विकास और बदलाव के तमाम दावों के बीच देश में चुनावी नतीजे जातीय आंकड़ों पर टिक जाते हैं. चुनाव में जाति का गणित सिर्फ दलित या पिछड़े वर्ग तक सीमित नहीं है बल्कि ऊंची जातियां भी ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य के खांचे में बंटी हैं. वहीं, मुसलिम भी कई जातियों में बंटे हुए हैं. ये तमाम जातियां चुनावी समर में हारजीत का जातीय आधार कैसे तैयार करती हैं, पड़ताल कर रहे हैं शैलेंद्र सिंह.
मोहनलालगंज लोकसभा सीट सुरक्षित सीट है. यहां केवल दलित वर्ग के नेता ही चुनाव लड़ते हैं. यह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटी हुई सीट है. लखनऊ का विस्तार होने से शहरीकरण का असर इस इलाके में भी दिखता है. चुनाव प्रचार के दौरान इस लोकसभा क्षेत्र के नगराम, समेसी, हरौनी, गोसांईगंज जैसे गांव और कसबों को करीब से देखने का मौका मिला. लगातार दलित बिरादरी के सांसद बनने के बाद भी इस लोकसभा क्षेत्र में रहने वाली दलित बिरादरी की हालत काफी खराब और उपेक्षित ही है.  
गांव में सड़कें और पक्के खड़ंजे वाले रास्ते बन जाने से बदलाव दिखता है. लेकिन जब इस बदलाव को महसूस करने की कोशिश की जाती है तो सच सामने आ जाता है. नगराम और गोसांईगंज जाने वाली सड़क पर समेसी गांव पड़ता है. यहां ओबीसी और दलित जातियों के लोग सब से अधिक संख्या में रहते हैं. इन ओबीसी जातियों के लोग आर्थिक दृष्टि से मजबूत स्थिति में नहीं हैं. बहुत सारे परिवार दलित परिवारों जैसी हालत में ही रहते हैं. इस के बावजूद ओबीसी वालों और दलितों के बीच सामाजिक रूप से वही दूरी है जो दलितों और सवर्णों के बीच है. यही कारण है कि यहां की लोकसभा की सीट और विधानसभा की सीटों पर ज्यादातर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं.
यहां से सपा के टिकट पर 2 बार लोकसभा सीट जीतने वाली रीना चौधरी कहती हैं, ‘‘वोट पूरी तरह से जातीय समीकरणों को देख कर दिए जाते हैं. समाजवादी पार्टी को पिछडे़ वर्ग के वोट मिलते हैं, ऐसे में दलित प्रत्याशी खडे़ होने का उस को लाभ मिलता है. यहां अभी भी छुआछूत की बुरी बीमारी मौजूद है. बात करने पर भले ही यहां लोग इस बात से इनकार करें पर आपस में ये लोग भेदभाव करते हैं. यह भेदभाव केवल दलित और पिछड़ों में ही नहीं है, दलितों की अलगअलग बिरादरियों के बीच भी ऐसी दूरी बनी हुई है.’’ 
मन में भेदभाव कायम
लखनऊ-रायबरेली राजमार्ग से 6 किलो- मीटर दूर समेसी में रहने वाले रैदास बिरादरी के गजेंद्र कहते हैं, ‘‘अभी भी लोगों के मन में भेदभाव कायम है. किसी भी सामाजिक आयोजन में ऐसे भेदभाव को महसूस किया जा सकता है. जो लोग सत्ता के साथ आगे बढ़ गए हैं उन को ऐसे हालात का सामना नहीं करना पड़ता है, पर सामान्य दलित के साथ भेदभाव कायम है. अभी भी अगर हम किसी सवर्ण के यहां जाते हैं तो हमें खानेपीने के लिए अलग बरतन दिए जाते हैं और बरतन हमें खुद ही धोने पड़ते हैं.’’ 
समेसी से 7 किलोमीटर आगे बढ़ने पर नगराम कसबा आता है. यहां मुसलिम बिरादरी की संख्या ज्यादा है. दलित और पिछड़ी बिरादरी के लोग भी काफी संख्या में यहां रहते हैं. दलितों के बीच आपस में छुआछूत क्यों है? इस बारे में पासी बिरादरी के रामकेवल कहते हैं, ‘‘रैदास बिरादरी के लोगों से छुआछूत का व्यवहार होता है. इस की अपनी वजह है. ये लोग मरे जानवर उठाने का काम करते थे. इस के अलावा जिस बिरादरी के लोग मांसाहार हैं उन के साथ भी छुआछूत का व्यवहार होता है. सामान्यतौर पर बाजार में छुआछूत नहीं दिखती पर जब कोई निजी आयोजन होता है तो यह भेदभाव साफतौर पर देखा जाता है.’’ रामकेवल अनाज की खरीदफरोख्त करते हैं. वे आगे कहते हैं, ‘‘जमीनी स्तर पर जो भेदभाव बना हुआ है उस का असर चुनाव में भी साफ दिखता है.’’
नगराम से 12 किलोमीटर दूर गोसांईगंज के रहने वाले रामाधार चौधरी खेती करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘शहर और कसबों में रहने वाले सामाजिक समानता की बात करते हैं, पर जब वोट देने का नंबर आता है तो उन की सोच पूरी तरह से जातिवादी हो जाती है. पिछले कुछ सालों से दलित और पिछडे़ भी अगड़ी जातियों की तरह पूजापाठ, व्रत, उपवास करने लगे हैं. उन को लगता था कि हो सकता है कि इस तरह से वे भी अगडे़ हो जाएं पर यह भेदभाव वहां कायम है. दलित के घर का प्रसाद भगवान के भय से कई लोग ले तो लेते हैं पर बाद में उसे किसी जानवर या पक्षी को खिला देते हैं. कानूनी दांवपेंच के  डर से छुआछूत भले ही न होती हो पर निजी जीवन में अभी भी इस का पूरा असर कायम है.’’
सपा नेता रीना चौधरी कहती हैं, ‘‘चुनाव में जीत का आधार पूरी तरह से जातीयता तय करती है. मजेदार बात यह है कि जितना इस को खत्म करने का प्रयास किया जाता है, यह भावना उतनी ही बढ़ती जा रही है. केवल दलित और पिछडे़ ही नहीं ऊंची जातियां भी ठाकुर, ब्राह्मण और वैश्य बिरादरी में बंटी हुई हैं. यही कारण है कि बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग की बात की. दलित की अगुआई करने वाली इस पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग के बहाने ऊंची जातियों के वोटबैंक का लाभ उठाने की कोशिश की. धर्म के बाद आज भी सब से पहले लोगों को जाति का खयाल आता है.’’
जातीय विचारधारा
आजादी के कुछ समय बाद ही यह महसूस होने लगा था कि जातिवाद इस देश का बड़ा नुकसान करेगा. इसलिए जाति का विरोध शुरू हो गया. दलित बिरादरी के लिए डा. भीमराव अंबेडकर ने जिस तरह से आंदोलन चलाया उसी तरह से सोशलिस्ट पार्टी ने पिछड़ों की आवाज उठाई. सोशलिस्ट पार्टी के विचारक 
डा. राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछडे़ पावें सौ में साठ’. यहीं से आगे समाजवादी विचारधारा का जन्म हुआ. 
राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने जो मुहिम चलाई वह कुछ दिनों में ही कांग्रेस विरोध की राजनीति में बदल गई. खासतौर पर यह विरोध कांग्रेसी नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ रहा. 1975 में इमरजैंसी के दौरान इस गठजोड़ का असर दिखा. इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं. सामाजिक और जातीय आंदोलन करने वाली सोशलिस्ट पार्टी राजनीतिक बदलाव की हिमायती हो गई. 
जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया ने भले ही राजनीति से दूरीबनाए रखी पर उन के अनुयायी जातीयता खत्म करने के बजाय उस का हिस्सा बन गए. बिहार में लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह ने जाति के बंधन को तोड़ने का सामाजिक काम नहीं किया. उन को वोटबैंक की राजनीति रास आने लगी. वे टिकट बंटवारे से ले कर मंत्री बनाने और सरकारी नौकरी में ट्रांसफर से ले कर पोस्ंिटग तक में जातीयता का खयाल करने लगे.  
सामाजिक चिंतक हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं, ‘‘जाति के विरोध में जो विचारधारा बनाई गई, समय के साथ वह वोटबैंक में बदल गई और यह वोटबैंक नई जातीय विचारधारा बन गई. पिछडे़ ही नहीं, दलितों के साथ भी ऐसा ही हुआ. मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद दलितों के विकास के लिए कोई काम नहीं हुआ. मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग की बात कर के दलितों को एक नए ब्राह्मणवादी समाज का हिस्सा बना दिया. यहां सामाजिक रूप से न सही पर आर्थिक रूप से वैसा ही भेदभाव होने लगा जैसा पहले होता था.’’
अखिल भारतीय पासी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामलखन पासी कहते हैं, ‘‘बसपा ने दलित आंदोलन का लाभ तो लिया पर सत्ता में आने के बाद इस आंदोलन के मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश से बाहर बसपा का विस्तार नहीं हो सका. अब बसपा में भी जाति विभाजन होने लगा है. कुछ उपजातियां पार्टी से अलग अपना भविष्य देखने लगी हैं.’’
विकास की बात व जाति का साथ
16वीं लोक सभा चुनाव के पहले हर दल विकास, कुशासन, भ्रष्टाचार, काला धन, सड़क और पानी पर चुनाव लड़ने जैसी बड़ीबड़ी बातें कर रहा था. चुनावी प्रक्रिया शुरू होते ही नेता जातिरूपी बातें करने लगे. नेताओं की इन्हीं बड़ीबड़ी बातों का प्रतिफल है कि आजादी के 67 साल बाद भी जाति की जकड़न समाज को छोड़ने को तैयार नहीं है. नरेंद्र मोदी की पिछड़ी जाति को प्रचारित किया जाता है. देश में वोट देने वाले लोगों को पहली बार पता चलता है कि नरेंद्र मोदी पिछड़ी बिरादरी के हैं.  
जाति का प्रभाव राजनीति की दशा और दिशा दोनों तय करता है, यह हमेशा से होता आया है. उत्तर प्रदेश में मायावती ने जिस सोशल इंजीनियरिंग की बात साल 2007 में की थी, तमिलनाडु में 60 के दशक में गैर ब्राह्मण फार्मूले के रूप में इस का प्रयोग किया गया था. कम्युनिस्टों के प्रभाव वाले राज्यों में भी जाति का प्रभाव दिखता रहा है. हरियाणा में बनी 20 सरकारों में 13 मुख्यमंत्री जाट बिरादरी के बने क्योंकि वहां जाट बिरादरी के लोगों की तादाद ज्यादा है.  
लहर नहीं जातीयता पर भरोसा  
नरेंद्र मोदी दूसरे उम्मीदवारों को यह बता रहे थे कि देश में उन के नाम की लहर है. लेकिन जब वे खुद उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो जातीय समीकरण ठीक करने लगते हैं. वाराणसीलोकसभा क्षेत्र में करीब 16 लाख मतदाता हैं. यहां पर ब्राह्मण 2 लाख 50 हजार, मुसलिम 3 लाख, भूमिहार 2 लाख, बनिया 2 लाख, पटेल व कुरमी 2 लाख, दलित 2 लाख व बाकी अन्य जातियां हैं. पटेल, कुरमी और पिछड़ी जातियों के वोट अपने साथ जोड़ने के लिए नरेंद्र मोदी की पहल पर भाजपा को अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल से समझौता करना पड़ा. नरेद्र मोदी को अपनी लहर पर यकीन नहीं था इस कारण उन्होंने अनुप्रिया पटेल की शर्तों पर समझौता किया.  
भाजपा को चिंता थी कि अगर अपना दल से समझौता नहीं हुआ तो नरेंद्र मोदी को वाराणसी मेंजीतना मुश्किल हो जाएगा.  बिहार में जातीय समीकरण सुधारने के लिए भाजपा ने नरेंद्र मोदी का विरोध कर एनडीए छोड़ने वाले लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान को अपना सहयोगी दल बना लिया. दिल्ली में भी भाजपा का सदा विरोध करने वाले इंडियन जस्टिस पार्टी के उदित राज को साथ लेना पड़ा. 

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