अकसर देखी होंगी आप ने ऐसी दुकानें जिन के मालिक मुसकराते हुए ग्राहकों का स्वागत करते हैं या सेल्समैन जो बड़े प्यार से हंसतेमुसकराते ग्राहकों को उन की जरूरत की चीजें दिखा रहे होते हैं. ऐसी दुकानों में हमेशा ही ग्राहकों का हुजूम लगा रहता है. कहा भी गया है, जिन के होंठों पर मुसकान नहीं उन्हें दुकान नहीं खोलनी चाहिए. दुकानदारी का यह उसूल जिंदगी की हकीकत है. जीवन में हंसतेमुसकराते आप दूसरों से हर काम करवा सकते हैं. मुंह बना कर रहेंगे तो दोस्त भी पास आने से कतराने लगेंगे. जिंदगी वैसे ही काफी दुरूह और गंभीर है. हर मोड़ पर जिंदगी ऐसे सवाल खड़े करती है कि जवाब खोजतेखोजते दिमाग का फलूदा बन जाता है. हर कोई परेशान है, तो जाहिर है, सब को जरूरत है ऐसे की जो उन्हें हंसा सके, जी हलका कर सके.

क्रोध, चिंता, डर आदि तो इंसान के साथ तब से हैं जब से वह पैदा हुआ मगर हास्य का जीवन में प्रवेश यकीनन भाषा के परिपक्व होने के बाद ही हुआ. एक इंसान ही है, जिसे कुदरत ने हंसने की शक्ति दी है. मगर यह देख कर तकलीफ होती है कि जानेअनजाने हम हंसना भूलते जा रहे हैं. हास्य हमें समस्याओं में घुलते रहने से दूर करता है. यह इंसान की गहरी, दबी भावनाओं को बाहर आने को प्रेरित करता है. कुदरत ने सिर्फ इंसानों को हंसने की क्षमता दी है. इंसान के बच्चे जन्म के बाद पहले सप्ताह में ही मुसकराना शुरू कर देते हैं, और 1 महीना होतेहोते यह मुसकराहट हंसी में तबदील हो जाती है.

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