किया है. सर्वेक्षण में पहली बार बच्चों के कैरियर के लिए मातापिता द्वारा बचत करने को ले कर लोगों से सवाल पूछे गए हैं. देश के 7 शहरों दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, पुणे, हैदराबाद तथा बेंगलुरु में 11 हजार 300 मातापिता से हुई बातचीत के आधार पर सामने आए सर्वेक्षण में बताया गया है कि सिर्फ 24 प्रतिशत मातापिता ही बच्चों की रुचि के अनुकूल कैरियर के लिए वित्तीय योजना बना रहे हैं. और उन्होंने अपने बच्चों के कैरियर के लिए बचत की है और इस मामले में वे गंभीर हैं.

सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी क्षेत्र के 24 प्रतिशत कर्मचारी बच्चों के कैरियर के लिए बचत पर ध्यान देते हैं जबकि कौर्पोरेट क्षेत्र के 31 फीसदी तथा स्वरोजगार से जुड़े 22 फीसदी लोग बच्चों के कैरियर के लिए पैसा बचाते हैं. इन 7 शहरों में सर्वश्रेष्ठ 38 फीसदी मातापिता हैदराबाद के हैं जो बच्चों के कैरियर के लिए वित्तीय स्तर पर गंभीर हैं. दूसरे स्थान पर देश की राजधानी दिल्ली 29 फीसदी तथा तीसरे स्थान पर मुंबई है. कोलकाता इस क्रम में सब से निचले स्तर पर है.रिपोर्ट में कहा गया है कि 32 फीसदी लोग चाहते हैं कि उन के बच्चे परंपरागत पेशे जैसे डाक्टर, इंजीनियर, शिक्षक , वकील, पत्रकार आदि में से किसी क्षेत्र में जाएं जबकि 20 फीसदी मातापिता चाहते हैं कि उन के बच्चे फैशन डिजाइन, खेल, फिल्म या  होटल लाइन में कैरियर बनाएं. बच्चों के कैरियर को बनाने में कितना पैसा खर्च होगा, उस का आकलन कोई नहीं करता है. इस की वजह अनिश्चितता भी है. सभी क्षेत्रों में जबरदस्ती प्रतिस्पर्धा है. कोटे के आधार पर प्रवेश का अलग संकट है. और यही अनिश्चितता बच्चों के कैरियर के लिए वित्तीय आधार पर मातापिता को गंभीर नहीं होने देती है.

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