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सनी लियोन को मात देने आ रही है शांति डाइनामाइट

एडल्ट स्टार सनी लियोन के बाद ग्रीक-भारतीय मूल की एडल्ट स्टार शांति डायनामाइट भी बॉलीवुड में जगह बनाने का संघर्ष कर रही हैं. शांति के आने की खबर से अपनी बोल्ड इमेज के दम पर ही काम पा रहीं कई अभिनेत्रियों का चैन-सुकून उड़ गया है.

आपको बता दें कि शांति की दो फिल्में घोषणा होने के बावजूद नहीं बन सकीं. अब शांति ने अपने फैन्स को आकर्षित करने के लिए डांस वीडियो बनाकर रिलीज किया है. एडल्ट अंदाज में बना यह वीडियो सोशल दुनिया में सामने आया. जिसमें शांति की अदाएं सनी लियोन को मात दे रही हैं.

खबरों के अनुसार बताया जा रहा है कि कमबैक के लिए बनाए गए डांस वीडियो से पहले शांति डाइनामाइट ने अपना मेक-ओवर कराया है, जिससे वह पहले से अधिक खूबसूरत दिख सकें.

गौरतलब है कि शांति डायनामाइट ने ‘लव दुबई’ तथा ‘सविता बार्बी’ (3डी) जैसी फिल्में साइन की थीं. परंतु निर्माताओं से विवाद के बाद ये फिल्में बीच में बंद हो गई.

क्या हर किसी को एचपीवी टीका लगवाना चाहिए और यह टीका लगवाने से कोई खतरा भी है.

सवाल

क्या हर किसी को एचपीवी टीका लगवाना चाहिए और यह टीका लगवाने से कोई खतरा भी है?

जवाब

एचपीवी पुरुषों और महिलाओं में आनुवंशिक गांठ का मुख्य कारण होता है. यह महिलाओं के गर्भाशय, जननांग और योनिमार्ग के कैंसर का भी कारण बनता है. पुरुषों के लिंग का कैंसर और महिलाओं एवं पुरुषों दोनों के गुदामार्ग तथा कंठ में भी इस से कैंसर हो सकता है. इन में से ज्यादातर रोगों से एचपीवी टीके से बचा जा सकता है.

एचपीवी टीके 11-12 साल के लड़के लड़कियों को लगवाने की सलाह दी जाती है. किशोरावस्था से पहले की उम्र टीके लगवाने के लिए सब से उपयुक्त होती है, क्योंकि पहली बार यौन संपर्क में आने तथा वायरस से पहले संपर्क में आने से बहुत पहले यह टीका सब से प्रभावी ढंग से काम करता है.

किशोरावस्था पार कर रहे और युवावस्था में पहुंचने वालों को भी एचपीवी टीके का लाभ हो सकता है, चाहे वे सैक्सुअल रूप से सक्रिय ही क्यों न रहें. यह टीका उन्हें एचपीवी के सब से सामान्य टाइप से बचाएगा. एचपीवी के करीब 40 अलगअलग प्रकार हैं. लड़कियां 26 वर्ष की उम्र तक टीके लगवा सकती हैं और ज्यादातर लड़के 21 साल की उम्र तक ये टीके लगवा सकते हैं.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

बचपन में जलने के कारण क्या किसी को बाद में कैंसर हो सकता है.

सवाल

बचपन में जलने के कारण क्या किसी को बाद में कैंसर हो सकता है? यदि हां तो इस से बचाव का पहला कदम क्या होना चाहिए?

जवाब

जलने के कारण अस्थाई दाग बन जाते हैं, जिन से ऐसे अंगों में तनाव या सिकुड़न आ जाती है और इन की गतिविधियां सीमित हो जाती हैं. मसलन, एड़ी या घुटने के जोड़ आदि में कई वर्षों बाद कैंसर का जख्म बनने की प्रवृत्ति होती है. जलने के कारण त्वचा को पहुंचे नुकसान का इलाज करने के लिए बचाव का सब से अच्छा तरीका, जितना जल्दी हो सके, स्किन ग्राफ्टिंग या फ्लैप कराना है.

 

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अनमोल है मां का प्यार

मां बनना अब एक चैलेंज बनता जा रहा है. पहले मां का कर्तव्य सुरक्षित घर देना, कपड़ों का खयाल रखना, खाना समय पर देना और वक्त पड़ने पर तिमारदारी करना था. आज मांएं बच्चों को पढ़ाती हैं, उन के कैरियर का खयाल रखती हैं, स्कूलों की पेरैंटटीचर मीटिंगों में जाती हैं, बच्चों की पार्टियां और्गेनाइज  करती हैं और उन्हें घर से स्कूल, स्कूल से जिम, जिम से पार्टी, पार्टी से दोस्तों तक ढोने का काम भी करती हैं.

कम बच्चों ने मांओं की जिम्मेदारियों को बढ़ा दिया है और जैसे जैसे बच्चे स्वतंत्रता का हक जमाने लगे हैं, मांओं को उन की सुरक्षा का खयाल भी रखना पड़ रहा है. बिहार की एक विधायिका अपने बेटे की करतूतों के कारण जेल में बंद है. कितनी ही बेटियों का गर्भपात कराने के लिए मारीमारी फिरती हैं.

विवाह बाद भी वर्षों तक मां की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो रही. बेटियां या बेटे अपने साथी से झगड़ें तो सुलझाने का काम मां के सिर पर आने लगा है. अदालतों के गलियारों में बूढ़ी होती मांएं बच्चों के वैवाहिक मामलों में साथ देती दिखने लगी हैं. यह जिम्मेदारी पहले केवल आदमियों की होती थी पर अब सब गायब हो गए हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए लगी कतारों के आसपास मंडराती मांएं भी दिख जाएंगी. ग्रैजुएशन पार्टियों में मांओं का होना जरूरी हो गया है. मांओं की बढ़ती जिम्मेदारियों ने अब उन्हें ज्यादा समझदार बना दिया है. वे अपना रंगरूप बदलने लगी हैं. अब बच्चे मां को मौडर्न, पढ़ीलिखी, स्मार्ट, सही कपड़ों में देखना चाहते हैं. ब्यूटीपार्लरों में ज्यादा ग्राहक मांएं ही होती हैं, जो अपनी नई जिम्मेदारियों के अनुसार अपनेआप को ढाल रही हैं.

मगर थोड़ा अफसोस यह जरूर है कि बच्चों ने अपनी मांओं को अपना वह प्यारदुलार देना शुरू नहीं किया है, जिस की वे हकदार हैं.

मां की प्रौपर्टी पर नजरें अब ज्यादा जमने लगी हैं. मां को वृद्धावस्था में अकेला छोड़ने पर बच्चों में गिल्ट की भावना चाहे हो पर वे अपने सुखों, कैरियर, पार्टियों को मांओं के लिए बलिदान नहीं कर रहे. मां ने जो 10-15 साल बच्चों के लिए लगाए उस का भुगतान वे अपने बच्चों पर प्यार उडे़ल कर तो कर रहे हैं पर उस मां पर नहीं जिस ने उन्हें बनाया.

इस में कठिनाई यह है कि आज की युवा पीढ़ी पर दोहरा बोझ पड़ने लगा है. एक तरफ अपने बच्चों का और दूसरी तरफ अपने मांबाप का. तेज भागती जिंदगी, प्रतिस्पर्धा, हर समय का डर और फिर 2 पीढि़यों का एकसाथ ध्यान रखना एक चुनौती बन रहा है. अफसोस यह है कि जानकारी का बड़ा स्रोत सोशल मीडिया आज इस पर शांत है. उसे तो चुटकुलों से ही फुरसत नहीं. पर जीवन तो कठोर है और मां की गोद आसानी से नहीं मिलती.

मनोज बाजपेयी बने ट्रेनर

‘बुधिया सिंह – बोर्न टू रन’ फिल्म की शूटिंग के दौरान मनोज ट्रेनर बन गए, इस फिल्म में मनोज कोच की भूमिका निभाते हुए दिखेंगे, तो वही चाइल्ड एक्टर मयूर "बुधिया सिंह" का किरदार निभा रहे हैं.

फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले ​फिल्म की टीम प्रोफेशनल ट्रेनर के साथ ट्रैनिंग कर रही, पर चाइल्ड एक्टर मयूर ट्रेनर के साथ कम्फर्टेबल नहीं थे, तो मनोज ने यह फैसला किया की वे मयूर को खुद ट्रेन करेंगे. मनोज ने ट्रेनर के जूते पहने और मयूर के साथ ट्रैनिंग शुरू कर दी. 

मनोज ने  मयूर को हर वो ट्रैनिंग कराई, जो एक प्रोफेशनल स्पोर्ट्स ट्रेनर कराता है. जब 4 साल का बच्चा हो तो यह जरूरी हो जाता है की कोई प्रोफेशनल ट्रेनर ही ट्रैनिंग कराए, पर मयूर सिर्फ मनोज का सुनते थे, इस लिए मनोज ने मयूर को रनिंग, स्कीपिंग और जूडो की ट्रैनिंग दी, इतना ही नहीं दोनों ने प्रैक्टिस भी साथ ही पूरी की.

 

 

मौडलिंग के लिये चोरी का सहारा

उत्तर प्रदेश की राजधानी में पुलिस ने दो लड़कियों सहित दो ऐसे स्टूडेंट्स को चोरी के इल्जाम में पकड़ा, जिन्होंने लग्जरी लाइफ जीने के लिए 25 लाख रुपये की चोरी की. ऐसी घटनाओं से पता चलता है कि युवा अपराध की तरफ किस तरह से भाग रहे हैं. छोटे छोटे शहरों से पढाई करने बड़े शहरों में आ रहे युवाओं के माता पिता उनके सपनों को पूरा करने के लिये अपनी घर जमीन बेचकर पढ़ने के लिये स्कूल भेजते हैं. बडे शहरों की चकाचौंध में फंस कर युवा अपराध की दुनिया में उलझ जाते हैं. यह कहानी है मीनाक्षी, अंशिका, श्रीधर और शांतनु की.

मीनाक्षी और अंशिका सीआरपीएफ कमांडेंट रमेश कुमार के गोमतीनगर स्थित घर में किरायेदार के रूप में रहती थी. मीनाक्षी लखनऊ विश्ववि़द्यालय से एमबीए की पढाई कर रही थी. उसके पिता पिता छत्तीसगढ़ में अकाउंटेंट हैं. मीनाक्षी के साथ रहने वाली दूसरी लडकी अंशिका सेठ विशम्बर नाथ कॉलेज में बीबीए की पढाई कर रही थी. उसके पिता की मौत हो चुकी है. अंशिका का भाई हरदोई जिले में ग्राम प्रधान है. अंशिका और मीनाक्षी की दोस्ती श्रीधर और शांतनु से थी. यह भी पढाई कर रहे थे. श्रीधर बाबू बनारसीदास कॉलेज का बीडीएस में तीसरे साल की पढाई कर रहा था. उसके पिता रिटायर शिक्षक हैं. शांतनु भी एमबीए की पढाई करता था और लखनऊ के मुंशी पुलिया इलाके में रहता था.

सीआरपीएफ कमांडेंट रमेश कुमार का घर तीन फ्लोर का बना है.पहली मंजिल पर अलग किरायेदार रहते थे. दूसरी मंजिल पर यह दोनो छात्रायें रहती थी.तीसरी मंजिल को रमेश कुमार ने अपने लिये रखा था. रमेश कुमार झारखंड में पोस्टेड है. कुछ समय पहले रमेश कुमार ने अपनी एक जमीन 25 लाख में बेची थी. रमेश कुमार ने यह पैसा घर में तिजोरी में बंद कर रख दिया था. यह बात इन लडकियों को पता चल गई. यह लोग अब उस पैसे को चोरी करने के फिराक में जुट गई. इन लोगों ने पत्रकारपुरम से डुप्लीकेट चाबी बनाने वाले से तिजोरी की चाबी बनवाई और 25 लाख रूपये चोरी कर लिये. इस कैश में चारों ने 6.6 लाख रुपए आपस में बांट लिये. चोरी के पैसे मीनाक्षी और अंशिका ने अपनेअपने लिये स्कूटी खरीद ली. श्रीधर ने पल्सर 220 बाइक खरीदी और शांतनु ने सुजकी की जिल्सर मोटरसाइकिल खरीदी.

अपनी शान औ शौकत को बढाने के लिये मंहगे मोबाइल फोन, ज्वेलरी और होटलबाजी की. मीनाक्षी को मौडलिंग का भी शौक था. इसी पैसे से वह फोटोशूट कराने के लिये हवाई जहाज से मुम्बई गई. मीनाक्षी को घर से हर महीने 25,000 रुपए पॉकेट मनी के रूप में मिलते थे. अंशिका का भाई उसे हर महीने 10,000 रुपए भेजता था. इसके बाद भी इन दोनों लड़कियों के शौक ऐसे थे कि घर के पैसे से पूरे नहीं होते थे.

20 जून को मकान मालिक रमेश ने अपने एक परिचित युवक को झारखंड से लखनऊ वास्तुखंड इलाके में अपने घर कुछ काम से भेजा. जब वह युवक रमेश के घर का ताला खोल अंदर गया, तो घर का पूरा सामान फैला मिला. जिसके बाद उसने रमेश को सूचना दी. गोमती नगर में रहने वाले रमेश के ससुर सुखेन कुमार सिंह ने घर जाकर देखा और चोरी की पुष्टि कर गोमतीनगर थाने में मकुदमा दर्ज करवाया. पुलिस ने शक के आधार सेकेंड फ्लोर पर रह रहीं लड़कियों से पूछताछ की. सख्ती से पूछताछ के बाद लड़कियों ने चोरी की बात कबूल ली. पुलिस ने इन लोगों से 17 लाख रुपए बरामद किये. पुलिस को दो बाइक और दो स्कूटी समेत चोरी का सामान भी बरामद किया है. पुलिस ने पकड़े गए अरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया है.

नीतीश की शराबबंदी, रघुवर की बेचैनी

शराबबंदी को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री और झारखंड के मुख्यमंत्री के बीच सियासी और जुबानी गोलीबारी तेज होती जा रही है. नीतीश बिहार के बाद पड़ोसी राज्य झारखंड में भी शराबबंदी की मुहिम छेड़ चुके हैं और वहां की महिलाओं को शराब के खिलाफ जागरुक बना रहे हैं. पिछले 10 मई को नीतीश ने झारखंड के धनबाद जिले से शराबबंदी की मुहिम शुरू की थी, जिससे रघुवर दास बेचैन हो उठे हैं.

रघुवर ने नीतीश को साफ तौर पर कह दिया है कि झारखंड में बिहार मौडल नहीं, बल्कि गुजरात मौडल ही चलेगा. नीतीश झारखंड में अपनी मर्जी थोपने की कोशिश नहीं करें. वहीं नीतीश रघुवर की खिल्ली उड़ाते हुए कहते हैं कि उनकी शराबबंदी की मुहिम से भाजपा खेमें में घबराहट फैल चुकी है. वहीं रघुवर नीतीश को झूठा मुख्यमंत्री तक करार दे चुके हैं.

पिछले 20 जून को प्रेस कान्फ्रेंस में रघुवर दास ने नीतीश को सबसे झूठा मुख्यमंत्री करार देते हुए कहा कि नीतीश ने उन्हें झारखंड के 29 हजार गांवों का नक्शा सौंपने का वादा किया था, पर उसके लिए फीस की पहली किश्त जमा करने के बाद भी नक्शा नहीं सौंपा गया हैं.

शराबबंदी से आगे जाकर रघुवर कहते हैं कि बिहार की प्रतिभा का नीतीश ने अपमान किया है. उनके राज में शिक्षा का माहौल पूरी तरह से चौपट हो गया है. रुपयों के की ताकत पर टौपर बनाए जा रहे राज्य में असली प्रतिभा घुट-घुट कर दम तोड़ रही है. शिक्षा माफियाओं को सरकार ने पूरी छूट और संरक्षण दे रखा है. उन्होंने बिहार के प्रतिभावान छात्रों को खुला न्यौता दिया कि वे लोग उच्च शिक्षा के लिए झारखंड आएं. उन्होंने दावा किया कि झारखंड में नेशनल और इंटरनेशनल लेवल के शैक्षणिक संस्थान खोले जा रहे हैं. इंडियन स्कूल औफ माइंस, सेंट्रल यूनिवर्सिटी आईआईएम, लौ यूनिवर्सिटी, रक्षा शक्ति विश्विद्यालय, बीआईटी सिंदरी, एक्सएलआरआई जैसे संस्थान पहले से ही हाई एजुकेशन के मामले में परचम लहरा रहे हैं. इसके अलावा नेतरहाट स्कूल और सैनिक स्कूल जैसे स्कूल में नेशनल लेबल की पढ़ाई हो रही है.

उन्होंने नीतीश पर तंज कसते हुए कहा कि बिहार की बदनाम एजुकेशन सिस्टम से बिहारी छात्रों का बाहर निकलना जरूरी है. बिहार में बेरोजगारी और अशिक्षा की वजह से ही लोगों में शराब पीने की गलत आदत पड़ी है. नीतीश कुमार उंगली कटा कर शहीद कहलाना चाहते हैं. गलत लोगों के संगति में फंस कर वह उलजलूल हरकते कर रहे हैं.

अपनी सभाओं में रघुवर दास ने कहते फिर रहे हैं कि नीतीश की शराबबंदी की बात करना सौ चूहे खा कर बिल्ली के हज करने की कहावत की तरह ही है. उन्होंने अपने पिछले 10 साल के राज में गली-गली में शराब की दुकानें खुलवा दी और बिहारियों को नशेड़ी बना कर रख दिया, अब शराब की दुकाने बंद करने का ढोल पीट रहे हैं. अब वह झारखंड में शराबबंदी के लिए सभाएं करते फिर रहे हैं. गोड्डा के उपचुनाव में हरा कर झारखंड की जनता उन्हें ठुकरा चुकी है. नीतीश कुमार झारखंड की जनता को मूर्ख नहीं समझें.

रघुवर के नीतीश पर निशाना साधने से राजद सुप्रीमो और उनके सियासी दोस्त लालू यादव बौखला उठे हैं. लालू कहते हैं कि झारखंड में हमेशा ही बिहारियों के साथ गलत सलूक किया गया है. पिछले कई सालों से झारखंड में रह रहे बिहारियों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता रहा है. रघुवर अपने राज्य के एजुकेशन सिस्टम को अपने पास ही रखें.

रघुवर के बयान पर पलटवार करते हुए जदयू के प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं कि झारखंड में नीतीश की शराबबंदी की मुहिम को कामयाब होता देख रघुवर दास तिलमिला उठे हैं और उन्हें अपनी जमीन खिसकती हुई महसूस होने लगी है. बिहार शुरू से पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहा है और किसी एक घटना (टौपर घोटाला) को लेकर बिहार का अपमान करना ठीक नहीं है.

नीतीश कुमार ने रघुवर दास पर तीर चलाते हुए कहा है कि रघुवर शराबबंदी को लेकर गंभीर नहीं हैं. उन्होंने उन्हें पत्र लिख कर झारखंड में शराबबंदी की गुजारिश की थी, पर इसके उलट बिहार से सटे इलाके में झारखंड सरकार ने शराब का कोटा बढ़ा दिया है. पलामू, चतरा, गढ़वा और गिरीडीह जिलों में शराब को कोटा 15 से 50 फीसदी तक बढ़ा दिया गया है. कोडरमा, चतरा, गढवा और देवघर जिलों में 30 से 40 फीसदी शराब का कोटा बढ़ा दिया गया है. उन्होंने रघुवर दास को चेताने वाले लहजे में कहा कि अगर रघुवर अपने राज्य में शराबबंदी लागू कराएंगे, तो उन्हें वहां की जनता और महिलाओं का भरोसा हासिल होगा, अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो अगले विधान सभा चुनाव के बाद बाबूलाल मरांडी झारखंड में मुख्यमंत्री बनेंगे, तो वह पूरी मुस्तैदी से शराबबंदी लागू करेंगे. गौरतलब है कि मरांडी और नीतीश पिछले दिनों नए-नए सियासी दोस्त बने हैं.       

किसान बढ़ाएं दलहनी फसलें गुरबत के दलदल से निकालेंगी दालें

दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए साल 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन साल के तौर पर मनाने का ऐलान किया गया है. अपने देश में दालों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. लिहाजा दलहन की ज्यादा पैदावार के बावजूद आम आदमी  के लिए दाल खाना मुश्किल हो गया है. कहने को भारत दुनिया भर में सब से बड़ा दाल पैदा करने वाला देश है, लेकिन आम आदमी की थाली दाल से खाली है. दूसरे देशों को दालें भेजने की जगह, हम वहां से दालें मंगवाते हैं. दरअसल, भारत में दालों की पैदावार, मांग से बहुत कम है. आजादी के बाद बीते 69 सालों में दलहनी फसलों की खेती को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिस से हमारा देश दालों के उत्पादन में आगे होता. ऊपर से कालाबाजारिए दालों की जमाखोरी से कीमतें बढ़ा कर खूब पैसे बनाते हैं.

दलहन फंसी दलदल में

अपने देश में दालों की सालाना खपत लगभग 225 लाख टन है, जबकि दालों का उत्पादन 175 लाख टन से नीचे है. मजबूरन लाखों टन दालें हर साल दूसरे देशों से मंगवानी पड़ती हैं. लिहाजा दलहनी फसलों का रकबा और पैदावार बढ़ाने की जरूरत है. दलहनी फसलों की किसानों को मिलने वाली कीमत में कम बढ़ोतरी होने से भी ज्यादातर किसान इन की खेती नहीं करना चाहते हैं. साल 2013-14 में अरहर, मूंग व उड़द के न्यूनतम समर्थन मूल्य क्रमश: 4300, 4500 व 4300 रुपए प्रति क्विंटल थे, जो साल 2014-15 में बढ़ कर क्रमश: 4350, 4600 व 4350 रुपए प्रति क्विंटल हो गए थे. यह 100 से 50 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़त कम है. दलहन की पैदावार में मध्य प्रदेश पहले, महाराष्ट्र दूसरे व राजस्थान तीसरे नंबर पर है. देश में हो रहे दालों के कुल उत्पादन में इन राज्यों की हिस्सेदारी क्रमश: 25, 16 व 12 फीसदी है. दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी महकमे दिनरात एक करने का नाटक करते हैं, जबकि असल में दलहन की बढ़त के लिए सरकारी विभाग कुछ नहीं कर रहे हैं.

दलहनी फसलों का रकबा, उन की औसत उपज व उत्पादन घट रहा है. दरअसल, हमारे देश के ज्यादातर किसानों को आज भी खेती की नई तकनीकों के बारे में कुछ नहीं पता है. लिहाजा वे सिंचित व उपजाऊ जमीन में गेहूं, गन्ना व धान और कम उपजाऊ व असिंचित जमीन में दलहनी फसलें उगाते हैं. उन्हें अच्छी क्वालिटी के बीज सही समय व सही कीमत पर आसानी से नहीं मिलते. कई बार सूखा व ओले पूरी फसल बरबाद कर देते हैं. लिहाजा दलहनी फसलें अकसर दूसरी फसलों के मुकाबले पीछे रह जाती हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2014 में देश भर में दलहनी फसलों का कुल रकबा 252 लाख हेक्टेयर था, जो साल 2015 में सीधे 20 लाख हेक्टेयर घट कर 232 लाख हेक्टेयर रह गया. दलहन की प्रति हेक्टेयर औसत उपज साल 2013 में 789 किलोग्राम थी, जो साल 2014 में घट कर 785 किलोग्राम व साल 2015 में 744 किलोग्राम ही रह गई. इसी तरह दलहन का कुल उत्पादन साल 2014 के दौरान 192 लाख टन था, जो साल 2015 में घट कर सिर्फ 172 लाख?टन ही रह गया.

बढ़ावा बहुत जरूरी

भारत की खास दलहनी फसलों में चना, अरहर, उड़द, मूंग, मसूर, राजमा, लोबिया व मटर आदि शामिल हैं. दलहनी फसलों में चने का हिस्सा सब से बड़ा 47 फीसदी है, लेकिन साल 2014 के मुकाबले साल 2015 के दौरान चने के रकबे में 20 फीसदी, उत्पादन में 27 फीसदी व प्रति हेक्टेयर उपज में 9.4 फीसदी की कमी आई है. देश के ज्यादातर हिस्सों में रोजाना खाई जाने वाली अरहर की दाल का रकबा साल 2015 के दौरान 37 लाख हेक्टेयर, उत्पादन 28 लाख टन व प्रति हेक्टेयर औसत उपज 750 किलोग्राम थी. साल 2014 के मुकाबले 2015 के दौरान अरहर के रकबे में 3.7 फीसदी, उत्पादन में 15.5 फीसदी व औसत उपज में 11.6 फीसदी की कमी आई. ऐसे में जरूरी है कि दलहनी फसलों की खेती में हो रही इस कमी की असली वजहें खोजी जाएं और उन्हीं के मुताबिक मौजूदा सभी मामले सुलझाए जाएं. सरकार ने दलहनी फसलों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना व राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में दालों पर खास ध्यान देते हुए उन्हें शामिल कर रखा है. इस के अलावा एक्सेलेरेटेड पल्स प्रोग्राम है जिस में नीति आयोग मदद कर रहा है. 60 हजार दलहन गांवों का चयन किया गया है, लेकिन फिर भी दालों की पैदावार नहीं बढ़ रही है. दलहनी फसलों के अच्छे बीजों के उत्पादन व उन के बंटवारे का सही इंतजाम नहीं है. दलहनी फसलों के बीज किसानों की करीब 25 फीसदी मांग ही पूरी कर पाते हैं. आमतौर पर दलहनी फसलों की ओर किसानों का झुकाव कम रहता है. इस के कई कारण हैं जैसे कीड़े, बीमारी, खरपतवार, खराब मौसम, कम उपज व ढुलमुल खरीद व्यवस्था.

फायदेमंद हैं दलहनी फसलें

ज्यादातर किसान यह सच नहीं जानते कि दलहनी फसलें उगाने से किसानों को काफी फायदा होता है. इस से एक तो उपज की कीमत अच्छी मिलती है, साथ ही मिट्टी की उपजाऊ ताकत भी बढ़ती है. दरअसल, दलहन की जड़ों में मौजूद बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन खींच कर जमीन में जमा करते रहते हैं. इसलिए फसल में कैमिकल उर्वरक डालने का खर्च बचता है और जमीन को कुदरती खाद का फायदा मुफ्त में मिल जाता है. बहुत से किसान नहीं जानते कि दलहनी फसलों से खरपतवारों से भी छुटकारा मिलता है. माहिरों का कहना है कि लगातार गेहूं, गन्ना व धान जैसी फसलें लेते रहने से खेतों में कई तरह की घासफूस हो जाती हैं, लेकिन सनई, ढेंचा, मूंग व उड़द आदि फसलें शुरुआत में खुद बहुत तेजी से फैल कर जमीन को ढक लेती हैं. लिहाजा खेत में उगे खरपतवारों को पूरी हवा, रोशनी व पानी आदि न मिलने से बढ़ने का मौका नहीं मिलता. दलहनी फसलों की पकी हुई फलियों से मिली दालों में खनिज और विटामिनों से भरपूर लौह व जिंक की अच्छी मात्रा पाई जाती है. इन्हें फलियों  से निकालने के बाद जो कचरा बचता है, उसे चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. दालों को देश के हर इलाके के भोजन में पसंद किया जाता है.

दलहनी फसलों के बारे में ट्रेनिंग, सलाह व बीज आदि देने के लिए कानुपर में भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान काम कर रहा है. इस संस्थान के माहिरों ने अब तक ज्यादा उपज देने वाली 35 ऐसी अच्छी व रोगरोधी किस्में निकाली हैं, जिन्हें अलगअलग इलाकों की मिट्टी व आबोहवा के अनुसार अपनाया जा सकता है.

लगाएं मिनी दाल मिल

फिर भी नकदी फसलों के मुकाबले दलहनी फसलों की खेती में ज्यादातर किसानों को फायदा नजर नहीं आता. लिहाजा उन्हें इस बात के लिए भी जागरूक किया जाए कि वे अपनी उपज की कीमत बढ़ाएं. तैयार उपज मंडी ले जा कर आढ़तियों को न सौंपें. आटा चक्की, धान मशीन व तेल के स्पैलर लगाने के साथसाथ किसान दाल की प्रोसेसिंग भी करें. ज्यादातर किसान पोस्ट हार्वेस्ट टैक्नोलौजी यानी कटाई बाद की तकनीक

नहीं जानते.

दाल बनाने का काम मुश्किल नहीं है. लिहाजा किसान तकनीक सीखें व अकेले या मिल कर मिनी दाल मिल लगाएं. दालें तैयार करें और थोक व खुदरा दुकानदारों को बेचें. होटलों, कैंटीन व मैस आदि को सप्लाई करने पर किसानों को उन की दलहनी उपज की कीमत ज्यादा मिलेगी. मिनी दाल मिल की जानकारी के लिए किसान उद्यमी निदेशक, केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान मैसूर; निदेशक, केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल; निदेशक, केंद्रीय फसल कटाई उपरांत की अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, लुधियाना या निदेशक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर से संपर्क कर सकते हैं.

उम्मीद की किरण

ज्यादातर सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट व निकम्मे हैं. वे मोटी पगार ले कर भी अपना काम ठीक से नहीं करते, लेकिन भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर में कृषि प्रसार के सीनियर साइंटिस्ट डा. पुरुषोत्तम ने व्हाट्सऐप पर 10 एग्री. पल्स गु्रप चला कर, फेसबुक पर दलहन प्रचार समूह बना कर व ट्विटर के जरीए हजारों किसानों की जानकारी बढ़ाने का काम किया है. वैज्ञानिकों के अलावा कई किसानों ने भी दलहनी फसलों पर काफी खोजबीन की है. सिहोर के राजकुमार राठौड़ ने कुदरती तौर पर विकसित व ज्यादा उपज देने वाली अरहर की अच्छी किस्म ऋचा 2000 के चयन से बीज तैयार किया है. राजकुमार के मुताबिक किसान इसे खेत की मेंड़ों पर मई से जुलाई या सितंबर व अक्तूबर में लगा सकते हैं. इस के बीज की दर प्रति एकड़ 1 किलोग्राम रखें व कोई भी रासायनिक उर्वरक न डालें. अंगरेजी खाद की जगह 5 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद पेड़ की छाया में रख कर उस में 5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा, 5 लीटर गौमूत्र, 5 किलोग्राम बरगद की मिट्टी व 2 पैकेट राइजोबियम कल्चर हलके पानी के साथ मिलाएं. 12 घंटे बाद यह खाद खेत में सुबह या शाम के समय डाल कर कल्टीवेटर से मिट्टी में मिला दें. इस के बाद रिज्डबेड पर 3-3 फुट की दूरी पर 2 बीज 2-3 इंच गहराई पर बोएं और बेड से बेड की दूरी 4 से 5 फुट रखें.

देश में चने की प्रति हेक्टेयर सब से ज्यादा पैदावार 1439 किलोग्राम आंध्र प्रदेश में होती है. इस के बाद दूसरे नंबर पर गुजरात में 1215 किलोग्राम व तीसरे नंबर पर पंजाब में 1211 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पैदावार होती है. प्रति हेक्टेयर सब से ज्यादा अरहर की औसत उपज बिहार में 1667 किलोग्राम, अंडमान निकोबार में 1500 किलोग्राम व प. बंगाल में 1429 किलोग्राम पाई गई है. जाहिर है कि हमारी मिट्टी व आबोहवा में दलहनी फसलों की पैदावार बढ़ सकती है.

उम्दा किस्मों के बीज

बहुत से किसान दलहन की अच्छी किस्मों के प्रमाणित बीज लेने के लिए इधरउधर धक्के खाते रहते हैं, लेकिन उन्हें आसानी से अच्छे बीज नहीं मिलते. लिहाजा बीज लेने के इच्छुक किसान नेशनल सीड कारपोरेशन (एनएससी), उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम, नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र, राज्य सरकार के सीड स्टोर, सहकारी बीज भंडार या भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान से संपर्क कर सकते हैं.

12 से 14 नवंबर 2016 को दिल्ली में एक महा सम्मेलन होगा. इस में भारत व कई देशों के वैज्ञानिक, अफसर, व्यापारी व उद्यमी ‘पोषण सुरक्षा व टिकाऊ खेती में दलहन’ विषय पर बातचीत करेंगे, लेकिन इस सम्मेलन में किसानों को भी जरूर बुलाया जाना चाहिए, ताकि सब्जी, मसाले व अनाज वगैरह में रिकार्ड पैदावार लेने वाले किसान दलहनी फसलों की उपज बढ़ा सकें.

दलहन के बारे में ज्यादा जानकारी व सलाह के लिए इच्छुक किसान अपने जिले के कृषि विभाग, नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

निदेशक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर  208024 (उत्तर प्रदेश).
फोन : 0512-2570264

दलहन की उम्दा किस्में

भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के माहिरों ने दलहनी फसलों की कई ऐसी उम्दा किस्में निकाली हैं, जो ज्यादा पैदावार देती हैं और उन में कीड़े व बीमारी लगने का खतरा भी नहीं रहता. इन में चने की आईपीसी 2005-62, 2004-1, 2004-98, 97-67, उज्जवल, शुभ्रा, डीसीपी 92-3 और मसूर की प्रिया, नूरी, शेरी, अंगूरी व आईपीएल 316, 526 और मूंग की मोती, सम्राट, मेहा व आईपीएम 0-3 और उड़द की बसंत बहार, उत्तरा, आईपीयू 2-43 व 07-3 और मटर की प्रकाश, विकास, आर्दश, अमन, आईपीएफ 4-9 व आईपीएफडी 6-3, 10-12 और अरहर की आईपीए 203, पूसा 992 व आईसीपीएल 88039 खास किस्में हैं.

अब मोबाइल रखेगा आपके दिल का ख्याल

क्‍या आप जानते हैं कि सभी फोन में हार्ट रेट को मापने की टेक्‍नोलॉजी नहीं दी गई है लेकिन गैलेक्‍सी एएस6 में यह आने लगी है. किसी भी वयस्‍क व्‍यक्ति के लिए इस तरह का फोन एक सुपर गिफ्ट साबित हो सकता है जिसमें आप फोन सम्‍बंधी सारी जरूरतों को पूरा करने के बाद, इससे हार्ट रेट को भी काउंट कर सकते हैं.

पल्‍स ऑक्‍समीटर तकनीक की मदद से करता है हार्ट रेट डिटेक्‍ट

हार्ट रेट पर नजर रखने वाली यह तकनीक काफी सरल होती है. इसमें पल्‍स ऑक्‍समीटर तकनीकी होती है जो उंगली के पोरे को रखते ही रंग बदल लेती है – त्‍वचा के अंदर के रक्‍तसंचरण के आधार पर ऐसा होता है. इस प्रक्रिया के लिए सिर्फ लाइट सोर्स और मापन करने वाले सॉफ्टवेयर की आवश्‍यकता होती है.

काफी आसान है एप यूज करना

कैमरा पर जिस तरह फोटो खिंचना आसान होता है ठीक उसी तरह यह भी आसान होता है. आपको ज्‍यादा मशक्‍कत करने की जरूरत नहीं पड़ती है.

कम बैटरी खर्च करती है

गूगल प्‍ले स्‍टोर में कई हार्ट-रेट मॉनीटर दिए गए हैं जो यूजर्स को कई तरीके के फीचर्स उपलब्‍ध करवाते हैं लेकिन अगर आप इंस्‍टेंट हार्ट रेट को इंस्‍टॉल करते हैं तो आपको आसानी रहेगी, इसमें बहुत ज्‍यादा बैट्री भी खर्च नहीं होती है.

सेहत का भी रखता है ख्‍याल

इंस्‍टेंट हार्ट-रेट, पूरे दिन में कई बार आपके हार्ट रेट को ट्रैक कर लेता है और पूरे डेटा को एक साथ आपको दिखा देता है. इसे आप गूगल फिट या अजुमिओ एकाउंट के साथ सिंक भी कर सकते हैं. यह एप, कुछ बेसिक हेल्‍थ टॉरगेट भी देते हैं. आपकी आयु, वजन और सामान्‍य फिटनेस के आधार पर यह एप आपको बताता है कि आपको कितनी कैलोरी को दिन में बर्न करना है और कितना चलना है.

फ्री और पेड दोनों तरह के वर्जन उपलब्‍ध

अगर आप एन के फ्री वर्जन को बार-बार एड आने के कारण इस्‍तेमाल नहीं करना चाहते हैं तो पेड वर्जन ले लें. इसके लिए आपको भारी कीमत चुकाने की जरूरत नहीं पड़ती है. लेकिन आपको एड से परेशान होने की जरूरत नहीं.

सोलर पंप किसानों का हमदम

यकीनन सोलर सिंचाई पंप किसानों और खेतों के लिए काफी मददगार साबित होने लगा है. सोलर प्लांट लगाने के लिए सरकारी लेबल पर कई तरह के अनुदान और मदद दी जा रही है. गांवों में बिजली की कमी और जबतब बारिश न होने से किसानों और खेती को हर साल करोड़ों रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है. सिंचाई के बगैर फसलें सूख जाती हैं और किसान सिर पीटते रह जाते हैं. महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आदि राज्यों में बड़े पैमाने पर सोलर बिजली से खेतों की सिंचाई होने लगी है, पर देश के ज्यादातर राज्यों में अभी भी किसान इस से मुंह फेरे बैठे हैं.

पटना के सोलर प्लांट सामानों के डीलर एसके दास कहते हैं कि आमतौर पर लोग मानते हैं कि सोलर बिजली प्लांट महंगा होता है या इस के लगाने से खास फायदा नहीं होता है, क्योंकि अगर आसमान पर बादल छा गए तो सोलर प्लांट काम नहीं करेगा. बारिश के मौसम में तो यह पूरी तरह से फेल हो जाता है.

मौसम विभाग की मानें तो साल के 365 दिनों में से 225 से 250 दिन अच्छी धूप वाले होते हैं, इस से सोलर बिजली प्लांट के सही तरीके से काम नहीं करने के आसार काफी कम होते हैं. धूप वाले दिनों में सोलर प्लांटों से काफी बिजली पैदा हो सकती है. सोलर प्लांटों की मदद से सोलर पंप आसानी से चलाए जा सकते हैं. धीरेधीरे ही सही पर अब किसानों को सोलर बिजली और सिंचाई पंप की अहमियत समझ में आने लगी है.

आमतौर पर 1 किलोवाट का सोलर पंप लगाने पर सवा 2 लाख रुपए लागत आती है. सरकार की ओर से इस की कुल लागत की 30 फीसदी छूट मिलती है. इस हिसाब से कुल खर्च 1 लाख 60 हजार रुपए ही बैठता है. ‘मिनिस्ट्री आफ न्यू एंड रिन्यूबल एनर्जी’ 1 से 10 किलोवाट तक का सोलर प्लांट लगाने के लिए 30 फीसदी तक की सब्सिडी देता है. इतना ही नहीं कुल लागत की 50 फीसदी रकम बैंक से बतौर कर्ज ली जा सकती है, जिस पर महज 5 फीसदी ही सूद लगता है. सोलर पैनल की गारंटी 25 साल की होती है और उस की बैटरी की गारंटी 4 से 5 साल की होती है.

बाजार में 2 हौर्स पावर और 4.6 हौर्स पावर के सोलर पंप मौजूद हैं. 2 हौर्स पावर के पंप की कीमत 2 से 3 लाख रुपए है. सरकारी अनुदान के बाद इस की कीमत सवा लाख रुपए के करीब होती है. 4.6 हौर्स पावर वाले पंप की कीमत 8 लाख रुपए के आसपास है, जबकि अनुदान के बाद इस की कीमत साढ़े 3 लाख रुपए पड़ती है. 2 हार्स पावर का पंप 10 मीटर की गहराई से पानी खींच सकता है. इस से रोजाना डेढ़ लाख लीटर पानी खेतों में पहुंचाया जा सकता है. 4.6 हौर्स पावर का पंप 30 मीटर गहराई से पानी खींच सकता है और यह हर रोज सवा 2 लाख लीटर पानी से खेतों की सिंचाई कर सकता है.

कृषि वैज्ञानिक वेदनारायण सिंह कहते हैं कि गांवों में बिजली की भारी कमी की वजह से किसानों को खेती में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और सिंचाई के लिए भाड़े पर डीजल पंपिंग मशीन लेने से किसानों की खेती की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. किसानों को सोलर पंप मुहैया कराने से उन की खेती की लागत में कमी आएगी.

बिहार के कृषि मंत्री राम विचार राय कहते हैं कि हर साल बारिश की कमी की वजह से किसानों का पैसा बरबाद होता है और सरकार को भी राहत और मुआवजे के नाम पर हर साल अरबों रुपए बांटने पड़ते हैं. ‘सौर क्रांति सिंचाई योजना’ के तहत 3 सालों में 1 लाख किसानों को सोलर पंप मुहैया कराए जाने की योजना बनाई गई है. सोलर प्लांट से जहां पर्यावरण का बचाव होता है, वहीं किसानों की बिजली पर निर्भरता कम होती है. हर साल सूखे की चपेट में आए जिलों को राहत पैकेज दिए जाते हैं. सूबे के जुमई, मुंगेर, शेखपुरा, लखीसराय, बेगूसराय, समस्तीपुर, नवादा, गोपालगंज, मधुबनी और भागलपुर जिलों में हर साल कम बारिश की वजह से सूखे के हालात पैदा होते हैं. सोलर बिजली और पंप से खेती और किसानों की दशा और दिशा में भारी बदलाव आ सकता है.                       

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