नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के भाषणों और वक्तव्यों में न तो नयापन है और न ही देश के विकास की ठोस योजना. जनता को बरगलाने के खोखले दावों की पोटली जरूर है. प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार माने जा रहे इन दोनों दिग्गजों की शख्सीयत का विश्लेषण कर रहे हैं जगदीश पंवार.

देश में पहली बार कुछकुछ अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री पद के 2 दावेदार जनता को लुभाने की होड़ में निकल पड़े हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री व भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया है तो राहुल मोदी के घोड़े को थाम कर कांग्रेस की नैया पार लगाने में जुट गए हैं. मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दोनों अपनाअपना विकास का नजरिया पेश कर रहे हैं. मोदी के विकास के हवाई प्रवचनों में चमत्कार, जादू की कहानियां हैं तो राहुल के दावों में बदलाव को ले कर सवाल हैं. जवाब दोनों महारथियों के पास नहीं हैं. हालांकि दोनों को अभी तक उन की पार्टियों ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है.

भाजपा की रामलीला में अभी तक तय ही नहीं हो पाया, राम कौन बनेगा. रामनाम जपने वाली इस पार्टी में राम के लिए महाभारत दिख रहा है. दावेदार कई हैं पर वनवास के लिए नहीं, राजतिलक कराने के लिए आतुर हैं. लक्ष्मण, भरत, हनुमान बनने को कोईर् तैयार नहीं. अलबत्ता तवज्जुह न मिलने पर विभीषण और बातबात पर श्राप देने वाले व संन्यास की धमकी देने वाले जरूर दिखते हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की बेचैनी साफ देखी जा सकती है.

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