मेरे बाबूजी एक विशाल व्यक्तित्व थे. ‘सादा जीवन उच्च विचार’ सिद्धांत पर चलने वाले मेरे बाबूजी बचपन में ही अनाथ हो गए थे. रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह पढ़ाई कर, साथ ही अपना गुजारा करने लायक काम कर बड़े हुए. उन की हिंदी, अंगरेजी उर्दू व मराठी भाषा पर अच्छी पकड़ थी. पढ़ने के शौकीन बाबूजी अपने अतिव्यस्त जीवन में जब भी मौका मिलता, पढ़ते ही दिखते.

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