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दुनियाभर में छाया बीबर का फीवर

कनाडाई पौप सिंगर जस्टिन बीबर के आज दुनिया में करोड़ों प्रशंसक हैं. इस साल भारत से उन का नाता तब जुड़ा, जब 10 मई, 2017 को एक प्रमोशनल टूर (पर्पज वर्ल्ड टूर) पर अपनी मां पैट्रिशिया मैलेट के साथ वे मुंबई पहुंचे. 9 मार्च, 2016 को सिएटल से शुरू हुआ यह वर्ल्ड टूर 24 सितंबर को जापान के टोक्यो में खत्म हुआ.

मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में आयोजित कंसर्ट में बीबर ने करीब 50 हजार युवाओं के बीच अपने कई हिट पौपसौंग जैसे कि ‘सौरी…’, ‘कोल्ड…’, ‘वाटर…’, ‘आई विल शो यू…’, ‘व्हेयर आर यू नाउ…’, ‘बौयफ्रैंड’ और ‘बेबी…’ गा कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. बीते कई वर्षों में यह पहला मौका था, जब किसी विदेशी पौप सिंगर को ले कर भारत में इतना जबरदस्त उत्साह देखने को मिला.

इस उत्साह के पीछे असल में बीबर की कई खासीयतें रही हैं. बीबर युवा हैं और कई विवादों से उन का नाता है. सिंगिंग स्टाइल उन का खास है और कई मुद्दों पर उन की राय सब से अलग है.

इन बातों ने जस्टिन को इतना चर्चित बना दिया कि आयोजकों को मुंबई के शो पर 100 करोड़ रुपए खर्च करने में कोई परेशानी नहीं हुई. दावा है कि मुंबई में हुआ जस्टिन का कंसर्ट अब तक का सब से महंगा कंसर्ट है, जिस में जस्टिन की फीस, ट्रैवलिंग, होटल व अन्य चीजों पर करीब 30 करोड़ और स्टेडियम में लगाए गए सैट आदि पर 26 करोड़ रुपए खर्च हुए. बिजनैस पत्रिका फोर्ब्स के मुताबिक, ‘वर्ष 2016 में जस्टिन बीबर ने 5.6 करोड़ डौलर यानी करीब 358 करोड़ रुपए की कमाई की थी और अब इस में और इजाफा हो सकता है.’

कौन हैं जस्टिन

महज 23 साल के ग्रैमी अवार्ड विजेता और दुनिया की सब से ताकतवर हस्ती की लिस्ट में एक मुकाम रखने वाले जस्टिन की जिंदगी की कहानी उन्हीं की तरह दिलचस्प है. जस्टिन की सफलता की कहानी 11 साल पहले 2006 में शुरू हुई थी, जब उन की मां ने उन्हें कुछ गाते हुए सुना और अपने फोन से उन का वीडियो बना लिया. इस वीडियो को उन्होंने यूट्यूब पर जस्टिन के पिता को शेयर कर दिया. यह वीडियो धीरेधीरे चर्चा में आया, लेकिन चमत्कार तब हुआ, जब एक बिजनैसमैन स्कूटर ब्रौन उभरते हुए गायकों की तलाश में यूट्यूब पर वीडियो सर्च कर रहे थे.

उन्होंने जस्टिन की मां पैट्रिशिया द्वारा शेयर किया गया वीडियो देखा और फिर उन से संपर्क साध कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. वर्ष 2007 के मशहूर गायक क्रिश ब्राउन के हिट गीत ‘विद यू…’ को गा कर जस्टिन लोगों की नजर में आ गए और उसी साल एक टैलेंट हंट शो में उन्होंने एकसाथ सारे जजों को अपना मुरीद बना लिया.

कनाडा के छोटे से कसबे स्ट्रैटफोर्ड (ओंटैरिओ) में 1 मार्च, 1994 को जन्मे जस्टिन वैसे तो पिता जेरमी जैक बीबर और पैट्रिशिया मैलेट की संतान हैं, पर उन का पालनपोषण पैट्रिशिया की मदद से सौतेले पिता ब्रूस और सौतेली मां डायने ने किया. फिलहाल जस्टिन अपनी जैविक मां पैट्रिशिया के साथ ही रहते हैं, क्योंकि पैट्रिशिया ने ही छोटी सी नौकरी के जरिए मेहनत कर के जस्टिन को पालापोसा है.

गीतसंगीत से जस्टिन का लगाव स्ट्रैटफोर्ड स्थित सौवें कैथलिक स्कूल में ही हुआ था. वहां उन्होंने पियानो, ड्रम गिटार और ट्रंपेट बजाना सीखा. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 में जस्टिन ने स्टैनफोर्ड में आयोजित एक स्थानीय गीतसंगीत प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था और दूसरा स्थान हासिल किया था.

सोशल मीडिया की पैदाइश है जस्टिन

घर पर गाने गुनगुनाने और प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बाद मां पैट्रिशिया ने जस्टिन के कई वीडियो सोशल मीडिया पर डाले, जिस से जस्टिन चर्चा में आए. एक प्रकार से जस्टिन सोशल मीडिया की पैदाइश हैं, क्योंकि उन के कैरियर और उन्हें दुनिया में चर्चा में लाने में यूट्यूब का काफी योगदान रहा, पर सब से खास बात यह है कि जस्टिन को सोशल मीडिया से चिढ़ है. जस्टिन को पता है कि सोशल मीडिया ने ही उन्हें इतनी कामयाबी दिलाई है, लेकिन इस की वजह से निजी जिंदगी में पड़ने वाले खलल को ले कर वे परेशान रहते हैं. ट्विटर पर भी उन के करीब साढ़े 9 करोड़ फालोअर हैं.

इंस्टाग्राम पर होने वाली ट्रोलिंग यानी उन की हर गतिविधि पर कमैंटबाजी से परेशान हो कर अगस्त, 2016 में जस्टिन ने अपना अकाउंट ही डिलीट कर दिया था. जस्टिन का यह कदम प्रेरणादायक है. इस से उन्होंने यह साबित कर दिया कि सोशल मीडिया को खुद पर हावी न होने दें. आज जिस तरह से किशोर हर वक्त स्मार्टफोन, कंप्यूटर या लैपटौप पर इंटरनैट के जरिए किसी न किसी वैबसाइट पर चैटिंग करते रहते हैं, जस्टिन इस प्रवृत्ति के विरोधी हैं.

जस्टिन में क्या है खास

जस्टिन बीबर में ऐसा क्या खास है, जो युवा उन के दीवाने हैं. जस्टिन जब भारत आए तो उन के शो के टिकट 5 हजार रुपए से ले कर 76 हजार रुपए तक में बिके, जो लोग जस्टिन के शो के महंगे टिकट नहीं खरीद सकते थे, उन्हें ईएमआई का विकल्प दिया गया. मुंबई में जस्टिन को ले कर दीवानगी का आलम यह था कि उन के शो में आम दर्शकों के अलावा बौलीवुड के जानेमाने कलाकार भी पहुंचे. बीबर को देखने बौलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट, श्रीदेवी, जैकलीन फर्नांडिस, बिपाशा बसु, रवीना टंडन, महिमा चौधरी, मलाइका अरोड़ा और फिल्म निर्मातानिर्देशक अरबाज खान भी पहुंचे.

दावा किया गया कि दिल्ली की 12 साल की एक लड़की अक्षिता राजपाल अकेली हवाई सफर कर मुंबई जस्टिन का शो देखने पहुंची, हालांकि बाद में पता चला कि उस के साथ मांबाप तो नहीं, लेकिन कुछ पारिवारिक मित्र गए थे. बहरहाल, मुंबई में शो के सफल आयोजन के बाद जस्टिन ने अपने प्रशंसकों का आभार व्यक्त किया और कहा, ‘‘थैंक्यू इंडिया, मैं फिर आऊंगा.’’

वैसे हाल में जस्टिन को ले कर सब से ज्यादा उतावलापन ब्राजील में दिखा. वहां उन का शो अप्रैल, 2017 में होना था, लेकिन उन के फैन स्टेडियम के बाहर 5 महीने पहले से ही कैंप लगा कर डेरा जमाए बैठ गए. फैंस के 100 युवाओं के इस ग्रुप के लोग बारीबारी से रात को वहां आ कर सोते थे, ताकि जिस दिन आयोजित हो, तो उन्हें बैठने के लिए सब से अच्छी जगह मिल सके.

विवादों से नाता

यह अजीब बात है कि दुनिया में जो चर्चित लोग हैं, कई विवादों के साथ भी उन का नाम जुड़ जाता है. जस्टिन बीबर भी इस से अलग नहीं हैं. उन के साथ भी कई विवाद जुड़े हुए हैं. बेतरतीबी से कार चलाने, पड़ोसियों से झगड़ा करने, फैंस पर थूकने और कई विवादास्पद बयान देने के कारण जस्टिन को कोसा भी जाता है. वैसे उन्हें कानून तोड़ने के कारण सब से पहले 2014 में गिरफ्तार किया गया था.

2014 में कैलिफोर्निया स्थित उन के एक पड़ोसी ने बीबर पर अंडे फेंकने का आरोप लगाया था, जिस से काफी नुकसान हुआ था. इस के लिए बीबर को काफी बड़ा हर्जाना चुकाना पड़ा था.

हालांकि बीबर की कई हरकतें उन के फैंस को नागवार गुजरीं. जैसे, वर्ष 2013 में उन पर होटल की बालकनी से नीचे मौजूद फैंस की भीड़ पर थूकने का आरोप लगा था, लेकिन जस्टिन इस से साफ मुकर गए. हालांकि जस्टिन की कुछ हरकतें नजरअंदाज नहीं की जा सकीं, जैसे वर्ष 2013 में

बीबर जब नीदरलैंड्स में कौंसर्ट से पहले अपने दोस्तों के साथ ‘द ऐन फ्रैंक हाउस’ गए थे तो वहां उन्होंने गैस्ट बुक में लिखा, ‘ट्रूली इंस्पिरिंग टू बी ऐबल टू कम हियर. ऐन वौज अ ग्रेट गर्ल. होपफुली शी वुड हेव बीन अ बिलीबर.’ गैस्टबुक में ‘बिलीबर’ लिखने से काफी नाराजगी फैली, क्योंकि माना गया कि इस तरह उन्होंने ऐन फ्रैंक को अपना दीवाना बताने की कोशिश की.

उल्लेखनीय है कि जस्टिन बीबर के प्रशंसकों के लिए आमतौर पर बिलीबर शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. इस घटना को लोगों ने जस्टिन के अहंकार से जोड़ा. जस्टिन को कानून तोड़ने के लिए जाना जाता है. जैसे वर्ष 2014 में अमेरिका स्थित डिज्नी वर्ल्ड में लाइन में खड़े होने के बजाय उन्होंने इस के लिए व्हीलचेयर का इस्तेमाल किया. जस्टिन ने इस के लिए तर्क दिया, ‘आई डोंट डू लाइंस.’ ऐसा लगा कि वे यह कहना चाहते हैं कि मैं लाइन में लगने के लिए नहीं, अपने पीछे लाइन लगवाने में यकीन करता हूं. जस्टिन फैंस के साथ फोटो या सैल्फी खिंचवाने से भी परहेज करते हैं. इस के बारे में बीबर का कहना है कि इस से उन्हें एहसास होता है जैसे कि वे कोई ‘जू एनिमल’ यानी ‘चिडि़याघर में रखा कोई जानवर’ हैं.

बेमौत मारा गया काला

4 मार्च, 2017 की सुबह काम पर जाने के लिए जैसे ही मक्खन सिंह घर से निकला, सामने से जंगा आता दिखाई दिया. वह उसी की ओर चला आ रहा था, इस का मतलब था कि वह उसी से मिलने आ रहा था. उस ने जंगा से हाथ मिलाते हुए पूछा, ‘‘सुबहसुबह ही इधर, कोई खास काम…?’’

‘‘मैं तुम्हारे पास इसलिए आया था कि तुम्हें काले के बारे में कुछ पता है?’’

‘‘नहीं, उस के बारे में तो कुछ पता नहीं है. उस से तो मुझे जरूरी काम था, पर वह मिल ही नहीं रहा है.’’ मक्खन सिंह ने पछतावा सा करते हुए कहा.

‘‘मैं ने तो उसे कई बार फोन भी किया, पर बात ही नहीं हो सकी.’’

‘‘मैं तो उसे लगातार 3 दिनों से फोन कर रहा हूं. हर बार एक ही जवाब मिल रहा है कि उस का फोन बंद है. यार एक बहुत बड़ा ठेका मिल रहा है, पार्टी पैसे ले कर मेरे पीछे घूम रही है, पर काले के बिना बातचीत रुकी पड़ी है.’’ मक्खन सिंह ने कहा.

‘‘एक काम मेरे पास भी है. रेट भी ठीकठाक है, पर काले के बिना बात नहीं बन रही. पता नहीं वह कहां गायब हो गया है?’’

जंगा और मक्खन काफी देर तक काले के बारे में ही बातें करते रहे. अंत में कुछ सोचते हुए जंगा ने कहा, ‘‘मक्खन, क्यों न हम एक काम करें. हमारी एक दिन की मजदूरी का नुकसान तो होगा, पर काले के बारे में पता तो चल जाएगा.’’

‘‘लेकिन मुझे तो उस का घर भी नहीं मालूम.’’

‘‘घर तो मैं भी नहीं जानता, पर इतना जरूर जानता हूं कि वह बस्ती अजीतनगर में कहीं किराए पर रहता है. वहां चल कर लोगों से पूछेंगे तो कोई न कोई उस के बारे में बता ही देगा.’’

इस तरह जंगा और मक्खन काम पर जाने के बजाए काला की तलाश में अजीतनगर जा पहुंचे.

काला टोपी वाला के नाम से मशहूर नवनीत सिंह जंगा, मक्खन, रमेश और नरेश आदि के साथ मिल कर मकान बनाने का ठेका लेता था. सभी राजमिस्त्री थे, इसलिए सब मिलजुल कर काम करते थे और जो फायदा होता था, आपस में बांट लेते थे.

नवनीत सिंह काला टोपी वाला के नाम से इसलिए मशहूर हो गया था, क्योंकि उस का घर का नाम काले था. वह हर समय सिर पर काली टोपी लगाए रहता था, इसलिए लोग उसे काली टोपी वाले कहने लगे थे. काले बेहद शरीफ, नेकदिल और मेहनती युवक था.

वह जिला मानसा के गांव बीरखुर्द कलां के रहने वाले अजायब सिंह का बेटा था, लेकिन काम की वजह से वह लगभग 5 साल पहले जिला संगरूर में आ कर रहने लगा था. यहां उस का काम ठीकठाक चल निकला तो वह उपनगर बस्ती अजीतनगर में राकेश के मकान का एक हिस्सा किराए पर ले कर उसी में परिवार के साथ रहने लगा था. उस के परिवार में पत्नी कुलदीप कौर के अलावा 2 बच्चे थे.

नवनीत सिंह उर्फ काला टोपी वाला की शादी सन 2007 में कुलदीप कौर के साथ तब हुई थी, जब काला अपने मांबाप के साथ गांव में रहता था. एक दिन वह नजदीक के गांव में किसी के मकान की छत डाल रहा था, तभी उस की मुलाकात कुलदीप कौर से हुई थी. वह पड़ोस में रहती थी. काम करने के दौरान काला और कुलदीप कौर की आपस में आंखें लड़ गईं. मकान का काम पूरा होतेहोते दोनों में ऐसा प्यार हुआ कि दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

दोनों की जाति अलगअलग थी, इसलिए घर वाले शादी के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में एक ही सूरत थी कि वे घर से भाग कर शादी कर लें. आखिर उन्होंने यही किया. दोनों ने भाग कर शादी कर ली और अदालत में शादी रजिस्टर्ड करवा कर पतिपत्नी की तरह शान से रहने लगे. समय के साथ दोनों के परिवार भी शांत हो कर बैठ गए और उन का अपनेअपने घर आनाजाना शुरू हो गया.

काला का घर ढूंढते हुए जंगा और मक्खन दोपहर को राकेश घर पहुंचे तो जिस हिस्से में काला रहता था, उस के दरवाजे पर दस्तक दी. तब अंदर से पूछा गया, ‘‘कौन?’’

जंगा ने पूरी बात बता कर काला से मिलने की इच्छा जताते हुए कहा कि उस से उस का मिलना बेहद जरूरी है, क्योंकि उस की वजह से काम के साथसाथ पैसे का भी नुकसान हो रहा है.

पूरी बात सुनने के बाद कुलदीप कौर ने बिना दरवाजा खोले ही अंदर से कहा, ‘‘वह तो कहीं बाहर गए हैं. घर पर नहीं हैं. कब लौटेंगे, यह भी बता कर नहीं गए हैं. जब आएंगे, तब आ कर मिल लेना. अभी आप लोग जाइए.’’

कुलदीप कौर का टका सा जवाब सुन कर दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. कहां तो वे यह सोच कर आए थे कि काला मिले न मिले, उस के घर चायनाश्ता तो मिलेगा ही, लेकिन यहां तो चायपानी की कौन कहे, 2 बार कहने पर दरवाजा भी नहीं खुला.

कुलदीप कौर के इस व्यवहार से दोनों असमंजस में थे. मामला क्या है, उन की समझ में नहीं आ रहा था. बेआबरू हो कर वे दरवाजे से लौटने के लिए पलटे ही थे कि काला के पिता अजायब सिंह वहां आ गए. उन्होंने भी काला से मिलने के लिए दरवाजा खटखटाया, पर कुलदीप कौर ने यह कह कर दरवाजा नहीं खोला कि अभी वह कोई जरूरी काम कर रही है, इसलिए वह कल आएं.

जंगा और मक्खन अभी वहीं खडे़ थे. दोनों ससुर और बहू के बीच होने वाली बातें भी सुन रहे थे. अजायब सिंह बड़ी बेबसी से कह रहे थे, ‘‘3 दिनों से कोशिश कर रहा हूं अपने बेटे से मिलने की, पर यह औरत मिलने नहीं दे रही है. रोज कोई न कोई बहाना बना कर लौटा देती है. कल मैं अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ काले से मिलने आया था, तब इस ने बड़ी चालाकी से हमें लौटा दिया था.

‘‘यह हम सभी को बाजार ले गई और वहां बोली, ‘तुम सभी घर जाओ, मैं शाम को उन्हें भेज दूंगी.’ हम सब इंतजार करते रहे, काला नहीं आया. तब मुझे फिर आना पड़ा. अभी भी देखो न, कुछ बता नहीं रही है.’’

‘‘पापाजी बुरा मत मानना, हमें तो माजरा ही कुछ समझ में नहीं आ रहा है. भला कोई अपने ससुर से इस तरह का व्यवहार करता है?’’ जंगा ने कहा तो बुजुर्ग अजायब सिंह का सिर शरम से झुक गया. उस बीच मकान मालिक राकेश भी वहां आ पहुंचा. पूरी बात सुन कर उस ने कहा, ‘‘मुझे तो कुछ और ही संदेह हो रहा है. कल से मकान के काले वाले हिस्से से अजीब सी दुर्गंध आ रही है. 2 दिनों से कुलदीप भी दरवाजा नहीं खोल रही है. पापाजी मेरी बात मानो तो पुलिस को खबर कर दो. खुद ही पता चल जाएगा कि माजरा क्या है?’’

यह बात सभी को उचित लगी. सभी थाना सिटी पहुंचे और थानाप्रभारी इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा से मिल कर उन्हें पूरी बात विस्तार से बताई. इस के बाद उन्होंने अजायब सिंह से तहरीर ले कर मामला दर्ज कराया और इस मामले की जांच चौकीप्रभारी बलजिंदर सिंह चड्ढा को सौंप दी.

चौकीप्रभारी बलजिंदर सिंह अजीतनगर स्थित काला के मकान पर पहुंचे और कुलदीप कौर से काला के बारे में पूछा. कुलदीप कौर पुलिस को भी गुमराह करते हुए कहती रही कि वह बाहर गए हैं. मकान से दुर्गंध आ रही थी, इसलिए बलजिंदर सिंह को मामला संदेहास्पद लगा. उन्होंने फोन द्वारा पूरी बात थानाप्रभारी को बताई तो वह एएसआई बलकार सिंह, तरसेम कुमार और अशोक कुमार को साथ ले कर अजीतनगर स्थित राकेश के मकान पर आ पहुंचे.

उन्होंने भी कुलदीप कौर से काला के बारे में पूछा तो अन्य लोगों की तरह उस ने उन्हें भी टालने की कोशिश करते हुए बताया कि वह शहर से बाहर गए हैं. कहां गए हैं, यह बता कर नहीं गए हैं. हार कर थानाप्रभारी ने साथ आई महिला हैडकांस्टेबल सुरजीत कौर को इशारा किया तो उस ने कुलदीप कौर से थोड़ी सख्ती की तो उस ने कहा, ‘‘काला की हत्या हो गई है. उस की लाश रसोईघर में पड़ी है.’’

काला की लाश रसोईघर में पड़ी होने की बात सुन कर सब हैरान रह गए. थानाप्रभारी जसविंदर सिंह साथियों के साथ मकान के अंदर पहुंचे तो रसोईघर में काला की लाश पड़ी मिल गई. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. पुलिस लाश की जांच करने में लग गई, तभी मौका पा कर कुलदीप कौर फरार हो गई.

लाश अभी तक पूरी तरह सड़ी नहीं थी, पर सड़ने जरूर लगी थी. मृतक काला के पेट में एक गहरा सुराख था, जिस में से खून निकल कर जम कर काला पड़ चुका था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, काला के पेट में कोई तेजधार वाली नुकीली चीज घुसेड़ कर घुमाई गई थी, जिस से नाभि चक्र एवं आंतें कट गई थीं. इसी वजह से उस की मौत हो गई थी. अजायब सिंह की तहरीर पर काला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस कुलदीप कौर की तलाश में जुट गई. उस के मायके में छापा मारा गया, पर वह वहां नहीं मिली.

आखिर 6 मार्च, 2017 को मुखबिर की सूचना पर उसे पटियाला जाने वाली सड़क पर बने बसअड्डे से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर कुलदीप कौर से पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए काला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह संदेह में उपजी हत्या की कहानी थी.

दरअसल, काला शरीफ, ईमानदार होने के साथसाथ हंसमुख और मिलनसार भी था. दूसरों के दुखदर्द को समझना, लोगों की मदद करना और सब से हंसहंस कर बोलना उस के स्वभाव में था. उस के इसी स्वभाव से कुलदीप कौर को जलन होती थी. यही नहीं, वह उसे गलत भी समझती थी.

इन्हीं छोटीछोटी बातों को ले कर काला और कुलदीप कौर में लड़ाईझगड़ा ही नहीं, मारपीट भी हो जाती थी. मामला शांत होने पर काला कुलदीप कौर को प्यार से समझाता था कि वह बेकार ही उस पर शक करती है.

नवनीत सिंह उर्फ काला पत्नी के इस शक से काफी डरता था. उसे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता थी. गलीपड़ोस की औरतों को ले कर ही नहीं, कुलदीप कौर अपनी जेठानी को ले कर भी संदेह करती थी. पहले तो काला यह सब बरदाश्त करता रहा, पर जब उस ने उस के संबंध जेठानी से होने की बात कही तो काला बरदाश्त नहीं कर सका.

दरअसल, काला भाभी को मां की तरह मानता था. वह भाभी की बड़ी इज्जत करता था. जबकि कुलदीप कौर उस के पवित्र रिश्ते को तारतार करने पर तुली थी. काला ने उसे न जाने कितनी बार समझाया, पर वह अपनी आदत से मजबूर थी. उस के दिमाग की गंदगी निकल ही नहीं रही थी. काला के समझाने का उस पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. जब देखो, तब वह काला को जेठानी के साथ जोड़ बुराभला कहती रहती थी.

कुलदीप कौर काला पर इस बात के लिए भी दबाव डालती रहती थी कि वह अपने भाई और पिता से मिलने उन के घर न जाए. जबकि काला पिता और भाइयों को नहीं छोड़ना चाहता था. कुलदीप कौर ने उसे कई बार धमकी दी थी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे छोड़ कर चली जाएगी या फिर वह उसे ऐसा सबक सिखाएगी कि वह भूल नहीं पाएगा.

कुलदीप कौर ने जब देखा कि काला उस की बात नहीं मान रहा है और पिता तथा भाइयों से मिलने जाता है तो उस ने काला को ही ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. 12 मार्च की रात उस ने काला के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं. खाना खा कर काला गहरी नींद सो गया तो कुलदीप कौर ने बर्फ तोड़ने वाला सूजा पूरी ताकत से काला के पेट में घुसेड़ कर तेजी से चारों ओर कई बार घुमा दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

काला को मौत के घाट उतार कर कुलदीप कौर उस की लाश को घसीट कर रसोईघर में ले गई और उसे वहां वैसे ही छोड़ दिया. अगले दिन वह रोज की तरह सामान्य रूप से अपने काम करती रही. उस ने काला का फोन भी बंद कर दिया था. इस बीच उस ने बच्चों को रसोईघर में नहीं जाने दिया.

रातदिन कुलदीप कौर लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचती रही, पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह लाश को कहां ले जाए. अंत में लोग जब काले को तलाशते उस के घर पहुंचे तो उस की हत्या का राज खुल गया.

6 मार्च, 2017 को थानाप्रभारी जसविंदर सिंह टिवाणा ने कुलदीप कौर को अदालत में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में काला की हत्या में प्रयुक्त बर्फ तोड़ने वाला सूजा कुलदीप कौर की निशानदेही पर बरामद कर लिया गया. इस के बाद रिमांड अवधि समाप्त होने पर उसे पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.     

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मर्दानगी नहीं कमजोरी

हरियाणा के जींद जिले के गांव बरौली में एक अजब घटना हुई. एक आदमी को अपनी बीवी पर शक हो गया कि उस के किसी गैरमर्द से ताल्लुकात हैं और गुस्से में उस ने सरेआम पड़ोसियों के सामने उसे कुल्हाड़ी से मारना शुरू कर दिया. आमतौर पर ऐसे मामलों में पड़ोसी आगे आते हैं और चाहे औरत गुनाहगार क्यों न हो, उसे बचाते जरूर हैं. पर यहां जो मौजूद था, उस ने फटाक से मोबाइल निकाला और वीडियो बनाना शुरू कर दिया और मिनटों में वीडियो सैकड़ों के हाथ पहुंच गया, पर कोई हाथ उस औरत को बचाने नहीं आया.

लहूलुहान औरत को अब अस्पताल पहुंचा दिया है और पति को जेल में. पर यह इशारा करता है कि देश में एकदूसरे का खयाल रखने की भावना मरने लगी है. लोग अब मारनेपीटने की खबरों के इतने आदी हो गए हैं कि आंखों के सामने किसी बेचारी औरत को पिटते देख कर भी हाथ में सिर्फ मोबाइल ले कर खड़े रहते हैं. मर्द की मर्दानगी औरतों को पीटने में नहीं, किसी भी जुल्म में जुल्म करने वाले को रोकने में होती है, पर लगता है कि देश में नामर्दी मोबाइल की स्क्रीन से निकल कर हरेक को डस रही है.

हमारे गांवों में आज भी लठैतों का बोलबाला रहता है. बातबात में मार दूंगा, जमीन में गाड़ दूंगा, चार टुकड़े कर दूंगा जैसे बोल अनजाने में कह दिए जाते हैं. ये बोल मर्द अपने बच्चों को भी सिखाते हैं, बीवियों को भी और आसपास के पड़ोसियों और जानेअनजानों को भी. सड़क पर कोई जरा सी टक्कर मार दे तो मारने की धमकी चालू हो जाती है. खेत में दो कदम चले जाएं तो लाठी निकल आती है.

जब तक गांवों का समाज यह नहीं समझेगा कि यह मारपीट साजिश के तहत गांव वालों को सिखाई जा रही है, वे तरक्की नहीं करेंगे. अमीर और ऊंचे लोग चाहते हैं कि गांव वाला हर समय किसी न किसी मामले में फंसा रहे, पुलिस केस बनते रहें.

पुलिस केस बनेंगे तो ही नेताओं की दाल गलेगी. मामले अदालत में जाएंगे तो ही वकीलों, थानेदारों को पैसा मिलेगा. अगर गांव वालों के पास चार पैसे जमा हो गए तो वे आंख दिखाने लगेंगे, इसलिए एक तरफ उन्हें पूजापाठ में उलझाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ लाठियां चलाने में.

घरवाली को मारपीट कर कोई घर खुश नहीं रह सकता. ऐसी घरवाली मर्द को बिस्तर पर कोई सुख नहीं दे सकती, घर ढंग से नहीं चला सकती, बच्चेबूढ़ों का खयाल नहीं रख सकती. बीवी पर शक करने से पहले खुद को देखना जरूरी है. औरतें जानती हैं कि गांवों में इश्क और मुश्क छिपते नहीं. वे चाहें भी तो ऐसा कुछ नहीं करतीं और कर लें, तो कमजोरी तो मर्द की ही साबित होती है.   

शान के लिए डिस्क में बर्थडे

रोहित हमेशा सोच समझ कर पैसे खर्च करता था इसी कारण उस के फ्रैंड्स हमेशा उस का मजाक बनाते कि वह कंजूस है.  अपने ऊपर लगे ‘कंजूस’ के टैग से परेशान मोहित ने इस बार अपना बर्थडे डिस्क में मनाने की प्लानिंग की.

दोस्तों में अपनी झूठी शान बनाने के चक्कर में मोहित भूल गया कि वह मम्मीपापा को बिना बताए अपनी ट्यूशन फीस से पार्टी कर रहा है. डिस्क में पार्टी करने पर उसे वाहवाही तो मिली, लेकिन जब उस के पापामम्मी को पता चला तो उसे सिर्फ डांट ही नहीं पड़ी बल्कि पौकेट मनी से भी हाथ धोना पड़ा.

अकसर किशोर झूठी शान बघारने के चक्कर में मातापिता से झूठ बोल कर जिद कर के, उन्हें इमोशनल ब्लैकमेल कर डिस्क में बर्थडे पार्टी करने की मांग करते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि यहां बर्थडे सैलिब्रेट करना जितना मजेदार समझा जाता है वह वास्तव में भी उतना मजेदार हो.

बजट कंट्रोल करना मुश्किल : घर में पार्टी करने पर आप को पता होता है कि कितने फ्रैंड्स आएंगे, खाने में क्याक्या होगा लेकिन जब आप डिस्क में पार्टी करते हैं तब आप को पता नहीं होता कि कौन क्या और कितनी बार और्डर कर रहा है. आप वहां किसी को मना भी नहीं कर सकते कि दोबारा कुछ और्डर मत करो. ऐसे में बजट कंट्रोल करना काफी मुश्किल हो जाता है.

मस्ती कम शो औफ ज्यादा : डिस्क में पार्टी करने पर फ्रैंड्स का ध्यान मस्ती से ज्यादा इस बात पर रहता है कि वे कैसे दिख रहे हैं, पार्टी में कौन क्या पहन कर आया है, सैल्फी कहां अच्छी आएगी. यही नहीं खुल कर एक ग्रुप में ऐंजौय करने के बजाय छोटेछोटे ग्रुप्स में बंट जाते हैं और खुद में ही मस्त रहते हैं.

ड्रिंक ट्राई करने की लालसा : भले ही आप की पार्टी में ड्रिंक न हो लेकिन किशोरों में ड्रिंक ट्राई करने की उत्सुकता रहती है, उन्हें लगता है कि यही मौका है जहां वे ड्रिंक ट्राई कर सकते हैं. अगर किसी ने गलती से भी ड्रिंक ट्राई कर लिया तो आप को भी पता है कि उस के बाद मस्ती तो होगी नहीं और बड़ों से डांट पड़ेगी सो अलग.

पौकेट मनी से समझौता : कुछ किशोर झूठी शान के लिए पौकेट मनी से भी समझौता करने को तैयार हो जाते हैं. वे अपने मम्मीपापा से कहते हैं कि डिस्क में बस एक बार बर्थडे मना दो, मैं आप से 2 महीने तक पौकेट मनी नहीं मागूंगा. लेकिन बाद में पौकेट मनी के बिना रहना मुश्किल हो जाता है. अगर वे मांगते भी हैं तो पेरैंट्स साफसाफ मना कर देते हैं.

फ्रैंड्स पर भी पड़ता है बोझ : डिस्क में बर्थडे मनाने पर आप के बाकी फ्रैंड्स पर भी इस का बोझ पड़ता है उन्हें लगता है कि आप ने डिस्क में पार्टी दी है तो अब उन्हें भी डिस्क में ही बर्थडे सैलिब्रेट करना पड़ेगा. अगर वे वहां सैलिब्रेट नहीं करते तो सारे फ्रैंड्स उन का मजाक बनाएंगे. इसी वजह से वे अपने पेरैंट्स से डिस्क में बर्थडे मनाने की जिद करते हैं.

चोरी करने की गलती : कुछ किशोर दोस्तों के बीच झूठी शान दिखाने के लिए चोरी तक कर लेते हैं ताकि वे उन पैसों से दोस्तों के साथ डिस्क में मस्ती कर सकें. यहां तक कि मम्मी से झूठ बोल कर पैसे लेते हैं कि हम सारे फ्रैंड्स मिल कर गरीब बच्चों को खाना खिलाएंगे और फिर उन पैसों से मस्ती करते हैं.

फ्रैंड्स को नीचा दिखाने की कोशिश : कई बार किशोर अपने दोस्तों को नीचा दिखाने के लिए भी डिस्क में पार्टी करते हैं, वे दोस्तों के बीच सुपीरियर बनने के लिए भी डिस्क में जाते हैं ताकि दोस्तों के बीच उन का अच्छा इंप्रैशन बना रहे और वे जो बोलें वही हो, जैसा चाहें ग्रुप में वैसा ही हो.

पढ़ाई से ध्यान भटकना : डिस्क में म्यूजिक के शोरशराबे के बीच किशोर मस्ती तो खूब करते हैं, लेकिन इस का असर उन की पढ़ाई पर भी पड़ता है, उन का पढ़ाई में मन नहीं लगता. वे बस हमेशा यही सोचते रहते हैं कि काश, एक बार और डिस्क में जाने का मौका मिल जाता.

अलग माहौल : ऐसा भी हो सकता है कि आप ने जिद कर के डिस्क में बर्थडे पार्टी का अरेंजमैंट तो करवा लिया, लेकिन वहां का माहौल थोड़ा अजीब हो, जहां आप सब खुल कर ऐंजौय न कर सकें. बस, यही कहते रहें कि घर पर कितना मजा आता है. यहां तो लाइट म्यूजिक के अलावा और कुछ भी नहीं है.

पेरैंट्स की रजामंदी नहीं : आप तो फ्रैंड्स के बीच सैंटर औफ अट्रैक्शन बनने के लिए डिस्क में पार्टी करना चाहते हैं, लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि आप के फ्रैंड्स के पेरैंट्स उन्हें डिस्क में जाने की अनुमति न दें. फिर क्या, आप की पार्टी तो धरी की धरी रह जाएगी.

खुद की मस्ती में अपनों को इग्नोर : डिस्क में किशोर बर्थडे पार्टी करने की जिद इसलिए करते हैं ताकि वे अपने फ्रैंड्स को दिखा सकें कि वे कितनी मस्ती करते हैं. उन के पेरैंट्स उन से इतना प्यार करते हैं कि उन के लिए डिस्क में पार्टी रखवा देते हैं, लेकिन वे दिखावे और खुद की मस्ती में अपनों को इग्नोर कर देते हैं.

जरा सोचिए, जब घर में पार्टी होती है तब आप के अंकलआंटी, दादादादी, नानानानी सभी आते हैं, लेकिन डिस्क में बर्थडे पर वे कहते हैं कि इस उम्र में हम वहां क्या करेंगे, वे चाहते हुए भी इस खास अवसर पर शामिल नहीं हो पाते.

दिखावे के लिए अपनों से मतभेद : किशोर दिखावे के लिए पेरैंट्स से मतभेद तक कर लेते हैं. जब पापामम्मी मना कर देते हैं, तब वे जिद पर अड़ जाते हैं कि उन्हें बर्थडे डिस्क में ही मनाना है. किसी से बात नहीं करते, खाना नहीं खाते, जिस कीवजह से उन की जिद के आगे पेरैंट्स को झुकना पड़ता है.

दबाव से घर का माहौल खराब : डिस्क में बर्थडे मनाने की जिद से पेरैंट्स पर प्रैशर पड़ता है, क्योंकि घर चलाने के साथ बर्थडे के लिए अरेंजमैंट जो करना पड़ता है. ऐसा भी हो सकता है कि वे मैनेज नहीं कर पा रहे हों और आप बारबार जिद करते रहें कि नहीं इस बार बर्थडे डिस्क में ही मनाना है, इस से पापा को गुस्सा आ जाए और उन के द्वारा डांटने से घर का माहौल खराब हो जाए.                                        

घर पर लंच सस्ता और अच्छा

दोस्तों के साथ मस्ती करना और लंच डिनर पर जाना भला किसे नहीं भाता, लेकिन यह शौक कई बार काफी महंगा साबित होता है, जिस से परेशानी तो होती ही है. क्यों न इस बार कुछ ऐसा करें कि दोस्तों के साथ लंच भी हो जाए और जेब पर कोई भार भी न पड़े, अगर अपने घर पर ही लंच प्लान किया जाए तो यह काफी फायदेमंद तो होगा ही साथ ही ऐंजौयमैंट भी कहीं ज्यादा होगा. आइए जानें कैसे.

सभी पोषक तत्त्व मिलते हैं

अगर आप बाहर एक पावभाजी भी खाने जाते हैं तो वह उसे बनाने में कई बार कई दिन पुरानी सब्जियां भी इस्तेमाल में ले लेते हैं, क्योंकि सब्जियों के मैश होने के बाद उन का पता नहीं चलता, वहीं अगर आप इसे घर पर बनाएं तो आप अच्छी क्वालिटी की मौसमी सब्जियों का ही इस्तेमाल करेंगे.

इस के अलावा उन्हें आप इस तरह पकाते हैं कि उन के सभी पोषक तत्त्व आप को मिलें, क्योंकि आप को उन्हें कम मात्रा में बनाना है और बनाने की इतनी जल्दी भी नहीं होती.

आप उन्हें अपने हिसाब से बनाते हैं लेकिन बाहर एकसाथ बहुत अधिक मात्रा में खाना बनता है इसलिए क्वालिटी के साथ समझौता हो ही जाता है. साथ ही घर में अच्छी और पौष्टिक सब्जियों का उपयोग किया जाता है. अच्छे घीतेल का प्रयोग किया जाता है.

आप की कुकिंग स्किल निखरती है

अगर आप को खाना बनाने का शौक है और किसी को पूरा खाना बना कर खिलाने का मौका कम ही मिलता है तो अपना यह शौक पूरा कर सकती हैं. जो भी डिश आप को अच्छी बनानी आती है या फिर जिसे ट्राई करने का मन था वह अब ट्राई करें. आप के द्वारा बनाए गए अच्छे खाने को खा कर सिर्फ आप के दोस्त ही नहीं बल्कि आप के परिवार वाले भी हैरान रह जाएंगे और आप का यह लंच उन के लिए भी किसी सरप्राइज से कम नहीं होगा.

ऐंजौयमैंट ज्यादा होता है

बाहर के मुकाबले घर में ऐंजौयमैंट ज्यादा होता है, क्योंकि बाहर तो आप को खाना खाते ही रैस्टोरैंट से उठ कर जाना पड़ता है, लेकिन घर में काफी अच्छा वक्त गुजारा जा सकता है और अपनी पसंद के तरहतरह के गेम्स खेल सकते हैं, जीतने वाले को छोटामोटा गिफ्ट भी दिया जा सकता है, घर में साथ में मूवी देख कर भी टाइम स्पैंड किया जा सकता है.

वैराइटी ज्यादा मिलती है

बाजार में आप 2-3 वैराइटी ही ले सकते हैं लेकिन घर पर कई तरह की वैराइटी कम कीमत में बनाई जा सकती है. आप चाहें तो मिक्स ऐंड मैच कर के भी ले सकते हैं जैसे कि बर्गर या पिज्जा के साथ छोलेभटूरे आदि भी रख सकते हैं. साथ में एक चायनीज डिश जैसे चाउमीन आदि भी रख सकते हैं. इस से सब को अपनी पसंद की वैराइटी मिल जाएगी.

कई लोगों की मदद मिलती है

अगर लंच पर कुछ लोग आ रहे हैं तो आप मेड की मदद भी ले सकती हैं और लंच वाले दिन से पहले ही सब्जी आदि काट कर, टमाटर ग्रेवी बना कर रख सकती हैं, मां की मदद भी खाना बनाने में ले सकती हैं, जो काम उन्हें पसंद है वह उन्हें और भाईबहनों को बताया जा सकता है, जैसे टेबल मैनेज करना, ड्राइंगरूम सही करना आदि. चाहें तो यह लंच पूल कर के भी कर सकते हैं, जिस में आने वाले मेहमान भी एकएक डिश बना कर लाएं और सब मिल कर साथ खाएं.

इंग्रीडिऐंट्स का पता होता है

कई बार कुछ लोगों को किसी खास चीज से एलर्जी होती है और उसे खाने पर उन की तबीयत बिगड़ने लगती है, उन के लिए वह खाना अच्छा नहीं रहता. बाहर के खाने में आप पता नहीं कर सकते कि किस खाने में क्या है, लेकिन घर में खाना बन रहा है तो दोस्त की पसंदनापसंद को ध्यान में रखा जा सकता है जैसे कि अगर किसी दोस्त को अदरक से एलर्जी है, तो अदरक न डाली जाए या फिर एक बाउल सब्जी निकाल कर दोबारा बना ली जाए. इस के अलावा जैसे अगर किसी दोस्त को शुगर है और आप टमाटो सूप बना रहे हैं तो उस का एक बाउल सूप अलग निकाल कर फिर चीनी मिक्स करें.

सफाई से बनता है

अगर घर पर खाना बना रहे हैं तो उसे बनाने में साफसफाई का भी पूरा ध्यान रखा जाता है. सब्जियों को अच्छी तरह धोया जाता है, आटे को छाना जाता है और पूरी सफाई के साथ खाना बनाया जाता है, लेकिन बाहर के खाने में साफसफाई का कितना ध्यान रखा जाता है इस बारे में आप पूरी तरह से श्योर नहीं हो सकते.

नई रैसिपी भी ट्राई कर सकती हैं

लंच में आप चाहें तो एक नई रैसिपी भी ट्राई कर सकती हैं. फिर चाहे वह रैसिपी कोई छोटा सा स्नैक्स ही क्यों न हो. इस से आप को खुद पर कौन्फिडैंस आएगा कि आप भी कुछ अच्छा बना सकते हैं. जैसे कि पनीर कुल्चा बना सकते हैं इस में आप को कुछ नहीं करना, बस, पनीर मैश कर मसाला मिलाना है और 2 कुलचों के बीच पनीर लगा कर सेंक लें. यह खाने में पिज्जा जैसा लगता है और बनाने में सैंडविच बनाने जितना आसान है. इस तरह आप ने नई डिश भी ट्राई कर ली.

सस्ता भी पड़ता है

अगर आप बाहर खाने जा रहे हैं, तो खाने की कीमत वैसे तो रैस्टोरैंट के स्टैंडर्ड के हिसाब से होती है, लेकिन फिर भी किसी रैस्टोरैंट में कीमत कितनी भी कम क्यों न हो वहां खाना घर के खाने से कई गुना महंगा ही पड़ेगा. एक दाल की कीमत ही 200 रुपए तक होती है. ऐसे में आप अगर रायता, सलाद, पापड़ आदि मांगने लगें तो हर चीज की कीमत देनी पड़ती है, जोकि घर में काफी सस्ता पड़ता है.            

इन बातों का रखें ध्यान

–       उतने ही लोगों को बुलाएं जितने लोगों का अरेंजमैंट आप सही से कर पाएं.

–       खाने के साथसाथ कुछ गेम्स आदि भी रखें, ताकि बाहर जैसा ऐंजौयमैंट मिल सके.

–       अगर आप को लगे कि किसी हैल्पिंग हैंड की जरूरत है, तो पहले ही अपनी मेड या अन्य किसी से बात कर के रखें.

–       जो काम पहले दिन किए जा सकते हैं उन्हें पहले दिन कर लें जैसे आप अगर अपने दोस्तों को पिज्जा पार्टी दे रहे हैं तो पिज्जा के लिए सभी सब्जियां आदि पहले ही दिन चाप कर के रख लें, बाजार से कोल्डड्रिंक, चीज, चिप्स आदि जो भी सामान लाना है, पहले ही दिन ले आएं.

–       अगर लोग ज्यादा हैं तो बैठने का इंतजाम कैसे और कहां करना है, यह भी पहले ही सोच लें. जैसे कि अगर जगह कम है तो ड्राइंगरूम का सोफा आदि दीवारों के किनारे लगा दें और बीच में डाइगिंन टेबल की कुरसियां आदि डाल दें.

–       डाइनिंग टेबल को भी सही से पहले से ही सैट कर दें. वैसे अच्छा तो यही रहेगा कि आप वहां से बुफे सिस्टम लगा दें. सभी लोग वहां से प्लेट लगा कर अपनीअपनी जगह पर बैठ कर खाना खा लें. इस से आप का भी एकएक को परोसने का काम बचेगा, जिस को जो चाहिए खुद टेबल पर से ले लेगा. 

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जेब पर भारी चटोरी जबान

13 वर्षीय सान्या बहुत चटोरी है, उसे अपने खानेपीने पर जरा भी कंट्रोल नहीं है. सुबह उठते ही उसे चिप्स, फ्रैंच फ्राइज, चौकलेट्स और कोल्डडिं्रक चाहिए. जहां उस की क्लास के और बच्चे घर से लंच ले कर आते हैं. वहीं वह लंच टाइम में स्कूल कैंटीन में पहुंच जाती है, क्योंकि उसे घर का सादा खाना बिलकुल नहीं भाता. उसे रोज कुछ नया, चटपटा और फ्राइड चाहिए. अपनी इसी चाहत की खातिर वह अपने जेबखर्च का एक बड़ा हिस्सा अपने खानेपीने पर खर्च कर देती है.

खाने की शौकीन और जबान की चटोरी सान्या जैसे किशोर खाने के लिए कभी ना नहीं कहते और उन की यही ओवरईटिंग और चटोरी जबान उन्हें मोटापे की ओर ले जाती है, जिस के चलते उन्हें कई दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है. नतीजतन, वे अस्वस्थ रहने लगते हैं और उन्हें दवा और वजन कम करने के लिए जिम पर भी पैसे खर्च करने पड़ते हैं, जिस से चटोरी जबान जेब पर और भी भारी पड़ती है.

ऐसी चटोरी जबान वालों को पता होता है कि शहर के किस रैस्टोरैंट में कौन सी चीज अच्छी मिलती है. कहां सभी वैराइटी के पकौड़े, मटरकुलचे या इटालियन फूड मिलता है. गरमागरम जलेबियां किस वक्त मिलती हैं और किस गली में कितने नंबर की दुकान पर खस्ता गोलगप्पे व चाट मिलती है. परांठे वाली गली में कब, कितने बजे आलू का, कब गोभी का परांठा बनता है और उस के साथ कौन सी चटनी या कौन सा अचार मिलता है?

अपनी चटोरी जबान के कारण ऐसे किशोर पूरे शहर की खाक छानने को भी तैयार रहते हैं. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि फलांफलां ईटिंग पौइंट घर से कितना दूर है, वहां जाने में कितने पैसे खर्च होंगे, उन्हें तो बस वह डिश खा कर अपनी चटोरी जबान को तृप्त करना होता है, फिर चाहे उन्हें इस का खमियाजा किसी भी रूप में क्यों न भुगतना पड़े.

जिन की चटोरी जबान होती है वे अपने खानेपीने पर जरा भी कंट्रोल नहीं रख पाते और जहां उन्होंने अपनी पसंद का खाना देखा, बिना कुछ सोचेसमझे खाने का और्डर दे देते हैं और उस पर टूट पड़ते हैं.

वे न तो उस खाने की क्वालिटी देखते हैं और न ही यह देखते हैं कि उस की कीमत बहुत ज्यादा तो नहीं, उस की क्वालिटी बेकार तो नहीं. कई बार फूड पौइंट्स में ऊंची दुकान फीके पकवान वाली बात भी होती है, लेकिन चटोरी जबान यह भला कहां देखती है.

शान की खातिर

तुगलकाबाद के किशोर अतुल ने अपने दोस्त रमेश से कहा, ‘‘अरे, तू ने कमला नगर के ईटिंग पौइंट का पास्ता और चिल्ली पोटैटो नहीं खाया, तो फिर कुछ नहीं खाया. थोड़ा महंगा है पर खा कर मजा आ जाता है. मैं तो हफ्ते में एक बार वहां जरूर जाता हूं.’’

अतुल की बात से रमेश को बड़ी हैरानी हुई. महज 100-200 की चीज खाने हेतु इतना किराया और समय वेस्ट कर देता है अतुल सिर्फ चटोरी जबान के कारण.

कुछ चटोरी जबान वाले किशोर तो सिर्फअपने दोस्तों पर अपना इम्प्रैशन जमाने के चक्कर में महंगे रैस्टोरैंट में जाते हैं और महंगी डिशेस और्डर करते हैं भले ही ऐसा करने में उन की जेब ही क्यों न खाली हो जाए, उन्हें कोईर् फर्क नहीं पड़ता.

भारत फास्ट फूड दुनिया के पहले देशों में से एक बनता जा रहा है. अब यहां भी कईर् ऐसे रेस्तरां हैं जहां सिर्फ फास्ट फूड ही मिलता है यानी हर मोड़ पर ऐसे रेस्तरां भरे पड़े हैं जो चटोरी जबान वाले किशोरों को अपनी ओर खींचते हैं और चटोरी जबान वाले किशोर अपनी जेब और सेहत दोनों की अनदेखी करते हुए खिंचे चले जाते हैं.

जेब के साथ सेहत पर भी भारी

कुछ क्या सभी किशोरों में आदत होती है मूवी देखते हुए, म्यूजिक सुनते हुए, चिप्स खाना और कोल्डड्रिंक पीना. अपनी इस आदत के चलते वे अपनी पौकेट मनी का एक बड़ा हिस्सा तो खर्च कर ही देते हैं बदले में अपनी सेहत के साथ भी खिलवाड़ करते हैं.

लंदन में एक शोध में पता चला है कि आकलू के चिप्स या फै्रंच फ्राइज खाने से व्यक्ति की बुद्धि घट जाती है और कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है. शोध में डाइटीशियन अन्ना पेत्रिना ने कहा, ‘‘जो लोग नियमित रूप से फास्ट फूड खाते हैं, उन के मस्तिष्क के फ्रांटल लौब पर जोकि निर्णय लेने की क्षमता, बुद्धि, आत्मसंयम और भावनाओं को नियंत्रित करता है, बुरा असर पड़ता है.’’

किशोरों में तो फास्ट फूड का क्रेज इतना बढ़ गया है कि वे जब देखो पिज्जा, बर्गर, पास्ता जैसे फास्ट फूड खाने के लिए तैयार रहते हैं और जहां तक फास्ट फूड खाने का सवाल है तो उस का मूल्य देशी खाने समोसे, कचौड़ी के मूल्य से कहीं अधिक होता है, जो जेब पर भारी पड़ने के साथ ही किशोरों के स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ता है.

अगर आप की भी जबान चटोरी है और आप का उस पर काबू नहीं, तो अपनी जबान पर थोड़ा कंट्रोल कीजिए और अपनी मनपसंद चीज को प्रतिदिन न खा कर सप्ताह में एकाध बार खाएं. ऐसा करने से आप का खर्च भी बचेगा और आप की सेहत भी अच्छी रहेगी.                                      

भौजाई से प्यार, पत्नी सहे वार

19 जनवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश के जिला सिद्धार्थनगर के थाना जोगिया उदयपुर के थानाप्रभारी शमशेर बहादुर सिंह औफिस में बैठे मामलों की फाइलें देख रहे थे, तभी उन की नजर करीब 4 महीने पहले सोनिया नाम की एक नवविवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में ससुराल में हुई मौत की फाइल पर पड़ी. सोनिया की मां निर्मला देवी ने उस के पति अर्जुन और उस की जेठानी कौशल्या के खिलाफ उस की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. घटना के बाद से दोनों फरार चल रहे थे. उन की तलाश में पुलिस जगहजगह छापे मार रही थी. लेकिन कहीं से भी उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी.

आरोपियों की गिरफ्तारी को ले कर एसपी राकेश शंकर का शमशेर बहादुर सिंह पर काफी दबाव था, इसीलिए वह इस केस की फाइल का बारीकी से अध्ययन कर आरोपियों तक पहुंचने की संभावनाएं तलाश रहे थे. संयोग से उसी समय एक मुखबिर ने उन के कक्ष में आ कर कहा, ‘‘सरजी, एक गुड न्यूज है. अभी बताऊं या बाद में?’’

‘‘अभी बताओ न कि क्या गुड न्यूज है,ज्यादा उलझाओ मत. वैसे ही मैं एक केस में उलझा हूं.’’ थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘जो भी गुड न्यूज है, जल्दी बताओ.’’

इस के बाद मुखबिर ने थानाप्रभारी के पास जा कर उन के कान में जो न्यूज दी, उसे सुन कर थानाप्रभारी का चेहरा खिल उठा. उन्होंने तुरंत हमराहियों को आवाज देने के साथ जीप चालक को फौरन जीप तैयार करने को कहा. इस के बाद वह खुद भी औफिस से बाहर आ गए. 5 मिनट में ही वह टीम के साथ, जिस में एसआई दिनेश तिवारी, सिपाही जय सिंह चौरसिया, लक्ष्मण यादव और श्वेता शर्मा शामिल थीं, को ले कर कुछ ही देर में मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. वहां उन्हें एक औरत और एक आदमी खड़ा मिला.

पुलिस की गाड़ी देख कर दोनों नजरें चुराने लगे. पुलिस जैसे ही उन के करीब पहुंची, उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं. शमशेर बहादुर सिंह ने उन से नाम और वहां खड़े होने का कारण पूछा तो वे हकलाते हुए बोले, ‘‘साहब, बस का इंतजार कर रहे थे.’’

‘‘क्यों, अब और कहीं भागने का इरादा है क्या?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, आप क्या कह रहे हैं, हम समझे नहीं, हम क्यों भागेंगे?’’ आदमी ने कहा.

‘‘थाने चलो, वहां हम सब समझा देंगे.’’ कह कर शमशेर बहादुर सिंह दोनों को जीप में बैठा कर थाने लौट आए. थाने में जब दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपने नाम अर्जुन और कौशल्या देवी बताए. उन का आपस में देवरभाभी का रिश्ता था.

अर्जुन अपनी पत्नी सोनिया की हत्या का आरोपी था. उस की हत्या में कौशल्या भी शामिल थी. हत्या के बाद से दोनों फरार चल रहे थे. थानाप्रभारी ने सीओ महिपाल पाठक के सामने दोनों से सोनिया की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने सारी सच्चाई उगल दी. सोनिया की जितनी शातिराना तरीके से उन्होंने हत्या की थी, वह सारा राज उन्होंने बता दिया. नवविवाहिता सोनिया की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले का एक थाना है जोगिया उदयपुर. इसी थाने के अंतर्गत मनोहारी गांव के रहने वाले जगदीश ने अपने छोटे बेटे अर्जुन की शादी 4 जुलाई, 2013 को पड़ोस के गांव मेहदिया के रहने वाले रामकरन की बेटी सोनिया से की थी. शादी के करीब 3 सालों बाद 25 अप्रैल, 2016 को गौने के बाद सोनिया ससुराल आई थी.

पति और ससुराल वालों का प्यार पा कर सोनिया बहुत खुश थी. अपने काम और व्यवहार से सोनिया घर में सभी की चहेती बन गई. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक सोनिया ने पति अर्जुन में कुछ बदलाव महसूस किया. उस ने गौर करना शुरू किया तो पता चला कि अर्जुन पहले उसे जितना समय देता था, अब वह उसे उतना समय नहीं देता.

पहले तो उस ने यही सोचा कि परिवार और काम की वजह से वह ऐसा कर रहा होगा. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. उस ने महसूस किया कि अर्जुन अपनी भाभी कौशल्या के आगेपीछे कुछ ज्यादा ही मंडराता रहता है. वह भाभी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताता है.

जल्दी ही सोनिया को इस की वजह का भी पता चल गया. अर्जुन के अपनी भाभी से अवैध संबंध थे. भाभी से संबंध होने की वजह से वह सोनिया की उपेक्षा कर रहा था. कमाई का ज्यादा हिस्सा भी वह भाभी पर खर्च कर रहा था. यह सब जान कर सोनिया सन्न रह गई.

कोई भी औरत सब कुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन यह हरगिज नहीं चाहती कि उस का पति किसी दूसरी औरत के बिस्तर का साझीदार बने. भला नवविवाहिता सोनिया ही इस बात को कैसे बरदाश्त करती. उस ने इस बारे में अर्जुन से बात की तो वह बौखला उठा और सोनिया की पिटाई कर दी. उस दिन के बाद दोनों में कलह शुरू हो गई.

सोनिया ने इस बात की जानकारी अपने मायके वालों को फोन कर के दे दी. उस ने मायके वालों से साफसाफ कह दिया था कि अर्जुन का संबंध उस की भाभी से है. शिकायत करने पर वह उसे मारतापीटता है. यही नहीं, उस से दहेज की भी मांग की जाती है. सोनिया की परेशानी जानते हुए भी मायके वाले उसे ही समझाते रहे.

वे हमेशा उस के और अर्जुन के संबंध को सामान्य करने की कोशिश करते रहे, पर अर्जुन ने भाभी से दूरी नहीं बनाई, जिस से सोनिया की उस से कहासुनी होती रही, पत्नी की रोजरोज की किचकिच से अर्जुन परेशान रहने लगा. उसे लगने लगा कि सोनिया उस के रास्ते का रोड़ा बन रही है. लिहाजा उस ने भाभी कौशल्या के साथ मिल कर एक खौफनाक योजना बना डाली.

24-25 सितंबर, 2016 की रात अर्जुन और कौशल्या ने साजिश रच कर सोनिया के खाने में जहरीला पदार्थ मिला दिया. अगले दिन यानी 25 सितंबर की सुबह जब सोनिया की हालत बिगड़ने लगी तो अर्जुन उसे जिला अस्पताल ले गया.

उसी दिन सुबह सोनिया के पिता रामकरन को मनोहारी गांव के किसी आदमी ने बताया कि सोनिया की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, वह जिला अस्पताल में भरती है. यह खबर सुन कर वह घर वालों के साथ सिद्धार्थनगर स्थित जिला अस्पताल पहुंचा. तब तक सोनिया की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी. डाक्टरों ने उसे कहीं और ले जाने को कह दिया था.

26 सितंबर की सुबह 4 बजे पता चला कि सोनिया की मौत हो चुकी है. बेटी की मौत की खबर मिलते ही रामकरन अपने गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर बेटी की ससुराल मनोहारी गांव पहुंचा तो देखा सोनिया के मुंह से झाग निकला था. कान और नाक पर खून के धब्बे थे. हाथ की चूडि़यां भी टूटी हुई थीं. लाश देख कर ही लग रहा था कि उस के साथ मारपीट कर के उसे कोई जहरीला पदार्थ खिलाया गया था.

बेटी की लाश देख कर रामकरन की हालत बिगड़ गई. उन के साथ आए गांव वालों ने पुलिस कंट्रोल रूम को हत्या की सूचना दे दी. सूचना पा कर कुछ ही देर में थाना जोगिया उदयपुर के थानाप्रभारी शमशेर बहादुर सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने सोनिया के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

बेटी की मौत से रामकरन को गहरा सदमा लगा था, जिस से उन की तबीयत खराब हो गई थी. उन्हें आननफानन में इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. इस के बाद पुलिस ने सोनिया की मां निर्मला की तहरीर पर अर्जुन और उस की भाभी कौशल्या के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए, 304बी, 3/4 डीपी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था.

2 दिनों बाद जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि सोनिया के साथ मारपीट कर के उसे खाने में जहर दिया गया था. घटना के तुरंत बाद अर्जुन और कौशल्या फरार हो गए थे. लेकिन पुलिस उन के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी. उन दोनों की गिरफ्तारी न होने से लोगों में आक्रोश बढ़ रहा था.

आखिर 4 महीने बाद मुखबिर की सूचना पर अर्जुन और कौशल्या गिरफ्तार कर लिए गए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे तक दोनों की जमानतें नहीं हो सकी थीं.

पुलिस अधीक्षक राकेश शंकर ने घटना का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की हौसलाअफजाई करते हुए 2 हजार रुपए का नकद इनाम दिया है.

भाभी के चक्कर में अर्जुन ने अपना घर तो बरबाद किया ही, भाई का भी घर बरबाद किया. इसी तरह कौशल्या ने देह की आग को शांत करने के लिए देवर के साथ मिल कर एक निर्दोष की जान ले ली.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्लेसमेंट के जरिये तिजोरी पर नजर

जल्द अमीर बनने के लिए लोग तमाम तरह की तिकड़में लगाते हैं. कुछ तो इस के लिए गलत काम करने को भी तैयार रहते हैं. जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि गलत काम की जब पोल खुलेगी तो वे सीधे जेल जाएंगे. इस के बावजूद भी वे गलत काम करने से नहीं हिचकते. दिल्ली के विजय सिंह को ही ले लीजिए. वह आश्रम स्थित किलोकरी गांव में प्लेसमेंट एजेंसी चलाता था, पर इसी काम की आड़ में वह दूसरा गैरकानूनी काम भी करता था. इस गैरकानूनी काम में वह अपनी पत्नी मनीषा का भी सहयोग लेता था. पत्नी की मदद से हाल ही में उस ने करीब 80 लाख रुपए के हीरे व सोने के गहनों पर हाथ साफ किया.

34 साल का विजय सिंह दक्षिणपूर्वी दिल्ली के आश्रम स्थित किलोकरी गांव में एक प्लेसमेंट एजेंसी चलाता था. एजेंसी के माध्यम से ज्यादातर वह बड़ेबड़े घरों व कोठियों में नौकर या नौकरानियों को नौकरी पर रखवाता था और यदि कोई हाईप्रोफाइल व्यक्ति घरेलू सहायिका की मांग करता तो वह योजना के अनुसार अपनी पत्नी मनीषा को भेज देता था.

दिल्ली के वसंतकुंज की रहने वाली निशू घरेलू सहायिका के लिए विजय सिंह की प्लेसमेंट एजेंसी पहुंची तो लग्जरी कार और पहनावे को देख कर विजय ने भांप लिया कि यह मोटी आसामी है. योजना के अनुसार, उस ने अपनी 30 वर्षीय पत्नी मनीषा को निशू के साथ भेज दिया. यह 18 मार्च, 2017 की बात है.

मनीषा को तो सहायिका के रूप में उस कोठी में कोई दूसरा ही काम करना था, लिहाजा पहले दिन से ही उस की नजरें कोठी के कीमती सामान की स्कैनिंग करने लगीं. मनीषा ने जल्दी ही अपनी मीठीमीठी बातों से निशू पर प्रभाव जमा लिया. अगले दिन निशू को किसी जरूरी काम से घर से बाहर जाना पड़ गया. अपनी अलमारी आदि बंद कर के वह मनीषा को कोठी पर छोड़ गई. उस दिन कोठी में मनीषा के अलावा और कोई नहीं था.

मनीषा इसी मौके के इंतजार में थी. उस ने फोन कर के अपने पति विजय सिंह को बुला लिया. इस के बाद उन्होंने फटाफट अलमारियों के ताले तोड़ कर हीरे, सोने की ज्वैलरी निकाल ली. इस के अलावा कोठी का कीमती इलैक्ट्रौनिक सामान ले कर दोनों वहां से खिसक गए.

देर शाम निशू जब घर लौटी तो उसे अलमारियों के ताले टूटे मिले और कोठी का सामान भी अस्तव्यस्त था. एक दिन पहले मनीषा नाम की जिस नौकरानी को काम पर रखा था, वह भी गायब थी. वह समझ गई कि यह सब मनीषा ने ही किया होगा.

जब निशू ने लौकर वगैरह चैक किए तो वहां रखी सारी ज्वैलरी गायब थी, जिस की कीमत करीब 80 लाख रुपए थी. यह देख निशू के होश ही उड़ गए. निशू ने जब नौकरानी मनीषा का फोन मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. जिस प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से उस ने मनीषा को रखा था, उस के संचालक विजय सिंह को भी उस ने फोन मिलाया. उस का भी फोन बंद मिला.

निशू ने इस की शिकायत दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम से की. इस पर थाना वसंतकुंज (नौर्थ) के थानाप्रभारी गगन भास्कर निशू की कोठी पर पहुंचे. निशू ने उन्हें पूरी बात बता दी. मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए थानाप्रभारी ने सूचना डीसीपी को भी दे दी. डीसीपी ने एसीपी के.पी. कुकरेती के नेतृत्व में तुरंत एक टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी गगन भास्कर, एसआई कुलदीप, एएसआई छतरपाल आदि को शामिल किया.

पुलिस टीम ने सब से पहले फरार नौकरानी मनीषा के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. सर्विलांस में उस के फोन की लोकेशन हजरत निजामुद्दीन क्षेत्र की मिली. किसी तरह पुलिस टीम मनीषा के पास पहुंच गई. उस के साथ उस का पति विजय सिंह भी मिल गया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उन की निशानदेही पर पुलिस ने उन के कमरे से वह सारी ज्वैलरी बरामद कर ली, जो उन्होंने निशू की कोठी से चुराई थी.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के यह पता लगाने की कोशिश की कि इन्होंने इस से पहले और कहांकहां हाथ साफ किया था. लेकिन दोनों इतने ढीठ निकले कि कुछ भी नहीं बताया. बहरहाल, पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपी विजय सिंह और उस की पत्नी मनीषा को अदालत पर पेश कर जेल भेज दिया.

लालू नीतीश गठबंधन की टूट : समाजवाद में संघी सेंध

नीतीश कुमार ने करीब 5 महीने पहले पटना पुस्तक मेले के उद्घाटन में पद्मश्री चित्रकार बऊआ देवी द्वारा बनाए कमल के फूल में रंग भरा था, वह आखिर सच साबित हो गया. उसी समय से कयास लगाए जाने लगे थे कि नीतीश कुमार भाजपा की ओर बढ़ रहे हैं. लालू नीतीश गठबंधन का टूटना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. यह शुरू से ही दिख रहा था. 20 महीने पहले दोनों नेता जब बिहार में भाजपा को पटखनी दे कर सरकार बना रहे थे तभी कहा जाने लगा था कि यह बेमेल गठजोड़ है, ज्यादा नहीं चलेगा.

अब जब लालू के बेटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया, लालू के बेटे, बेटी और दामाद के घरों पर सीबीआई के छापे पड़ने शुरू हुए तो नीतीश कुमार खुद को असहज महसूस करने लगे. उन पर तेजस्वी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने का दबाव बढ़ने लगा. कई बार इशारों में तेजस्वी को इस्तीफे का इशारा करने के बावजूद तेजस्वी और लालू यादव पर कोई असर नहीं पड़ा तो भ्रष्टाचार के नाम पर नीतीश को मुख्यमंत्री पद त्यागने का दिखावा करना पड़ा.

जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहियो के समाजवादी आंदोलन से निकले लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान 80 के दशक में मंडल के आते आते दलितों, पिछड़ों के नेता के रूप में चर्चित हो चुके थे. यह सही है कि इन नेताओं ने इस दौर में दलितों, पिछड़ों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने को काम किया.

शुरू में जनता दल बना तो इस से नेताओं ने देश में सामाजिक बराबरी की मुहिम की खुल कर अगुआई की. वीपी सिंह और एचडी देवगौडा की सरकारों ने पिछड़ों और दलितों में राजनीतिक और सामाजिक जागृति पैदा की. पिछड़ों को आरक्षण मिलने लगा. दलितों, पिछड़ों के कल्याण की हुंकार भरी गई. इसी का नतीजा है कि पिछले करीब ढाई तीन दशक के दौरान दलितों और पिछड़ों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हैसियत में बदलाव दिखाई देने लगा. उत्थान हुआ, इन वर्गों में पैसा आया पर सामाजिक भेदभाव की खाई कम नहीं हुई.

1989 के बाद भाजपा लगातार आगे बढ़ने लगी. अयोध्या में राममंदिर निर्माण आंदोलन ने भाजपा की लोकप्रियता को आसमान तक पहुंचा दिया. इस आंदोलन में बड़ी तादाद में पिछड़े भी जुड़ गए. इस से पहले तक भाजपा ब्राह्मण, बनियों की पार्टी मानी जाती थी, लेकिन भाजपा संघ ने हिंदू एकता के नाम पर मंडल के बदले कमंडल की राजनीति चली और पिछड़े भाजपा की छतरी के नीचे आ गए. कल्याण सिंह, उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान, साहिब सिंह वर्मा, विनय कटियार जैसे पिछड़े नेता भाजपा की दूसरी पंक्ति में गिने जाने लगे.

नीतीश लालू गठबंधन टूटने से सामाजिक बराबरी के आंदोलन पर असर पड़ेगा. रामविलास पासवान पहले ही भाजपा के सहयोगी बन चुके हैं. नीतीश गठबंधन बदलते रहे हैं. 2014 में उन्होंने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन सांप्रदायिकता के मुद्दे पर तोड़ा था. अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लालू से संबंध तोड़ा है पर भाजपा गठबंधन छोड़ कर वह लालू से मिल रहे थे तब भी तो लालू भ्रष्टाचार मामले में सजा पा चुके थे.

इन नेताओं के बिखरने से दलितों, पिछड़ों, वंचितों के पक्ष में खड़े रहने वाले समाजवादी, वामपंथी दलों की जो राजनीतिक एकता थी उसे झटका लगा है. यह ऐसे समय में हुआ है जब दलितों, वंचितों और अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं. नीतीश भाजपा से हाथ मिला कर उस सोच की सहायता कर रहे हैं जो सामाजिक एकता, आपसी भाईचारा, प्रेम और सौहार्द की भावना के बदले नफरत, हिंसा, भेदभाव को बढ़ावा दे रही है.

भाजपा अपने मकसद में कामयाब हो रही है. पिछड़ों को साथ रखने के लिए नीतीश जैसे सूबेदारों की जरूरत है. यह बात अलग है कि 2019 के चुनाव में मंदिर निर्माण, आरक्षण का खात्मा, दलित, अल्पसंख्यकों पर हमले और हिंदुत्व के प्रचार प्रसार जैसे भाजपा के प्रमुख मुद्दों पर नीतीश कुमार भाजपा के साथ कब टिके रहेंगे?

यह ठीक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चाहे कोई भी हो, सख्त कारवाई होनी चाहिए पर नीतीश ने जिस सामाजिक बराबरी के आंदोलन को त्याग कर हिंदुत्व के झंडाबरदारों के साथ हाथ मिलाया है वह और ज्यादा खतरनाक है. वह सामाजिक तानेबाने को तहसनहस करने वाली, समाज में घृणा फैलाने वाली, धार्मिक और जातिवादी अलगाव रखने में यकीन करने वाली और हिंसा करने वालों की मददगार है. यह भ्रष्टाचार से ज्यादा नुकसानदेह है.

इस्तीफा मास्टर नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने 26 जुलाई की शाम 6:32 मिनट पर राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप कर 20 महीने पुराने महागठबंधन को एक झटके में तोड़ डाला. संघ मुक्त भारत का नारा गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने वाले नीतीश रात 9 बजते-बजते एक बार फिर संघ और भाजपा की गोद में जा बैठे. बिहार की सियासत में ‘इस्तीफा मास्टर’ और ‘पलटीमार’ नेता के नाम से मशहूर हो चुके नीतीश ने एक बार फिर अपनी इमेज को पक्का कर दिया है.

भ्रप्टाचार के आरापों से घिरे तेजस्वी यादव को इस्तीफा नहीं देने पर जब लालू अड़ गए, तो नीतीश ने अपना पुराना राग ‘अंतरात्मा की आवाज’ गाया और महागठबंधन और लालू से नाता तोड़ अपने पुराने साथी भाजपा से हाथ मिला लिया. जिस भाजपा को उन्होंने लालू के साथ मिलकर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में धूल चटा दिया था, उसी भाजपा के लिए बिहार सियासत की मजबूत जमीन तैयार कर दी. इस्तीफा देने के एक घंटे बाद ही नीतीश ने भाजपा नेताओं के साथ बैठक की और राज्यपाल से मिल कर सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया. सब कुछ इतनी तेजी और आसानी के साथ हुआ तो खुलासा हो गया कि नीतीश और भाजपा के बीच काफी समय से सियासी खिचड़ी पक रही थी और नीतीश इसे परोसे जाने के लिए खास समय का इंतजार कर रहे थे या इसके लिए भूमिका तैयार कर रहे थे.

5 जुलाई को तेजस्वी के खिलाफ सीबीआई की एफआईआर और 7 जुलाई को लालू के 20 ठिकानों पर सीबीआई और इनकम टैक्स की छापामारी के बाद से ही महागठबंधन में तेजस्वी के इस्तीफे को लेकर घमासान मचा हुआ था. 26 जुलाई को जब लालू यादव ने राजद विधयक दल की बैठक के बाद तेजस्वी यादव के इस्तीफा नहीं देने की बात दुहराई तो महागठबंधन में सन्नाटा पसर गया था. उसी शाम होने वाली जदयू विधयक दल की बैठक पर सबकी निगाहें टिक गई और जैसे अनुमान था, वही हुआ. नीतीश ने राज्यपाल को जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया. उसके बाद जब नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के जरिए नीतीश की तारीफ की तो लालू भड़क गए और उन्होंने नया फार्मूला सुझा कर महागठबंधन को बचाने की पूरी कोशिश की. उन्होंने कहा कि न तो नीतीश मुख्यमंत्री रहें और न ही तेजस्वी उपमुख्यमंत्री रहें. राजद, जदयू और कांग्रेस के विधायकों की बैठक हो और नए नेता को चुन लिया जाए. राजद सबसे बड़ा दल है, इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसका अधिकार बनता है. लालू के इस बयान के बाद शह और मात का खेल तेज हो गया और उसी बीच भाजपा ने लोहा गरम देख कर नीतीश का साथ देने का हथौड़ा चला दिया.

इस्तीफा सौंप कर नीतीश ने खुद को सियासत को बड़ा इस्तीफा मास्टर या कहिए भगोड़ा की इमेज को और ज्यादा पक्का कर लिया. नैतिकता के नाम पर जब-तब इस्तीफा देकर सियसी हड़कंप मचाने वाले नीतीश के बारे में कहा जाता है कि वह सियासी मुश्किलों से जूझने के बजाए भाग खड़े होते हैं. इस बार भी बड़े जतन से बनाए गए महागठबंधन को नैतिकता के नाम पर झटके में तोड़ डाला. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता ने महागठबंधन को जनादेश दिया था न कि अकेले नीतीश कुमार को. सबसे बड़ा दल होने के बाद भी राजद (80 सीट) ने जदयू (71 सीट) के नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी थी. राजद को झटका देने से पहले नीतीश भाजपा को भी इस्तीफे का झटका दे चुके हैं. जून 2013 को भी भाजपा के साथ 17 साल पुराने रिश्ते को पलक झपकते ही इसलिए तोड़ डाला क्योंकि नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया था और मोदी गोधरा कांड के आरोपों से घिरे हुए थे.

नीतीश कहते हैं कि 20 महीने में उन्होंने पूरी इमानदारी के साथ गठबंधन सरकार को चलाने की कोशिश की. उनका दावा है कि वह किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टौलरेंस की नीति से समझौता नहीं कर सकते हैं. नीतीश यह सफाई भी दे रहे हैं कि वह हमेशा से विपक्षी एकता के हिमायती रहे हैं, लेकिन विपक्षी एकता का कोई एजेंडा भी होना चाहिए.

लालू नीतीश पर हमला करते हुए कहते हैं कि वह कहते थे कि मिट्टी में मिल जाएंगे पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे, पर जनता से मिले भारी मेंडेट को लात मार कर दंगाईयों के साथ चले गए? अपने ऊपर लगे पुत्र मोह के आरोपों को खारिज करते हुए लालू कहते हैं कि उन्होंने आंखें मूंद कर बेटे का साथ नहीं दिया, जनता ने उन्हें मेंडेट दिया था, इसलिए तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. अगर आंख मूंद कर हम काम करते तो बेटे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाते, क्योंकि उन्हें ही ज्यादा सीट मिली थी.

इस सियासी उठापटक से नीतीश को जहां दुबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई, वहीं 2015 के विधान सभा चुनाव में हीरो बन कर उभरे लालू एक बार फिर सियासी हाशिए पर ढकेल दिए गए हैं. सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी वह अलग-थलग पड़ गए हैं. किंगमेकर कहे जाने वाले लालू को अपने ही बेटे को किंग बनाने के चक्कर में बहुत बड़ा झटका लगा है. वहीं लालू-नीतीश की दोस्ती से कांग्रेस के भाग से सत्ता छींका फूटा था और उसे मलाई खाने का मौका मिला था. कांग्रेस को अपना सियासी वजूद बचाने के लिए एक बार पिफर जददोजहद करनी पड़ेगी. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के परिवार में फूट की वजह से उसका सियासी गुना-भाग गड़बड़ा गया था और अब बिहार में लालू-नीतीश की फूट से उसके राज्य की सियासत में पैठ बनाने का सपना तार-तार हो गया है. उत्तर प्रदेश और बिहार में लोक सभा के कुल 120 सीट हैं, जिसमें से एक भी कांग्रेस के कब्जे में नहीं है.

बिहार में सियासी उठापठक का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिल गया है. साल 2015 के विधान सभा चुनाव में जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था और फिलहाल वह 2020 में बिहार पर फतक करने की कवायद में लगी हुई थी. लालू-नीतीश में फूट डाल कर उसने 3 साल पहले ही बिहार में अपनी सरकार बना ली. भाजपा के सूत्र बताते हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने बिहार में सत्ता पाने के लिए लंबा इंतजार करने के बजाए महागठबंधन में उठापटक मचा कर सत्ता हासिल कर ली. लालू और उनके परिवार को सीबीआई, इनकम टैक्स, ईडी और कोर्ट के चक्कर में उलझा कर उन्हें कमजोर बना दिया और नीतीश को अपने पाले में मिला कर सत्ता का मलाई हासिल कर लिया.

पिछले साल नवंबर में नोटबंदी के बाद से ही नीतीश ने नरेंद्र मोदी के सुर में सुर मिलाना चालू कर दिया था. उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक के मामले में भी नीतीश मोदी के साथ खड़े दिखे. इस साल जनवरी में पटना में गुरू गोविंद सिंह के 350वें जन्मदिन पर आयोजित प्रकाश पर्व के मौके पर मोदी और नीतीश के बीच जुगलबंदी तेज हो गई थी. नीतीश महागठबंधन की लाइन से अलग जाकर कई मौकों पर केंद्र सरकार और प्रधनमंत्री की तारीफ में कसीदे गढ़ चुके थे. जीएसटी, सर्जिकज स्ट्राइक, नोटबंदी और बेनामी संपति के मामले में नीतीश ने खुल कर मोदी के सुर में सुर मिलाया. इन मामलों में नीतीश ने बिना-लाग लपेट के मोदी का साथ देते रहे.

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा ओैर मणिपुर में भाजपा की जीत और सरकार बनने नीतीश की बांछे खिली थी. उसी समय से नीतीश कुमार और महागठबंधन में उनके साथी और ‘बड़े भाई’ लालू यादव के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा था. जदयू के कई नेता दबी जुबान में कहते रहे हैं कि लालू के बढ़ते सियासी दबाब और उलजलूल डिमांड से नीतीश खासे परेशान है. भाजपा से दुबारा हाथ मिलाने का धौंस दिखा कर नीतीश अपने सियासी साथी लालू यादव को काबू में रखने का दांव चल सकते हैं.

पिछले दिनों राबड़ी देवी ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर महागठबंधन के अंदर भी खलबली मचा दिया था. राजद का खेमा पिछले कुछ महीने से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की हवा बनाने में लगा हुआ था. राबड़ी देवी ने अपनी बात को बल देने के लिए कह डाला कि राज्य की जनता तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है.

भाजपा नेता और अब नीतीश की ताजा सरकार में उपमुख्यमंत्री बने सुशील मोदी कई बार यह यह कहते रहे हैं कि नीतीश कुमार पलटी मारने में माहिर हैं. जब भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता वह एक झटके में तोड़ सकते हैं तो लालू के उनकी सियासी दोस्ती लंबी नहीं चलने वाली है. नेशनल पार्टी होने के बाद भी भाजपा ने बिहार में नीतीश को बड़े भाई की भूमिका सौंप रखी थी, उसके बाद भी नीतीश ने उस रिश्ते की लाज नहीं रखी थी. अब लालू के साथ मिलने से नीतीश छोटे भाई की भूमिका में आ गए हैं और लालू के बढ़ते सियासी दबाब को को वह ज्यादा समय तक नहीं झेल पाएंगे. छोटे मोदी की यह बात आखिरकार 26 जुलाई की शाम को सच हो गई. जदयू के भी कई नेता भी गाहे-बगाहे कहते रहे हैं कि लालू की महत्वाकाक्षांओं और परिवारवाद का बोझ नीतीश ज्यादा समय तक नहीं ढो सकते हैं. यह सही ही साबित हुआ है.

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