‘अच्छे दिन कभी नहीं आते. भारत असंतुष्ट आत्माओं का महासागर है. इस की वजह से कभी भी किसी को किसी चीज में समाधान नहीं मिलता. जिस के पास साइकिल है, उसे गाड़ी चाहिए. जिस के पास गाड़ी है, उसे कुछ और. वही पूछता है कि अच्छे दिन कब आएंगे...’

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ये शब्द मुंबई में 13 सितंबर, 2016 को उद्योग जगत से जुड़े एक समारोह में कहे थे. उन की आवाज में कसक भी थी और मीडिया के लिए चेतावनी भी थी कि वह अच्छे दिनों को गलत रूप में पेश न करे. चूंकि वे खुद ही सच बोलने पर आमादा हो आए थे, इसलिए उन्होंने यह भी ईमानदारी से मान लिया कि यह अच्छे दिनों का नारा तो सरकार के गले की हड्डी बन गया है.

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