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भारतीय रेलवे दे रहा है फ्री में यात्रा करने का मौका, आप भी लाभ उठाइये

डिजिटल ट्रांजैक्शंस को बढ़ावा देने के लिए लाई गई भीम एप का इस्तेमाल करना अब आपके लिए फायदेमंद हो सकता है. भारतीय रेलवे ने 1 अक्टूबर को लकी ड्रौ स्कीम लौन्च की है. अब भीम और यूपीआई एप से भुगतान करने पर आपको रेलवे से फ्री में सफर करने का मौका मिल सकता है.

2016 में इस एप को भारत सरकार ने विमुद्रीकरण के वक्त लौंच किया था जिससे औनलाईन लेन देन हो सके.

क्या है स्कीम

भारतीय रेलवे की स्कीम के तहत हर महीने 5 लोगों को फ्री में सफर करने का मौका मिलेगा. इस स्कीम का लाभ वही लोग उठा पाएंगे जो भीम और यूपीआई एप से भुगतान करेंगे. इस स्कीम में कंप्यूटर के जरिए हर महीने 5 विजेताओं का नाम चुना जाएगा. इसके बाद उन्होंने टिकट के लिए जो भी भुगतान किया होगा, वो पैसे उन्हें रिफंड मिल जाएंगे. इस तरह उनका सफर फ्री हो जाएगा.

स्कीम का फायदा कैसे उठाएं

रेलवे की यह स्कीम 1 अक्टूबर से शुरू हुई है. यह स्कीम अगले 6 महीनों तक चलेगी. स्कीम की शर्तों के अनुसार इन एप से टिकट बुक करने के बाद आपको लकी ड्रौ के उसी महीने में सफर करना होगा. अगर टिकट बुक करने के बाद कैंसिल की गई तो आप इस स्कीम का लाभ नहीं उठा पाएंगे.

आईआरसीटीसी पर दिखेगा नाम

हर महीने लकी ड्रौ जीतने वालों के नाम आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर डिस्प्ले किए जाएंगे. इसके अलावा जीतने वालों को मेल के जरिए भी जानकारी दी जाएगी.

यह स्कीम सरकार का लोगों को डिजिटल लेन देन की ओर आकर्षित करने का एक और कदम है. इस स्कीम से जुडी पूरी जानकारी आपको आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर मिल जाएगी.

पर्यटन के नक्शे से गायब हुआ ताजमहल, क्या ‘चांदनी’ को रोक पाएंगे ‘आदित्य’

हजारों लोग आगरा पहुंच चुके हैं और हजारों और रास्ते में हैं. ये लोग आज ताजमहल पर शरद पूर्णिमा की बरसती चांदनी का लुत्फ उठाएंगे. इस संगमरमरी ऐतिहासिक इमारत पर आज की चांदनी की छटा वाकई अदभुद होती है, इतनी और ऐसी कि प्रकृति प्रेमी सुधबुध खो बैठते हैं. इनमें से कईयों को नहीं मालूम होगा कि अब ताजमहल उत्तरप्रदेश का पर्यटन स्थल नहीं रहा है, वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कभी दरभंगा बिहार की एक रैली में कहा था कि ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है.

योगी ने जो कहा था वह कर भी दिखाया. इस साल उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा जारी 32 पृष्ठीय बुकलेट में से आगरा का ताजमहल गायब है. वही ताजमहल जिसे दुनिया का सातवां अजूबा कहा जाता है, जिसे देखने हर साल लाखों देसी विदेशी पर्यटक भारत और आगरा आते हैं और मुगल सम्राट शाहजहां की अपनी प्रेयसी मुमताज के प्रति दीवानगी के कायल हो जाते हैं.

यह महज खबर नहीं है बल्कि खबरदार कर देने वाली एक धमक भी है कि इतिहास दोबारा लिखा जा रहा है. अब उत्तर प्रदेश में दर्शनीय कुछ है तो वह गोरखपुर स्थित गोरखधाम मंदिर है, जिसके महंत सीएम हैं. मथुरा, बनारस और चित्रकूट भी प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं, क्योंकि इन धार्मिक स्थलों में हिन्दू देवी देवता विराजते हैं. यही नई भारतीय संस्कृति है, जिसकी इबारत बीते तीन सालों से आरएसएस के इशारे पर लिखी जा रही है.

शरद पूर्णिमा के ठीक 2 दिन पहले जब यह बुकलेट जारी हुई तो सरकार परस्त मीडिया ने भी अदभुद संयम दिखाया. किसी ने एतराज जताना तो दूर की बात है पूछा तक नहीं कि क्यों ताजमहल अब पर्यटन स्थल नहीं रहा, यह वही मीडिया है जो बात का बतंगड़ बनाने में माहिर है, लेकिन इतिहास को तोड़े मरोड़े जाने पर खामोश है.

कल को अगर देश हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दिया जाये, तब भी यह मीडिया हनीप्रीत के रंगीन किस्से गढ़ता नजर आए तो कोई हैरानी नहीं होगी. लोकतन्त्र और धर्म निरपेक्षता जैसे शब्द अर्थ खोने लगें, यह चिंता की बात किसी के लिए नहीं, इसके दूरगामी नतीजे देखने वाली आंखों में मोतियाबिंद हो गया है, जिसे सोशल मीडिया पर कुछ लोग मजाक में मोदियाबिन्द भी कहते हैं.

उदाहरण कई हैं जो बताते हैं कि इतिहास का पुनर्लेखन हो रहा है, इससे खुश हो रहे 15-20 फीसदी लोग महंगाई की बात नहीं करते. इस श्रेष्ठि वर्ग को एहसास है कि एक बार वर्ण व्यवस्था वाला दौर वापस भर आ जाये, फिर तो क्या मुसलमान क्या दलित और क्या पिछड़े सब के सब पहले की तरह हमारी पालकी ढोते नजर आएंगे. दशहरे पर इन दिनों की सबसे बड़ी अदालत ने नागपुर के रेशम बाग से कहा, गौ रक्षकों को घबराने की जरूरत नहीं, नरेंद्र मोदी अच्छा काम कर रहे हैं, कुछ कमियां हैं, किसानों और गरीबों के लिए भी उन्हें कुछ करना चाहिए. बात लोगों को समझ आ गई कि सुप्रीम कोर्ट तो यूं ही कहता रहता है कि सरकार गौ रक्षकों की हिंसा को काबू करे.

गरीब और किसान फेशनेबुल मसले हैं, ये मेन्यू के मेन कोर्स नहीं हैं, बल्कि चटनी, अचार हैं जो छोटे ढाबों तक में मुफ्त में परोसे जाते हैं. इनका कोई दाम नहीं होता लेकिन ये जरूरी हैं इसलिए इन्हें पालकी ढोने वाले युग में भरपेट खाना खिलाया जाएगा ताकि ये मेहनत कर सकें.

यह वर्ग शरद पूर्णिमा नहीं मनाता, न ही ताजमहल देखने आगरा जाता है, यह वर्ग प्यार नहीं करता सेक्स भर करता है इसलिए यह मुख्यधारा नहीं है. इसे अपने उद्धार के लिए मंदिरों की जरूरत है, यह बात योगी से बेहतर कौन समझ सकता है इसलिए उन्होंने गरीबों की मोहब्बत का मज़ाक उड़ाते ताजमहल को ही पर्यटन के नक्शे से गायब कर दिया. भारतीय संस्कृति शहंशाहों की नहीं बल्कि राजनों, आर्यों और तातों के अलावा ऋषि मुनियों की है, इसलिए अगर ऐतिहासिक नजरिए से ताजमहल को तालमहल साबित नहीं किया जा सकता, तो कोई बात नहीं, उसे धीरे धीरे खंडहर में तब्दील हो जाने दो, रही बात उस पर चांदनी बरसने की तो कुछ सालों बाद उस के ऊपर तम्बू भी खिंचवा देंगे और कोई कुछ नहीं बोलेगा.

बोलने वालों के मुंह बंद करने की कला भी खूब फल फूल रही है. यह बनी रहे इसके लिए मोदी और योगी जरूरी हैं, वे ही हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे और इस बाबत थोड़ी सी मंहगाई बेरोजगारी बढ़ती है तो वह तो बर्दाश्त करना पड़ेगी. यह बात वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कुछ यूं कही थी कि अगर विकास चाहिए तो उसकी कीमत तो देनी पड़ेगी. अब लोग अगर महाराणा प्रताप को अकबर से जीतते हुये देखना चाहते हैं तो उन्हें सौ रुपए लीटर का पेट्रोल खरीदने तैयार रहना चाहिए.

दर्शकों को सम्मोहित करने वाली नाट्य प्रस्तुति है ‘यहां’

कल्पनाशील नाट्यकार और निर्देशक विनय शर्मा की चर्चित नाट्य प्रस्तुति ‘यहां’ का आनंद देश के कई शहरों के बाद अब आप दिल्ली में उठा सकते हैं. आगामी 9 अक्टूबर को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में शाम 7 बजे से इस अदभुत नाट्य कृति का मंचन किया जाएगा.

‘यहां’ का निर्माण कोलकाता की जानीमानी नाट्य संस्था ‘पदातिक’, जिसने प्रयोगात्मक नाट्य प्रस्तुतियों से नाट्य प्रेमियों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाई है और रंग परंपरा को समृद्ध किया है, ने किया है.

‘यहां’ अनुपम और अदभुत इसलिए भी है क्योंकि इस नाटक में विनय शर्मा ने बिना किसी कथा सूत्र या स्टोरी लाइन के विशुद्ध वैसक्तिक अनुभूतियों को मंच पर चित्रित करने का नया प्रयोग किया है. अनूभूतियों की अभिव्यक्ति कितनी कठिन होती है यह सहज ही समझा जा सकता है. लेकिन इस कठिन काम को बड़ी सहजता से अंजाम दिया है ‘पदातिक’ की दो अत्यंत सशक्त अभिनेत्रियों संचयिता भट्टाचार्य और अनुभा फतेहपुरिया ने, जिन्होंने एब्सट्रैक्ट यानि अर्मूत अनुभूतियों को अपने अभिनय में समूर्त कर दिया है.

‘यहां’ का प्रारंभ दो महिलाओं से होता है, जो जुड़वा आत्माएं हैं, जो समय काल विहीन अंतरिक्ष में हैं और अपनी अपनी समझ से चीजों को देखती समझती हैं. फिर  वे एक दूसरे के जीवन में प्रवेश करती हैं. उनकी अनुभूतियां कहीं यर्थाथवादी हैं तो कहीं प्रतीकात्मक.

बिना किसी कथा सूत्र के डेढ़ घंटे तक दर्शकों को सम्मोहन में बांधे रखना मुश्किल काम है जिसे सहजता से अंजाम दिया है विनय शर्मा के निर्देशन में संचयिता भट्टाचार्य और अनुभा फतेहपुरिया ने.

अगर आप भी इस सम्मोहन को साक्षात देखना चाहते हैं तो 9 अक्टूबर को शाम 7 बजे इंडिया हैबिटेट सेंटर पहुंचना न भूलें.

सरिता के पत्रकार को गौरी लंकेश की तरह अंजाम भुगतने की धमकी

दिल्ली प्रेस के वरिष्ठ पत्रकार जगदीश पंवार को बंगलुरु की पत्रकार गौरी लंकेश की तरह अंजाम भुगतने की धमकी मिली है. 17 सितंबर को व्हाटसएप पर एक अनजान मोबाइल नंबर से आए मैसेज में उन्हें मोदी सरकार, भाजपा और संघ तथा हिंदू विरोध में लिखने पर गौरी की तरह मिटा देने की चेतावनी दी गई है.

मैसेज में लिखा है,‘‘ गौरी लंकेश को क्यों मारा? गौरी लंकेश एक पत्रकार थीं. उस का बेंगलोर में हिंदूवादी ताकतों ने कत्ल कर दिया. प्रश्न उठता है कि  हिंदूवादी ताकतों ने एक हिंदू पत्रकार को क्यों मारा? क्योंकि गौरी मोदी सरकार के खिलाफ लिखती थीं. गौरी आरएसएस और भाजपा के खिलाफ लिखती थीं. गौरी गद्दार थीं. वो राष्ट्रविरोधी और हिंदू विरोधी थीं. अब अगर इस देश में कोई भी व्यक्ति मोदी जी के खिलाफ या आरएसएस या भाजपा के खिलाफ लिखने की हिम्मत करेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा. मुसलमानों के साथ साथ ऐसे गद्दारों को भी मिटा देंगे.’’

मोबाइल नंबर 8104970579 से मैसेज मिलने के बाद यह नंबर बंद जा रहा है और इस पर भेजे गए मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया गया.

हाल में सरिता पत्रिका में जगदीश पंवार के कई लेख प्रकाशित हुए हैं, जिन में मोब लिंचिंग को ले कर ‘धर्मजनित भीडतंत्र का खतरा,’ ‘लोकतंत्र पर हावी धर्मतंत्र’, ‘विकास की सुर्खियां गायब’, ‘जीएसटी-क्या काले धन पर रोक लग पाएगी?’, ‘नस्लवाद का नासूर’, ‘मोदी ट्रंप मुलाकात-दुनिया से अलग थलग पड़ते भारत और अमेरिका’, ‘युवा नेता हैं कहां?’,‘सत्तर साल की आजादी में औरत कितनी आजाद’, ‘गुरमीत राम रहीम कथा-आस्था का धंधा’ और ‘गौरी लंकेश की हत्या-असहमति के स्वर खामोश’ प्रमुख हैं.

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इस तरह की धमकी दिल्ली, एनसीआर के तीन और पत्रकारों को भी मिली है. टाइम्स औफ इंडिया के पत्रकार के अलावा नोएडा के एक टीवी चैनल, एक न्यूज पोर्टल का पत्रकार भी है. पत्रकारों को भेजा गया संदेश एक जैसा है और एक ही समय में भेजा गया है. इन पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस में शिकायत दी है.  दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता मधुर वर्मा का कहना है कि मामला साइबर सेल को सौंप दिया गया है और नंबर ट्रेस कर के जांच शुरू कराई जा रही है. पत्रकारों से कहा गया है कि वे धमकी का मैसेज और मोबाइल नंबर उपलब्ध कराएं.

उत्तर प्रदेश में खुद अपनी पीठ थपथपा रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के 6 माह पूरे हो गये हैं. इस अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ और उनके मंत्रिमंडल के लोग अपनी पीठ खुद ही थपथपा रहे हैं. वैसे तो योगी सरकार को अपने कामकाज का लेखाजोखा पेश करना चाहिये था. सरकार को अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में बताना चाहिये था. योगी सरकार अपने पहले के मुख्यमंत्रियों के कामकाज पर ही बात कर रही है. अपनी पीठ थपथपाने में योगी सरकार प्रचारतंत्र का पूरा सहारा ले रही है.

चमचमाता प्रचार तंत्र योगी सरकार की कुछ ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है जैसे कुछ समय पहले तक अखिलेश सरकार की पेश कर रहा था. एलसीडी लगी गाडियां और होर्डिंग दिन में भी अपनी चमक बिखेरते सरकार का प्रचार कर रहे हैं. प्रचार में ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे 6 माह में ही योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश का कायाकल्प कर दिया हो.

सरकार खुद ऐसी रिपोर्ट पेश कर रही है जिससे लग रहा है कि वह अपनी पीठ खुद थपथपा रही हो. योगी सरकार ने अभी तक एक भी ऐसा काम नहीं किया है जो इस सरकार की अपनी सोच को दिखा सके. यह सच है कि उत्तर प्रदेश बड़ा प्रदेश है. यहां 6 माह में बदलाव दिखना बहुत मुश्किल काम है. पर 6 माह में योगी सरकार को ऐसा कोई काम करना चाहिये था जिससे जनता को यह लगता कि यह सरकार कुछ अलग करना चाहती है.

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री रहते हुये लखनऊ मेट्रो और हाइवे जैसी योजनाओं को बहुत पहले ही अमल में लाना शुरू कर दिया था. मायावती की भी बात करें तो लखनऊ के कायाकल्प का बहुत बड़ा श्रेय उनकी सरकार को जाता है.

योगी सरकार ने जमीनी स्तर पर एक भी ऐसे काम की शुरुआत नहीं कि है जो इस सरकार की पहचान बन सके. उत्तर प्रदेश के विकास की एक भी योजना धरातल पर उतरते नहीं दिख रही है. उत्तर प्रदेश के लोगों को रोजगार और दूसरी विकास योजनाओं का इंतजार है. जमीनी स्तर पर इस तरह का कोई प्लान सामने नहीं दिख रहा है. प्रशासनिक रूप से योगी सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता को राहत पहुंचे. भ्रष्टाचार से लेकर अपराध तक बढ़ा हुआ है. सरकार की गलत नीतियों के कारण मंहगाई बढ़ रही है. सरकार की खदान नीति न स्पष्ट होने से बालू और मौरंग जैसी जरूरीं चीजों की कीमत कई गुना बढ़ गई है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ केवल भाजपा के ‘पोस्टर ब्वाय’ बन कर रह गये हैं. भाजपा उनको हिन्दुत्व का चेहरा बनाकर वोट हासिल करने के लिये प्रयोग कर रही है. अपने भगवा वस्त्रों के कारण वह भीड़ में अलग दिखते हैं. भाजपा अखिलेश यादव की आलोचना करते कई मुख्यमंत्री होने का आरोप लगाती थी. आज भाजपा के 3 घोषित मुख्यमंत्री भी प्रदेश को कोई अलग पहचान नहीं दे पा रहे हैं. जानकार लोग कहते हैं कि भाजपा के 3 मुख्यमंत्रियों के ऊपर भी रिमोट कंट्रोल है. इस वजह से केवल योगी आदित्यनाथ ही नहीं दूसरे 2 उप मुख्यमंत्री डाक्टर दिनेश शर्मा और केशव मौर्य अपनी मर्जी का कुछ कर नही पा रहे हैं.

भाजपा कांग्रेस के जिस रिमोट कंट्रोल की आलोचना करती थी, आज वही रिमोट कंट्रोल वह अपनी पार्टी में प्रयोग कर रही है. भाजपा योगी आदित्यनाथ का उपयोग उत्तर प्रदेश के बाहर दूसरे प्रदेशों में करने का काम कर रही है. जिससे हिन्दुत्व के वोट हासिल किये जा सके.

भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर विकास का जो सपना दिखाया था वह साकार होते नहीं दिख रहा. नोटबंदी और जीएसटी को लेकर अब पार्टी में ही अलग अलग बयान मुखर हो रहे हैं. अब तो सरकारी आंकडे भी गवाही देने लगे है कि यह नीतियां देश के विकास में सबसे बड़ा रोडा बन गई. ऐसे में भाजपा उत्तर से लेकर दक्षिण तक हिन्दुत्व के बल पर वोट लेना चाहती है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा के अच्छे पोस्टर ब्वाय बन सकते हैं. उत्तर प्रदेश के लोगों ने जिस उम्मीद से सरकार को वोट दिया था, वह पूरी नहीं हो रही है.

लुढ़कती अर्थव्यवस्था और मोदी का एक देश एक टैक्स का वादा

हर कट्टरपंथी समाज का एक गुण होता है कि वह सुनीसुनाई बात को परम सत्य मान लेता है. वह पुरखों की या महान माने जाने वाले लोगों की बातों को बिना परखे, बिना तर्क की कसौटी पर जांचे, बिना वैज्ञानिक परीक्षण के मान लेता है. यह वही समाज है जो गणेश का दूध पीना 21वीं सदी में सही मान लेता है, जो कुतुबमीनार को किसी राजा की रानी के लिए जमुना की पूजा का मंच मान लेता है और गणेश के सिर को सर्जरी की कला का कमाल मान लेता है.

इसी समाज के नेता सुनीसुनाई बातों पर भरोसा कर रहे थे कि देश में कालाधन या तो स्विस बैंकों में जमा है या लोगों की तिजोरियों में बंद है. इसीलिए नरेंद्र मोदी ने 2014 में वादा किया कि जीतने के बाद हर नागरिक को 15 लाख रुपए मिल जाएंगे और 8 नवंबर,  2016 को वादा किया कि 1 जनवरी, 2017 से न कालाधन होगा, न रिश्वतखोरी. देश प्रगति की कुलांचें भरेगा.

यही वादा कर के ‘एक देश एक टैक्स’ लाया गया कि जीएसटी से न ब्लैक इकोनौमी होगी और न कर चोरी.

इन सब से कर चोरी तो जरूर रुकेगी क्योंकि लोगों के पास पैसे ही नहीं बचेंगे. रिश्वतखोर कांग्रेस सरकार के जमाने में अर्थव्यवस्था जिस तरह बढ़ रही थी उस पर ब्रेक लग गया है. आंकड़े बता रहे हैं कि नोटबंदी का लाभ जीरो मिला है क्योंकि सारे नोट ही नहीं, शायद सारों से ज्यादा, नकली सहित, बैंकों में पहुंच गए. नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को बीमार कर दिया था जिस से वह लड़खड़ा कर उठ रही ही थी कि अब जीएसटी की मार ने उस का सिर फोड़ दिया है.

अर्थव्यवस्था की प्रगति, जो 6.9 से 7.3 प्रतिशत से बढ़ रही थी, अब 5.2 प्रतिशत रह गई है. भविष्य में यह और ज्यादा घट सकती है. हम युवाशक्ति पर गर्व करते हैं पर गांवों और शहरों में युवाओं को काम नहीं मिल रहा है. वहीं, किसान व आमलोग अपनी संपत्ति बेचने की फिराक में है. खेती व शहरी जमीनों के दाम गिर रहे हैं.

नीतिनिर्धारक दरअसल प्रचारकों की भाषा में सोचते हैं कि अंतिम सत्य किताबों में, शोधों में नहीं, प्रवचनों और मंत्रों में होता है. बुलेट ट्रेन मंत्री की रेलों में दुर्घटनाएं होती हैं और जीवन उद्धार करने वाले भगवा मुख्यमंत्री के अपने शहर में बच्चे जीवन त्याग रहे हैं, वह भी सरकारी अस्पताल में.

हां, एक मोरचे पर भारी सफलता है- वोटों के मोरचे पर. केंद्र सरकार को अभी भी भारी समर्थन मिल रहा है. बिहार में सत्ताधारी एक पूरी पार्टी उस के साथ आ मिली है और ऐसा ही तमिलनाडु में होने जा रहा है. गुरु राम रहीम जिन तथाकथित चमत्कारों का दावा कर के लोगों को वश में करता था वह कला बहुतों को आती है.

नोटबंदी के बाद कमाई करने वालों की खैर नहीं

नोटबंदी की पिछले साल 8 नवंबर को की गई घोषणा कुछ लोगों के लिए बहार ले कर आई तो कुछ के लिए आफत. नोटबंदी के कारण कई लोगों के समक्ष विवाह आदि के सामाजिक दायित्वों के निर्वहन का संकट पैदा हो गया था तो कुछ के लिए यह अवसर बन कर आया है. काली कमाई वालों ने लोगों के खातों में पैसा जमा करा दिए और बाद में उन से वसूल लिए होंगे.

यही वजह है कि रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि 99 फीसदी पुराने नोट लौट आए हैं. सरकार पर विपक्ष तीर चला रहा है कि काली कमाई देश में नहीं थी, इसलिए पैसा रिजर्व बैंक में लौट आया है. सरकार इस हमले से सख्त हो गई है. अपना फैसला जायज बताते हुए उस ने उन खातों की सूची तैयार कर दी है जिन में नोटबंदी के दौरान आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा पैसा आया था.

इस तरह करीब साढ़े 13 लाख बैंक खातों को आयकर विभाग ने संदेह के घेरे में रख दिया है. इन में से कइयों से पूछताछ भी की जा रही है. नोटबंदी के बाद इन खातों में 2.90 लाख करोड़ रुपए जमा किए गए थे. इन में करीब 9 लाख खाते ऐसे हैं जिन में नोटबंदी के बाद बड़ा पैसा जमा किया गया था. अब सवाल है कि नोटबंदी से पहले यह पैसा घर पर क्यों रखा गया था? नोटबंदी की घोषणा होते ही यह पैसा अचानक बैंकों में कैसे पहुंच गया? इन पैसों का स्रोत पता किया जा रहा है. रिजर्व बैंक का कहना है इस तरह के 35 हजार से ज्यादा खाताधारकों से पूछताछ की गई है. उन से बैंकों ने औनलाइन जानकारी मांगी है. इन मामलों की बारीकी से  छानबीन कर के दोषियों को जेल भेजा जाना आवश्यक है. इस के लिए दंड का कड़ा प्रावधान किया जाना चाहिए. लोग अब रिकौर्ड में आने वाले मामलों में भी खुल्लमखुल्ला चोरी करने लगे हैं. यह ढीठपन रुके, भ्रष्टाचारी डरे, इसलिए सीधे जेल की व्यवस्था होनी चाहिए.

नोटबंदी और जीएसटी के बाद उलझन में आम व्यापारी

नोटबंदी और जीएसटी के साथसाथ भारीभरकम एनफोर्समैंट डायरैक्टोरेट की आयकर छापेमारी, गौरक्षकों की मनमानी, रोज बदलते सरकारी नियमों और भय के वातावरण में इंडियन सैल्युलर एसोसिएशन के अध्यक्ष पंकज मोहिंद्रू ने भारत को व्यापार करने के लिए सब से बुरा देश करार दिया है. नरेंद्र मोदी की विजय के पीछे व्यापारियों की पूरी जमात का खुलाछिपा सहयोग व समर्थन था. वे भाजपा व आरएसएस द्वारा किए गए धर्मराज/रामराज के सुहावने सपने से भ्रमित हो कर भगवा सरकार का प्रयोग करने को बेचैन थे.

अब राज पूरी तरह भगवाइयों के हाथों में आ गया है. इतिहास साक्षी है कि ब्राह्मणों, ऋषिमुनियों, पंडितों को व्यापारी कभी पसंद नहीं आए. हमारे धर्मग्रंथों में ऐसी कहानियां भरी हैं जिन में व्यवसायियों को बुरी तरह दुत्कारा गया है. उन्हें पैसा कमाने के पाप से मुक्ति पाने के लिए बारबार दान देने की सलाह दी गई है.

नए गुड्स ऐंड सर्विसेज ऐक्ट में व्यापारियों पर भारी जुर्मानों और कैद के प्रावधान हैं और हर अफसर को अपार अधिकार दिए गए हैं. यह मान कर चला गया है कि स्वामियों की तरह हर सरकारी अफसर दूध की तरह धुला है जबकि हर व्यापारी बेईमानी के काजल से लिपापुता है.

सरकार कहने को तो हर रोज व्यापार को सुविधाजनक बनाने का वचन देती है पर असल में होता उलटा है. व्यापार चलाना आजकल चारधाम की यात्रा की तरह हो गया है जिस में संकट और खतरे हर पक्ष पर हैं और जब ध्येय पर पहुंच जाओ तो धक्कामुक्की, पुजारियों की डांटफटकार सहने के बाद और मूर्तियों के आगे सैकड़ों का दर्शन पा कर व्यापारीभक्त तृप्त होता है.

ऐसा ही व्यापार चलाने में हो रहा है. पगपग पर अनुमतियां चाहिए. पहले फाइलों के अंबारों से अपने काम निकलवाने होते थे, अब कंप्यूटरों ने उन की जगह ले ली है जिन का सौफ्टवेयर बेहद एकतरफा है, जिस में लचीलापन बिलकुल नहीं है. केवल कुछ चहेते व्यवसायियों को छोड़ कर सब के लिए व्यापार करना कठिन होता जा रहा है.

नोटबंदी के बाद जीएसटी का कानून लाखों छोटे व्यापारियों को नष्ट कर देगा और यह देश की सदियों से बनी व्यापारिक परंपरा को तोड़ देगा. देश का व्यापार कुछ सौ हाथों में सिमट जाएगा. मध्य दरजे के ज्यादातर व्यापारी व उद्योगपति बड़ों के दरबारों के चाटुकार बन कर रह जाएंगे. व्यापार कुशलता नहीं, बल्कि भक्ति और समर्थन इस देश में बिजनैस सैंस बनेंगे, इस का आभास होने भी लगा है. जबजब देश पर विदेशियों ने कब्जा किया, इस देश की अंदरूनी हालत कुछ ऐसी ही थी. आज सिर्फ इतिहास को दोहराया जा रहा है.

संकट से जूझ रहे हैं इंजीनियरिंग कालेज

इंजीनियरिंग हमेशा ही एक प्रशिक्षित पेशा रहा है. हर मातापिता का सपना बच्चे को इंजीनियर या डाक्टर बनाने का रहा है. लेकिन आज इस अवधारणा को धक्का लगता नजर आ रहा है.

लोग बच्चों को इंजीनियर बनाने के बजाय किसी और पेशे में भेजना चाहते हैं.

जिन के बच्चे इंजीनियरिंग कर रहे हैं वे इसे महज स्नातक डिगरी के लिए पढ़ा रहे हैं और कंपीटिशन के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता के रूप में ले रहे हैं.

पहले इक्कादुक्का बच्चा इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता सुना जाता था लेकिन अब बाढ़ जैसी आ गई है.

हर बच्चा बीटैक करता नजर आ रहा है. यह सब ठीक है. नौकरी के अवसर इन बच्चों के लिए अब भी कम नहीं हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ी है. प्रतिभाशाली बच्चे नौकरी कर रहे हैं और अच्छा वेतन पा रहे हैं लेकिन ज्यादातर खाली हैं.

कारण, इंजीनियरिंग की डिगरी के बाद भी छात्रों का ज्ञान शून्य है. अंगरेजी बिलकुल नहीं आती और अब बीटैक की पढ़ाई कर बेरोजगार हैं.

इस हालत के लिए जिम्मेदार कुक्करमुत्तों की तरह खुले इंजीनियरिंग कालेज हैं. वहां पढ़ाई नहीं होती और ढांचागत व्यवस्था चौपट है. इसलिए बच्चे बेकार निकल रहे हैं.

भ्रष्टाचार के कारण इंजीनियरिंग कालेज कुकरमुत्तों की तरह खुलते गए और अब हालात यह है कि इस साल औल इंडिया काउंसिल फौर टैक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) को डेढ़दो सौ संस्थान बंद करने के आदेश देने पड़ रहे हैं.

करीब 1 हजार संस्थान जल्दी ही बंद होने के कगार पर हैं. सैकड़ों कालेज ऐसे हैं जहां न अच्छे शिक्षक हैं और न ही अच्छे छात्र. कई इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिले ही नहीं हुए हैं.

यह स्थिति दुखद है लेकिन ये हालात सरकार ने ही पैदा किए हैं. जो संस्थान मानक के अनुसार नहीं थे उन्हें खोलने की अनुमति क्यों दी गई?

अनुमति देने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. सरकारी संस्थानों की हालत भी सुधारी जानी चाहिए और योग्य शिक्षक रख कर इस पेशे की प्रतिष्ठा को बहाल किया जाना चाहिए.

डोकलाम विवाद सुलझने का बाजार पर अच्छा असर

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई पर सितंबर के आखिरी सप्ताह में देश की दूसरी प्रमुख सूचना तकनीक कंपनी इंफोसिस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विशाल सिक्का के इस्तीफे और उन की जगह नंदन नीलेकणी की ताजपोशी का असर रहा और 27 अगस्त को बाजार 2 सप्ताह के निचले स्तर पर आ गया. लेकिन उस के बाद सूचकांक में तेजी शुरू हो गई. इसी बीच, उत्तर कोरिया ने हाइड्रो बम का परीक्षण किया और इस से वैश्विक तनाव बढ़ गया जिस का सीधा असर बीएसई पर देखने को मिला.

इस बीच चीन में भारत, ब्राजील, रूस, चीन तथा दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स की शिखर बैठक हुई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस में शिरकत की. इसी दौरान भारत व चीन के बीच 2 महीनों से चल रहा डोकलाम विवाद समाप्त हो गया. शेयर बाजार ने इस का जोरदार स्वागत किया और बाजार में उत्साह का माहौल रहा व जम कर कारोबार हुआ. इन सब स्थितियों के बावजूद सितंबर के पहले सप्ताह में सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई. हालांकि डोकलाम विवाद के सुलझने से निवेशकों का मनोबल मजबूत है. सितंबर के पहले सप्ताह में बाजार रिकौर्ड तेजी पर बंद हुआ.

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