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निवेश के क्षेत्र में आपका पहला कदम

एक निवेशक के तौर पर असेट क्‍लास के बारे में जानना बहुत ही जरूरी होता है, क्‍योंकि जब आप अपना पैसा कहीं भी निवेश करते हैं, तब इसकी निश्चित असेट क्‍लास को ही देखा जाता है. पर्सनल फाइनेंस की दुनिया में कई फाइनेंशियल प्रोडक्‍ट्स हैं, जो किसी निवेशक के लिए हर चीज को उलझा हुआ बना देते हैं, लेकिन यदि आप यह जानते हैं कि कौन सा असेट क्‍लास किस प्रोडक्‍ट से संबंधित हैं, तब पर्सनल फाइनेंस आपके लिए एक आसान खेल की तरह होगा.

असेट क्‍लास क्‍या है?

असेट क्‍लास को एक बड़ी बास्‍केट के रूप में माना जा सकता है, जहां सभी फाइनेंशियल प्रोडक्‍ट्स इन असेट क्‍लास से संबंधित होते हैं. रिस्‍क, रिटर्न, लिक्‍वीडिटी और अन्‍य विभिन्‍न पैरामीटर्स इनमें एक जैसे होते हैं.

उदाहरण के लिए, फि‍क्‍स्‍ड डिपॉजिट और पीपीएफ अलग-अलग फाइनेंशियल इंस्‍ट्रूमेंट हैं, लेकिन गहरे स्‍तर पर यह दोनों ही सुरक्षित प्रोडक्‍ट हैं, इन प्रोडक्‍ट्स में आपको कभी नुकसान नहीं होगा. इन पर मिलने वाला रिटर्न पहले से ही तय होता है और इनके रिटर्न का अनुमान भी लगाया जा सकता है. एफडी और पीपीएफ के सामन्‍य लक्षणों को आप देख सकते हैं, ऐसा इसलिए है क्‍योंकि ये दोनों ही फि‍क्‍स्‍ड इनकम असेट क्‍लास से संबंधित हैं.

असेट क्लास के प्रकार

– फिक्स्ड इनकम

– इक्विटी

– रियल एस्टेट

– कमोडिटीज

– कैश

सारे फाइनेंशियल प्रोडक्ट इन्ही असेट क्लास में से ही एक होते हैं. हर असेट क्लास की अपनी अलग खासियत होती है.

फिक्स्ड इनकम

फिक्स्ड इनकम असेट क्लास के फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स में निवेशित राशि पर मिलने वाला रिटर्न फिक्स्ड या फिर पहले से अनुमानित होता है. इसमें इंडोनमेंट पॉलिसी, डेट म्यूूचुअल फंड्स, डिबेंचर्स, ईपीएफ, पोस्ट ऑफिस के प्रोडक्ट्स आदि शामिल हैं.

फिक्स्ड इनकम में निवेश एक तरह से किसी को पैसा उधार देने के जैसा होता है. इसमें निश्चित तौर पर पहले से तय किए रिटर्न के मुताबिक पैसे वापस मिलते हैं. जब आप बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट करवाते हैं तो वह पूरी तरह से निवेश नहीं होता, बल्कि आप अपना पैसा बैंक के पास रखवा रहे होोते हैं, जहां वह आपको पहले से तय किए गए ब्याज के साथ प्रिंसिपल अमाउंट लौटाएंगे.

फिक्स्ड डिपॉजिट की मंहगाई दर को मात : यदि आप अपने फिक्स्ड डिपॉजिट पर 8 फीसदी से 9 फीसदी तक का रिटर्न ले रहे हैं तो उस स्थिति में मिलने वाले रिटर्न पर पहले से टैक्स लगा हुआ होता है. क्योंकि फिक्स्ड डिपॉजिट कर योग्य होता है इसलिए टैक्स भरने के बाद रिटर्न 6 से 7 फीसदी रह जाता है. आपको बता दें कि महंगाई दर 8 से 10 फीसदी की है. ऐसे में आपको अपने फिक्स्ड इनकम निवेश पर नेगेटिव रिटर्न मिलता है.

जोखिम होता है कम : जो लोग अपने निवेश को लेकर जोखिम उठाने में सक्षम नहीं हैं वे इस असेट क्लास का चयन करते हैं. ऐसे ही पीपीएफ, एनएससी, रेकरिंग डिपॉजिट, कई सरकारी बॉण्ड व डेट म्यूूचुअल फंड्स की स्थिति में होता है. यह निवेश विकल्प महंगाई को मात देने वाले रिटर्न नहीं देते हैं. यह असेट क्लास आपके पैसे को सुरक्षित रखते हैं, उसे बढ़ाते नहीं हैं.

इक्विटी

इक्विटी में निवेश का यह मतलब भी हो सकता है कि आप किसी व्यवसाय में स्वामित्व ले रहे हैं. इस कैटेगरी में स्टार्टअप फंडिंग, इंडेक्स फंड्स, ईटीएफ आदि शामिल होते हैं. उदाहरण के तौर पर जब आप इंफोसिस या रिलायंस के स्टॉक खरीदते हैं तो आप उस बिजनेस के एक छोटे से मालिक बन जाते हैं. अगर आप किसी बिजनेस में निवेश करते हैं तो आप कुछ हिस्से के मालिक बन जाते हैं. अगर वह कंपनी भविष्य में बड़ी बन जाती है तो आपको भी इसका फायदा मिलेगा. आप किसी अमीर व्यक्ति को देखें, वह इक्विटी में निवेश जरूर करता है. कुछ ने या तो निवेश के लिए अपनी कंपनी खोल ली है या फिर कुछ ने ऐसी कंपनी में निवेश किया है जो वृद्धी कर रही है.

इक्विटी में निवेश, लंबी अवधि के लिए : नीचे दिए गए चार्ट से आप देख सकते हैं कि पिछले 10 वर्षों में सेंसेक्स ने 12 फीसदी से ज्यादा के रिटर्न दिया है. इक्विटी रिटर्न में उतार-चढ़ाव की वजह से कई लोग इसमें निवेश करने से कतराते हैं. लेकिन म्यूूचुअल फंड्स और स्‍टॉक मार्केट में निवेश से ही पूंजी बढ़ती है.

रियल एस्टेट

रियल एसेट का मतलब फिजिकल स्पेस या फिर जमीन, रेजिडेंशियल फ्लैट्स, कमर्शियल स्पेस आदि होते हैं. इन जगहों का इस्तेमाल रहने, बिजनेस या फिर इनकम जनरेट करने के लिए किया जाता है. रियल एस्टेट के बाजार में उतार-चढ़ाव लगे रहते हैं. इसके रिटर्न शहर के भविष्य, सरकार की पॉलिसी, राजनीतिक माहौल आदि पर निर्भर करता है.

कमोडिटी

कमोडिटी वे फिजिकल गुड्स व प्रोडक्ट्स होते हैं जो खरीदे औप बेचे ज सकें. जैसे कि गोल्ड, सिल्वर, कॉपर, चावल, कॉर्न, गेहूं और कच्चा तेल आदि. इनकी कीमतेंं बाजार की मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है. इनका इस्तेमाल निवेश के लिए कम और ट्रेडिंग के लिए ज्यादा किया जाता है. हर कमोडिटी के अपने बाजार और डायनामिक्स होते हैं. कमोडिटी में सबसे ज्यादा सोना और चांदी में ही लंबे समय के लिए निवेश किया जाता है.

कैश

कैश केवल नकदी नहीं होती, इसमें सेविंग एकाउंट, लिक्विड फंड्स, ऑनलाइन वॉलेट आदि भी होते हैं. इस क्लास का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि यह आपको कुछ भी खरीदने की स्वतंत्रता देता है. आप इससे फोन, घर, गाड़ी या फिर अन्य एसेट क्लास में निवेश कर सकते हैं. कैश महंगाई दर को मात नहीं दे पाता. सेविंग्स एकाउंट में रखे पैसे पर 4 फीसदी का ब्याज मिलता है.

खास बातें

– सैकड़ों फाइनेंशियल प्रोडक्‍ट में से आपके लिए क्‍या बेहतर है, इसके लिए आपको पहले असेट क्‍लास को समझना होगा.

– असेट क्लास को पांच कैटेगरी में बांट सकते हैं, जैसे फिक्स्ड इनकम, इक्विटी, रियल एस्टेट, कमोडिटीज, कैश.

– अगर आप सुरक्षित निवेश का रास्‍ता तलाश रहे हैं तो आपको फिक्‍स्‍ड इनकम निवेश का चयन करना चाहिए.

– जोखिम ले सकते हैं तो आपके लिए इक्विटी और कमोडिटी में निवेश लंबे समय में काफी फायदेमंद हो सकता है.

– किसी भी असेट क्‍लास में लंबे समय तक निवेशित रहना फायदे मंद होता है खासतौर पर रियल एस्‍टेट सेक्‍टर में.

युवा हार न मानें

देशकी बड़ी बड़ी आईटी कंपनियां आजकल ऐक्सपैंशन प्लान नहीं बना रही हैं, वे आजकल वीडिंग आउट प्लान बना रही हैं. उम्मीद है कि इन्फोसिस, विप्रो, कोगनीजैंट जैसी कंपनियां 50 हजार से 1 लाख कर्मचारियों की तो छंटनी कर देंगी. एक तो पश्चिमी देशों में भी प्रगति की रफ्तार कम हो गई है और दूसरी तरफ अमेरिका के खप्ती राष्ट्रपति डौनल्ड ट्रंप अमेरिका फौर अमेरिकंस का राग अलाप रहे हैं. उन की देखादेखी दूसरे देश भी डिफैंसिव मोड में आ गए हैं और बाहरी युवाओं का रास्ता रोक रहे हैं और अपने देश का आईटी बिजनैस बाहर जाने पर पाबंदियां लगा रहे हैं.

भारतीय युवाओं के लिए यह बुरी खबर है क्योंकि सरकारी नौकरियों का तो वैसे ही अकाल है. निजी क्षेत्र में व्यापार व उद्योग बढ़ रहे हैं पर कम. ज्यादा तकलीफ यह है कि छोटे निजी हों या बड़े सरकारी रोजगार देने वाले, वे ट्रेनिंग देने के इच्छुक नहीं हैं और सीखेसिखाए लोगों को ही रखना चाहते हैं.

भारतीय युवा वैसे भी कम उत्साही हैं. हमारे यहां हरेक में भारी जंग लगा है. जातिगत अहंकार के कारण जो ज्यादा पढ़ेलिखे हैं वे हाथ का काम नहीं करना चाहते और जो मजबूरी में हाथ का काम करने को तैयार हैं वे नया जानने को उत्सुक नहीं हैं. ऐसे में पुरानी नौकरियां कम हो जाएं और नई नौकरियां न निकलें तो स्थिति गंभीर हो जाएगी.

यह दुनिया के कई देशों में हो रहा है जहां मौजमस्ती, ड्रग्स, नाचगाने, भक्ति, सैक्स का बोलबाला है. वहां लोग सोचते हैं कि काम अपनेआप टपकेगा. कोई नौकरी देगा, चाहे सरकार दे या देवीदेवता. वे खाने को, हल्ले को तैयार हैं, काम करने को नहीं.

देश के आईटी सैक्टर ने लाखों घर रोशन किए हैं. विदेश जाने के सपने ने बहुतों को कठिन मेहनत करने के लिए उत्साहित किया है. देश में भारी भरतियों ने कल के प्रति उत्साह जगाया. जगहजगह जो कोचिंग क्लासें खुलीं इस का सुबूत है कि देश का युवा कम से कम पढ़ने को तो उत्सुक हुआ था, पर अब जिस तरह की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, देश का युवा निराशाजनक हालत में हैं.

उम्मीद करनी चाहिए कि यह पासिंग फेज है. दुनिया की सोच बदलेगी. जैसे फ्रांस में इमैनुअल मैक्रौन ने नई सोच दी है वैसी ही दूसरे देश देंगे और ट्रंप व थेरेसा मे (इंगलैंड की प्रधानमंत्री) जैसे संकीर्ण नेताओं को कल को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाएगा. युवा भारत को हार मानने की जरूरत नहीं. हमारी जर्नी तो अभी शुरू हुई है.

रसिका दुग्गल ने जीता सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार

2014 में पेशावर के एक स्कूल पर हुए वीभत्स व दर्दनाक आतंकवादी हमले पर एक काल्पनिक लघु फिल्म ‘‘द स्कूल बैग’’ का निर्माण किया गया है. इस हादसे में 132 मासूम बच्चे मारे गए थे. धीरज जिंदल निर्देशित इस फिल्म में एक मां और उसके स्कूल बैग की कहानी है. इस फिल्म में मां का किरदार रसिका दुग्गल तथा उनके बेटे की भूमिक सरताज कक्कड़ ने निभायी है. अब तक इस फिल्म को 22 अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया गया है. हाल ही मे इसी फिल्म के लिए हरियाणा में संपन्न लघु फिल्म समारोह में रसिका दुग्गल को सर्वश्रेष्ठ अदाकारा के पुरस्कार से नवाजा गया.

फिल्म ‘‘द स्कूल बैग’’ की कहानी के अनुसार रसिका दुग्गल एक ऐसी मां हैं, जो कि अपने बच्चे की खुशी के लिए कुछ भी कर सकती हैं. पर जब एक दिन उसे सिर्फ अपने बच्चे का स्कूल बैग मिलता है, तो क्या होता है. यह एक मार्मिक कहानी है.

खाट की तरह लुट गई ‘योगा मैट’

प्रधानमंत्री के योगा इवेंट के लिये लाई गई ‘योगा मैट’ वैसे तो हर प्रतिभागी को मुफ्त में अपने साथ ले जानी थी. प्रधानमंत्री के योग में हिस्सा लेने वालों का जो अनुमान उत्तर प्रदेश की सरकार और जिला प्रशासन से लगाया था उससे कम लोगों ने योग में हिस्सा लिया. जिससे तमाम लोगों के लिये लाई गई योगा मैट खाली रह गई. बरसात से बचने के लिये पहले योग करने आये लोगों ने योगा मैट को अपने सिर पर रखकर पानी का बचाव करने के लिये प्रयोग किया. जब वह घर वापस जाने लगे तो अपने साथ एक ही नही कई कई मैट ले जाने लगे. जिसके हाथ जितनी मैट मिली वह उतनी ही लेकर जाने लगा. केवल योग करने गये लोग ही योगा मैट नहीं ले जा रहे थे वहां तैनात सुरक्षा कर्मी भी हाथ साफ करने में पीछे नहीं रहे.

सिंथेटिंक रबर से बनी योगा मैट की खरीद एलडीए यानि लखनऊ विकास प्राधिकरण ने 193 रूपये में की थी.प्रशासन को पता था कि योग मैट को वापस लेना संभव नहीं है ऐसे में योग करने वालों को एक मैट अपने साथ ले जाने की इजाजत थी. जिस संख्या में योग मैट बिछाई गई थी उस संख्या में लोग वहां आये नहीं, जिससे खाली पड़ी मैट को लोग अपने साथ लेकर जाने लगे. जब इस बात की जानकारी प्रशासन को हुई तो गेट पर तलाशी शुरू हो गई. जिसमें कई लोगों के पास योग मैट एक से अधिक मिली. प्रशासन ने एक अधिक मैट ले जाने वालों को मैट वहीं छोड कर जाने को कहा.

तब पता चला कि एक एक के पास 20 से 25 मैट का बंडल मिला. लोगों ने जब गेट के पास मैट छोड दी तो वहां मैट का ढेर लग गया. पता चला बाद में यह मैट दूसरे कई लोग उठा कर ले गये. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के योग शिविर में जिस तरह से योग मैट की लूट मची, उसी तरह कुछ समय पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सभाओं से चारपाई यानि खाट की लूट हो गई थी. इससे साफ लगता है कि लोग किसी भी वर्ग के हो वह अपनी आदत से बाज नहीं आ सकते. लोग बातें भले ही बड़ी बड़ी कर लें, पर असल में वह अपनी मानसिकता नहीं छोड़ सकते. मंदिर जाने वाले तक चप्पल की चोरी करने से बाज नहीं आते. ऐसे में बदलाव की उम्मीद करना उचित नहीं है.

मुफ्त नहीं है बैंक की कोई भी सेवा

बैंक अपने ग्राहकों के समक्ष तमाम तरह की योजनाओं की जानकारी पेश करते हैं. हालांकि इनमें से कोई भी पेशकश मुफ्त नहीं होती है. बैंक, अकाउंट खुलवाने से लेकर अकाउंट बंद करवाने तक बैंक एक न्यूनतम शुल्क वसूलते हैं. हालांकि बैंक के नियम व शर्तों में इसका बाकायदा उल्लेख होता है, लेकिन खाता खुलवाते समय अक्सर बैंक अपने ग्राहकों को तमाम बातें नहीं बताते हैं. बैंक की ओर से वसूले जाने वाले ऐसे शुल्क जिसकी जानकारी बैंक नहीं देते हैं.

अकाउंट बंद करने के लिए बैंक का शुल्क

आमतौर पर ग्राहकों को यह बात पता नहीं होती है. अगर आप बैंक का अकाउंट बंद करवाना चाहते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि बैंक इसके लिए भी शुल्क वसूलता है. अगर आपके खाते को तीन महीने भी नहीं हुए है और आप उसे किसी कारण बंद करवाना चाहते हैं तो आपको इसे बंद करवाने की एवज में बैंक को 50 से 200 रुपए तक देने पड़ सकते हैं.

12 बार बैंक जाकर किया ट्रांजैक्शन तो बैंक वसूलेगा शुल्क

आमतौर पर लोग एटीएम से पैसा निकालने के बजाए बैंक जाकर ऐसा करना मुनासिब समझते हैं. अगर आप भी ऐसा सोचते हैं कि ऐसा कर आप शुल्क बचा रहे हैं तो आपको गलतफहमी है. ऐसा इसलिए क्योंकि अगर, आपने एक तिमाही के दौरान अपनी ब्रांच से 12 से ज्यादा बार लेन-देन किया है, तो आपके अकाउंट से 50 रुपए प्रति ट्रांजैक्शन के हिसाब से रकम काटी जाती है. हालांकि यह चार्ज ज्यादातर प्राइवेट बैंक ही वसूलते हैं.

दूसरी ब्रांच में लेन-देन है महंगा

जिस बैंक में आपका खाता है आपके लिए उसी ब्रांच से पैसा निकालना बेहतर रहता है. अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो यह गलत है. ऐसा इसलिए कि अगर आप अलग किसी और ब्रांच में जाकर लेन-देन करते हैं आपको इसके लिए भी पैसे चुकाने होते हैं. निजी क्षेत्र के बैंक पहली बार ऐसे लेन-देन का चार्ज नहीं लेते हैं, लेकिन इसके बाद हर लेनदेन पर प्रति हजार पांच रुपए चार्ज वसूला जाता है.

मंथली स्टेटमेंट चार्ज

जैसा कि हमने ऊपर बताया है कि बैंक की तरफ से दी जाने वाली कोई भी सेवा मुफ्त नहीं होती है. ऐसे में अगर आप चाहते हैं कि हर महीने आपके घर बैंक स्टेटमेंट भेजा जाए, तो बैंक इसके लिए भी चार्ज वसूलते हैं. अलग-अलग बैंकों के हिसाब से इसकी कीमत अलग-अलग होती है. ज्यादातर बैंकों में यह कीमत 200 रुपए तक है. हालांकि, ईमेल से स्टेटमेंट मंगवाने पर कोई शुल्क नहीं लगता है.

चेक के स्टेट्स पर शुल्क

यह बात आपको सुनने में थोड़ी अजीब सी लग सकती है. अगर आप अपने चेक का स्टेटस जानना चाहते हैं, तो कई प्राइवेट बैंक इसके लिए भी शुल्क वसूलते हैं. इस सर्विस के लिए बैंक 25 रुपए तक वसूलते हैं.

लॉन्ग टाइम कस्टमर प्रिविलेज

आमतौर पर बैंक भी अपने पुराने और लॉयल कस्टमर को ज्यादा वरीयता देते हैं, लेकिन अधिकांश बैंक इस तरह की जानकारी अपने ग्राहकों को नहीं देते हैं. अगर आप सजग हैं तो इस बारे में आपको खुद बैंक से पूछना होगा. जानकारी के मुताबिक बैंक अक्सर अपने पुराने ग्राहकों को फीस वेवर(बैंक में लगने वाले चार्ज में छूट) दे देते हैं.

अधिक ब्याज दर वाले अकाउंट

इसकी जानकारी भी बैंक अपने ग्राहकों को नहीं देते हैं. बैंक में कुछ ऐसे अकाउंट होते हैं जिन पर ब्याज अधिक मिलता है. हर बैंक आपको इसकी जानकारी अपनी तरफ से देगा ही यह जरूरी नहीं है. बैंक के किस अकाउंट में कितना फायदा होगा इसका पता आपको खुद ही लगाना होगा.

डेबिट कार्ड खो जाए तो आपका अकाउंट कितना सुरक्षित  

डेबिट कार्ड खोने की सूरत में आपका अकाउंट कितना सुरक्षित है इसकी जानकारी भी कोई बैंक नहीं देता है. जानकारी के मुताबिक एसबीआई एक क्रेडिट कार्ड प्रोटेक्शन प्लान (CPP) देता है, जो इस तरह की परिस्थितियों में आपके लिए मददगार होता है. ऐसे में आपको खुद अपने बैंक से पता करना होगा कि क्या उनके पास भी ऐसी ही कोई स्कीम है.

जब भी कोई युवक किसी युवती से पहली बार शारीरिक संबंध बनाता है तो बहुत दर्द होता है. क्या यह सच है.

सवाल

मैं 24 वर्षीय अविवाहित युवती हूं. मुझे यौन संबंधों के विषय में बिलकुल भी जानकारी नहीं है. मुझे अपनी सहेलियों से पता चला है कि जब भी कोई युवक किसी युवती से पहली बार शारीरिक संबंध बनाता है तो बहुत दर्द होता है. क्या यह सच है? ऐसा क्यों होता है?

जवाब

जब भी कोई युवती किसी युवक के साथ पहली बार शारीरिक संबंध बनाती है तो थोड़ा दर्द होता है. कारण, समागम के दौरान स्त्री की कौमार्य झिल्ली फटती है, जिस से हलका सा रक्तस्राव भी होता है. यह स्वाभाविक प्रक्रिया है.

पर यह कोई जरूरी नहीं है कि प्रथम समागम में रक्तस्राव हो ही. साइकिल चलाने, रस्सीकूद, कामकाज के दौरान कभीकभी यह झिल्ली अपनेआप फट जाती है, जिस से प्रथम समागम के दौरान रक्तस्राव नहीं होता.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

क्या चलता है हमारे दिमाग में

इंसान को अंतरिक्ष की सैर कराने के सपने को पूरा करने में लगे स्पेस ऐक्स व टेस्ला जैसी कंपनियों के सीईओ एलन मस्क ने एक नया सपना देखा है, इंसानी दिमाग को कंप्यूटर से जोड़ देने का. अकसर इंसानी दिमाग और कंप्यूटर की जंग चलती रही है और कईर् रोमांचक दिमागी खेलों में इंसान कंप्यूटर से बाजी हार चुका है, शायद यही कारण है कि एलन मस्क कंप्यूटर और इंसानी दिमाग को एकसाथ कर देना चाहते हैं. इस के लिए उन्होंने एक नई कंपनी न्यूरालिंक कौरपोरेशन बनाई है, जो मनुष्यों के दिमाग में बेहद सूक्ष्म इलैक्ट्रोड इम्प्लांट करेगी.

उद्देश्य

आखिर इंसानी दिमाग में इलैक्ट्रोड फिट करने का मकसद क्या है? इस बारे में एलन मस्क बताते हैं कि ऐसा होने पर हम आसानी से जान सकेंगे कि सोतेजागते किसी इंसान के दिमाग में क्या चल रहा है. हमारे भाव, विचार, सपने, ये सब इलैक्ट्रोड्स के जरिए आसानी से कंप्यूटर में डाउनलोड किए जा सकेंगे और इसी तरह यदि किसी की याद्दाश्त चली गई, तो भाव, विचार, सपने और पुरानी यादें उस के दिमाग में अपलोड की जा सकेंगी, बशर्ते उन्हें पहले से कंप्यूटर में इसी तकनीक से सहेज कर रखा गया हो.

एलन मस्क ने इस तकनीक को एक नया नाम ‘न्यूरल लेस’ दिया है. मस्क की इस कंपनी न्यूरालिंक कौरपोरेशन का पहला औफिस अमेरिका के कैलिफोर्निया में खोला गया है. यहां कंपनी के कर्मचारी कुछ अन्य दिमागी विकारों, जैसे कि डिप्रैशन और पर्किंसंस जैसे रोगों के इलाज के लिए कंप्यूटर तकनीक का विकास भी करेंगे.

दरअसल, विज्ञान की तरक्की के बावजूद इंसान के दिमाग का विकास कैसे होता है? यह कैसे काम करता है? कैसे एकजैसे विचार एक से ज्यादा दिमागों में सूझ जाते हैं? जैसे प्रश्न खुद इंसान के लिए पहेली बने हुए हैं. हालांकि पिछले कुछ समय से लग रहा है कि इन प्रश्नों का कुछ हद तक हल मिल जाएगा.

प्रयोगशाला में इंसानी दिमाग जैसी संरचना बना लिए जाने, एक विचार को दूसरे दिमाग तक टैलीपैथी के जरिए पहुंचा देने के करिश्मे और दिमाग को पढ़ने के लिए तमाम परियोजनाएं शुरू होने के आधार पर कहा जा सकता है कि जल्दी ही हमारा अपना दिमाग हमारे काबू में होगा.

टैलीपैथी का सच

वर्ष 2014 में हार्वर्ड मैडिकल कालेज के प्रोफैसर अल्वारो की निगरानी में एक प्रयोग किया गया, जिसे टैलीपैथी का सफल प्रयोग माना गया. इस प्रयोग के तहत दुनिया में पहली बार कंप्यूटर की मदद से एक इंसानी दिमाग का विचार 5 हजार किलोमीटर दूर बैठे दूसरे इंसान के दिमाग में सिर्फ सोचने भर से पहुंचाया गया.

ब्रेन टू ब्रेन कम्युनिकेशन का यह प्रयोग एक छोर पर भारत के तिरुअनंतपुरम में और दूसरे छोर पर फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में बैठे व्यक्तियों के बीच किया गया. तिरुअनंतपुरम में बैठे एक व्यक्ति ने जो कुछ सोचा, उसे दूसरे छोर पर मौजूद लोगों ने हूबहू पढ़ लिया.

टैलीपैथी के इस क्रांतिकारी प्रयोग के तहत शोधकर्ताओं ने इलैक्ट्रोइनसैफलोग्राफी (ईईजी) हैडसैट की मदद से ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस (बीसीआई) तकनीक का इस्तेमाल किया था. तिरुअनंतपुरम में बैठे व्यक्ति ने अपने दिमाग में 2 फ्रांसीसी शब्द होला और स्याओ (अंगरेजी के संबोधन, हलो और जवाबी हलो के प्रतीक) सोचे थे, जिन्हें दूसरे छोर पर इन्हीं शब्दों के रूप में डीकोड करते हुए पढ़ लिया गया.

एक परिपक्व टैलीपैथी की नजर में यह प्रयोग बेहद आरंभिक है, लेकिन इस सिलसिले में काम कर रहे वैज्ञानिकों का दावा है कि 2045 तक इंसानी दिमाग को पूरी तरह कंप्यूटर पर अपलोड कर के उस की एकएक हरकत को पढ़ और समझ लिया जाएगा. तब इंसानी दिमाग का कोई रहस्य शेष नहीं रह जाएगा.

मशीन से जुड़ा दिमाग

मशीन यानी कंप्यूटर और जीवों के दिमाग को जोड़ने वाला एक करिश्मा प्रयोगशाला में हो चुका है. अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी मैडिकल सैंटर और जापान साइंस ऐंड टैक्नोलौजी एजेंसी के वैज्ञानिकों ने एक बंदर के  दिमाग से रोबोट को संचालित कर के ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है. इस परीक्षण के अंतर्गत एक खास तरह की ट्रेडमिल पर एक बंदर को चलाया गया और उस के दिमाग से जोड़े गए इलैक्ट्रोड्स से प्राप्त संकेतों को ह्यूमनाइड रोबोट तक भेजा गया.

इस प्रयोग में रोबोट ने न सिर्फ बंदर की तरह धीमेतेज चलने की गति का अनुसरण किया, बल्कि चलने का उस का पैटर्न भी बिलकुल बंदर जैसा ही था. जैसे कि रोबोट उस समय भी चलता रहा, जब बंदर ने ट्रेडमिल पर चलना बंद कर दिया था. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बंदर ने रुक जाने के बाद भी चलने के बारे में सोचना बंद नहीं किया था यानी रोबोट ने बंदर के दिमाग के न्यूरौन्स की गतिविधियों को पढ़ लिया था. हालांकि अभी यह प्रयोग इंसानों पर आजमाया नहीं गया है, लेकिन हो सकता है कि एलन मस्क की कंपनी इसी तरह के किसी करिश्मे को साकार कर दिखाए.

रोजगार से दिमाग का कनैक्शन

यह बात भी किसी रहस्य से कम नहीं है कि दुनिया में कुछ खास इलाके, समुदाय और प्रजाति से जुड़े लोग ही दिमागी काम करने में क्यों आगे रहते हैं? क्यों दूसरी प्रजातियों, इलाकों के लोग इस मामले में पिछड़ जाते हैं? जैसे दावा किया जाता है कि नोबेल पुरस्कारों में पश्चिमी देशों के आगे रहने के पीछे उन देशों व इलाकों के लोगों के दिमागों की अनूठी बनावट जिम्मेदार है. इसी तरह रोजगारों में चीन व भारत के लोग अपने दिमाग की वजह से आगे हैं. इस रहस्य को सुलझाने के उद्देश्य से ह्यूमन कनैक्टोम प्रोजैक्ट नामक परियोजना अमेरिका में चलाई जा रही है.

ह्यूमन जीनोम प्रोजैक्ट की तरह ही इस परियोजना के जरिए जुटाया गया तमाम डाटा सार्वजनिक कर दिया जाएगा ताकि दुनिया में कहीं भी वैज्ञानिक इस का परीक्षण कर सकें. परियोजना के तहत वैज्ञानिक करीब 1,200 अमेरिकी लोगों के दिमाग को स्कैन कर के मनुष्य के दिमाग को समझने का प्रयास कर रहे हैं. इस परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक दिमाग के स्कैन चित्रों को देख कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मनुष्य का दिमाग कैसे काम करता है और तब क्या होता है, जब कुछ गड़बड़ हो जाती है?

वैसे तो इस परियोजना का उद्देश्य मूल रूप से मानव मस्तिष्क की अंदरूनी संरचनाओं को समझना और दिमागी जटिलताओं को दूर करने के उपाय खोजना है, लेकिन प्रोजैक्ट को लौंच करते वक्त पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने एक अलग और ज्यादा नोटिस करने वाली बात भी कही थी.

ब्रेन रिसर्च थ्रू अडवांसिंग इनोवेटिव न्यूरोटैक्नोलौजीज के जरिए दिमाग को पढ़ने की इस कोशिश का एक कारण उन्होंने रोजगारों पर भारतीय और चीनियों का दबदबा खत्म करना बताया था.

उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि जब पूरी दुनिया में अवसरों को ले कर होड़ मची हो, तो अमेरिकियों के हित में यही होगा कि वे मौकों को हाथ से निकलने न दें. उन का आशय इस ओर था कि रोजगार पैदा करने वाली खोजें अमेरिका में हों, न कि भारत, चीन या जरमनी में.

मैं अपने करियर से संतुष्ट हूं : सलमान खान

फिल्म ‘बीवी हो तो ऐसी’ फिल्म से कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता सलमान खान की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ उनके जीवन की एक टर्निंग पॉइंट फिल्म थी. इसके बाद फिल्मों की इतनी झड़ी लग गयी कि उन्हें कभी पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा. वे इंडस्ट्री के मशहूर अभिनेता तो हैं ही, इसके साथ-साथ निर्माता और टीवी पर्सनालिटी भी है. उन्होंने कैरियर में हर तरह की फिल्मों में काम किया और कामयाबी धीरे-धीरे पाई. उनकी चर्चित फिल्में ‘हम आपके हैं कौन’, ‘करण अर्जुन’, ‘तेरे नाम’, ‘बीवी नंबर वन’, ‘वांटेड’, ‘मुझसे शादी करोगी’, ‘नो एंट्री’ आदि सभी प्रकार के रोमांटिक, एक्शन और इमोशनल फिल्में हैं.

सलमान ने फिल्म इंडस्ट्री में एक लम्बी पारी बितायी है और आज भी अपने अभिनय के बल पर सबको आकर्षित करते हैं. उनके फैन-फोलोवर्स की संख्या करोड़ों में है. आज भी उनकी बिल्डिंग के सामने उनके फैन्स, उनकी एक झलक पाने के लिए घंटो खड़े रहते हैं. सलमान इसे लोगों का, उनसे प्यार मानते है और इसे एन्जॉय करते है.

सलमान का फिल्मी कैरियर भले ही कितनी ऊंचाई पर पहुंचा हो, लेकिन उनका प्यार उन्हें कभी नहीं मिला. उन्होंने कई अभिनेत्रियों को बॉलावुड इंडस्ट्री में पैर जमाने में मदद भी की. सलमान के साथ कई हिरोइन्स के अफेयर के काफी चर्चे सुने गए, पर वे उस प्यार को पाने में कामयाब नहीं हुए. इसमें सोमी अली, संगीता बिजलानी, ऐश्वर्या राय, कैटरीना कैफ और अब लुलिया वेंतुर का नाम जुड़ रहा है. इतना ही नहीं सलमान कई बार अपनी हरकतों से मीडिया के सुर्खियों में रहे, जिसमें राजस्थान में काले हिरण का शिकार, मुंबई में हिट एंड रन केस जिसमें सबसे चर्चित मामला, नशे की हालत में सड़क किनारे सो रहे लोगों को गाड़ी से कुचल देने का था.

सलमान अपनी कामयाबी और कैरियर से संतुष्ट हैं और आगे भी फिल्में ही करने की इच्छा रखते हैं. इन दिनों वे अपनी फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ के प्रमोशन में व्यस्त हैं. आइये जानते हैं क्या कहते है वे अपने बारें में…

फिल्म का नाम ट्यूबलाइट रखने की वजह क्या है?

ट्यूब लाइट रखने की वजह यह है कि इसके किरदार को कुछ समझने में समय लगता है. जब एक बार यह समझ जाता है तो सबको साथ लेकर चलता है. उसकी मासूमियत ही उसे सबका प्रिय पात्र बनाती है. ये दो भाइयों की कहानी है. जिसमें भारत और चीन की जंग के समय वे किन हालातों से गुजरते हैं, ये दिखाया गया है. इसमें उनके रिश्ते और इमोशन को अधिक महत्व दिया गया है. अब तक भाइयों पर ऐसी फिल्म नहीं बनी है और इस फिल्म में दो रियल ब्रदर काम कर रहे है.

क्या रियल भाई होने से काम करना आसान रहा?

रियल भाई होने से दोनों का एक साथ बड़े होना, आपस की नोंक-झोंक, प्यार इमोशन्स सबको दिखाना आसान रहा. अगर कोई दूसरा इस भूमिका में होता, तो वह कोई बड़ा स्टार ही उस रोल में होता, इससे कलेक्शन बढ़ सकता था, लेकिन सोहैल खान इस फिल्म के निर्माता हैं और एक्टर के रूप में वे अधिक कामयाब नहीं रहा. वैसे उसने एक्टिंग के लिए अधिक समय भी नहीं दिया. वो निर्माता-निर्देशक के रूप में ही अधिक एक्टिव रहा. पहले शुरू में सोचा गया कि कोई और इस भूमिका को करें, लेकिन बाद में लगा कि मेरा काम बढ़ जायेगा. अगर मैंने अभिनय में कुछ भी कमी की, तो ये कार्टून वाला चरित्र बन जायेगा. मैं खुश हूं कि निर्देशक कबीर खान ने सोहैल को इस भूमिका के लिए चुना.

हम दोनों असल भाई हैं और दोनों भाई की बॉन्डिंग और केमिस्ट्री ओरिजिनल है. इसके लिए मुझे अधिक मेहनत नहीं करनी पडी और दर्शकों को भी पसंद ये आयेगा. मेरे दोनों भाई अरबाज और सोहैल मुझसे छोटे हैं, पर सोहैल ही इस भूमिका के लिए फिट है.

फिल्म में आपने एक मासूम बच्चे की भूमिका निभाई है, क्या आपको लगता है कि आज के बच्चे इतने मासूम है?

पहले के बच्चे मासूम होने पर समझदार कम होते थी, आजकल के बच्चे मासूम होने के साथ-साथ प्रतिभावान, बहुत कम उम्र में ही हो जाते है. उनके प्रश्न इतने जटिल होते हैं कि उसका उत्तर देना कठिन हो जाता है. ये आज की तकनीक का प्रभाव है, जिसकी वजह से कम उम्र में ही बच्चे सब जान जाते हैं. मुझे ख़ुशी होती है कि मेरे घर के सभी बच्चे अच्छी तरह ग्रो कर रहे है.

आपने कई नए कलाकारों को फिल्मों में काम करने का अवसर दिलाया है, क्या कभी धोखा हुआ है?

अधिक धोखा नहीं मिला. कई बार मैं जल्दी समझ जाता हूं कि इंसान गलत है या सही. कभी देर से समझता हूं, कई बार तो समझने में काफी देर हो जाती है. मैं उसे ही काम देता हूं, जिसमें प्रतिभा है. बहुत सारे ऐसे यूथ है जो हीरो या हिरोइन बनने के लिए मेरे पास आते हैं. मैं उनको समझाता हूं कि फिल्मों के अलावा टीवी भी एक बड़ी संस्था है, जिसने कलाकारों को फलने-फूलने का पूरा मौका दिया है.

मीडिया किसी कलाकार की आगे बढ़ने में कितनी मदद करती है?

पहले इतनी बड़ी मीडिया नहीं थी. दो चार गिने चुने अखबार और मैगजीन हुआ करते थे और मेरे पिता का रिश्ता हर प्रोडूसर, डिरेक्टर के साथ अच्छा था, हर कोई उन्हें सम्मान देता था. मीडिया भी इन सभी रिश्तों को सोच समझकर लिखा करती थी. आज की मीडिया अलग और बहुत संख्या में है. हर किसी की एक दूसरे से प्रतियोगिता है. हर कोई एक बड़ी ‘हेडलाइन’ चाहता है, ऐसे में कुछ भी मिले, उसी को बढ़ा-चढ़ाकर लिख देते हैं. उस समय सही रिपोर्टिंग हुआ करती थी, किसी ने जो भी कहा, उसे उसी तरह लिखकर छापा जाता था. कुछ गलत भी अगर उसने कहा हो तो उसे थोडा माइल्ड करके, पत्रकार छापते थे. वरिष्ठ रिपोर्टर और बड़ी पत्रिकाएं आज भी सही रिपोर्टिंग करती हैं. ऐसी हरकते अधिकतर यूथ रिपोर्टर ही करते हैं.

क्या आप अपनी जर्नी से खुश है?

हां मैं बहुत खुश हूं. मैंने जो सोचा भी नहीं था, उससे कही अधिक सफलता मिली है.

आप सभी में पारिवारिक एक-रूपता कैसे बनी रहती है?

ये सही है कि परिवार के सभी सदस्य अलग रहते हैं, सबका अपना परिवार है, लेकिन एकसाथ मिलने या किसी खास मौके को सेलिब्रेट करने में सभी ‘गैलेक्सी’ में ही आते हैं. होम का अर्थ ‘गैलेक्सी’ ही है. ये सालों से चली आ रही है.

किसी खास त्यौहार पर फिल्म रिलीज करने की खास वजह क्या है?

त्यौहार पर लोग मिलते हैं और साथ मिलकर खुशियां मनाते हैं, इसलिए उस समय फिल्में रिलीज करने पर लोग देखना पसंद करते हैं.

बारिश के मौसम में अपने गैजेट की ऐसे करें सुरक्षा

बारिश का मौसम मतलब मानसून अब आ गया है. इस मौसम इलेक्ट्रॉनिक एप्लायंसेज, स्मार्टफोन, टेबलेट और गैजेट विशेष रख-रखाव की मांग करते हैं. आपने कभी ध्यान दिया है की बारिश के मौसम में हवा में मॉइस्चर के चलते आपके गैजेट या इलेक्ट्रॉनिक एप्लायंसेज में गड़बड़ी देखने को मिलती है. हवा का मॉइस्चर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए सही नहीं होता. तो इस मानसून आप अपने गैजेट्स को बचाकर किस तरह यह मौसम एन्जॉय करें. इस परेशानी का समाधान कुछ आसान से तरीकों को अपना कर किया जा सकता है. आपके गैजेट्स इस मौसम में भी अच्छे से कार्य करते रहें इसके लिए कुछ टिप्स आपको फॉलो करनी होंगी.

भारी बारिश में एप्लायंसेज को करें अनप्लग

भारी बारिश में वोल्टेज फ्लक्चुएशन और पावर कट जैसी परेशानियां होती रहती हैं. आपकी एप्लायंसेज इस पावर फ्लक्चुएशन से खराब हो सकती हैं. तो ऐसे समय में बेहतर होगा की आप अपनी इलेक्ट्रॉनिक एप्लायंसेज को अनप्लग कर के रखें ताकि किसी भी तरह के नुकसान से बचा जा सके.

गैजेट्स का केस हो वाटरप्रूफ

मानसून के मौसम में कभी भी बारिश आ सकती है. ऐसे में जरुरी नहीं की आप अपनी डिवाइस को भीगने से बचाने के लिए तैयार हो. ऐसे में वाटरप्रूफ केस से आप अपनी डिवाइस को डैमेज से बचा सकते हैं. अगर आप केसेस नहीं खरीद सकते, तो घर में किसी मोटे पॉलीबैग को अपनी डिवाइस के आकर में काटकर अपने पास रख लें. बारिश में इसका इस्तेमाल कर अपनी डिवाइस को भीगने से बचाएगा.

फंगल ग्रोथ को रोकें

हवा में मॉइस्चर से आपके गैजेट्स या एप्लायंसेज में फंगल ग्रोथ होने का डर रहता है. ऐसे में सूखे कपड़े से थोड़े-थोड़े समय में कॉम्पैक्ट और नम जगहों पर अपने गैजेट्स और एप्लायंसेज को साफ करते रहें.

एप्लायंसेज का इस्तेमाल जरूरी

अधिक मॉइस्चर होने के कारण आपकी एप्लायंसेज या गैजेट्स जैम या डैमेज हो सकते हैं. इसलिए हफ्ते में एक से दो बार इनका प्रयोग जरूर करें, ताकि वो काम करने की स्थिति में रहें.

‘योगा डे’ बन गया ‘रेनी डे’

तीसरे विश्व योगा डेको सफल बनाने के लिये केन्द्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरी ताकत लगा दी. योगा डेपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लखनऊ के रमा देवी अम्बेडकर पार्क में आने वालों को योग करने के लिए चटाई, टीशर्ट, नाश्ता और पानी से लेकर बहुत सारे इंतजाम प्रदेश सरकार ने किये.

योग करने वालों को कहा गया कि वह सब सुबह 5 बजे से पहले पार्क में पहुंच जायें. सबके लिये रजिस्ट्रेशन किया गया था और सबकी योग करने की जगह को भी फिक्स कर दिया गया था. हर योग करने वाले को पहले से तय चटाई पर ही योग करना था. रात में ही बदले मौसम को देखते हुये सभी योग करने वालों को यह मैसेज भेज दिया गया कि अगर योग करते समय बरसात शुरू हो जाती है तो आपको कहीं भागना नहीं है. तय जगह पर ही बने रहना है. उस समय तक बरसात की संभावना कम थी.

21 जून की सुबह जब योगा शुरू हुआ तो बरसात भी शुरू हो गई. ऐसे में योगा डे रेनी डे बन गया. लोगों ने योग करने वाली चटाई को ही अपने सिर पर डाल कर पानी से अपना बचाव किया. ऐसे में योग करने का न तो सही से समय मिल पाया और न ही योग हो पाया. योग करने की तैयारी पूरे शहर में बड़े पैमाने पर चल रही थी. लोगों को योग करने से अधिक प्रधानमंत्री के साथ योग करने की खुशी थी. अफसोस की बात यह थी कि योग करने से पहले ही लोगों के मोबाइल फोन जमा करा लिये गये थे जिससे वह सेल्फी लेने से वंचित रह गये.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 20 जून को भी लखनऊ में थे. पूरे शहर में वीवीआईपी मूवेंट की वजह से जाम लगा रहा. इसको लेकर राजधानी के लोग परेशान रहे.

योगा में हिस्सा लेने वालों में आम जनता से अधिक स्कूली बच्चे और सरकारी कर्मचारियों की संख्या अधिक थी. पुलिस और सुरक्षा में लगे तमाम जवान भी इस योगा का हिस्सा बने थें. योगा डे में प्रधानमंत्री के शामिल होने से पूरी राजधानी लखनऊ में ट्रैफिक जाम के हलात रही. लालबत्ती हटने से वीआईपी कल्चर से मुक्ति की चाह रखने वालों को तब गहरा झटका लगा जब उनको घंटों गरमी और उमस भरे माहौल का सामना करना पडा. कई लोगों को सड़क पर खड़ी गाडियों में ही समय बिताना पडा. योगा डे पर बरसात ने लोगों की उम्मीदों पर भी पानी फेरने का काम किया.

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