एक नेताजी बस में यात्रा कर रहे थे. थोड़ा अजीब लगता है लेकिन उस दिन शायद उन की कारें पत्नी के रिश्तेदारों की सेवा में लगी होंगी. यही एक ऐसी जगह होती है जहां किसी मर्द की कोई अपील काम नहीं करती. सो, उस दिन वे बस में यात्रा करने को मजबूर थे. लेकिन उन के पड़ोस वाली सीट पर एक सुंदर स्त्री आ कर बैठी जिस ने निहायत उम्दा सेंट लगा रखा था. वह यों महक रही थी कि नेताजी का ईमान डोलने लगा. वे धीरेधीरे उस के पास सरकने लगे. धीरेधीरे पास सरकने की या अवसर से न चूकने की कला सभी नेताओं को मानो घुट्टी में ही पिलाई जाती है.

सो, नेता सरकसरक कर महिला से एकदम सट गए. बिलकुल दबोच दिया उन्होंने उस बेचारी को. महिला बड़े संकट में फंसी थी. वह उन के अंदर के पुरुष का सम्मान भले न करती हो पर शुद्ध खद्दर और गांधी टोपी का लिहाज उसे था. कहे तो क्या कहे. जब बिलकुल ही सट गए, महिला को सांस लेना दूभर होने लगा तो फिर नेताजी ने ही कहा, ‘क्षमा करें, आप ने यह कौन सा सेंट लगा रखा है? मैं अपनी पत्नी के लिए खरीदना चाहता हूं.’ बोलतेबोलते नेताजी ने उस का हाथ अपने हाथ में लिया.

उस महिला ने मीठे स्वर में कहा, ‘जो गलती मैं ने की है उसे आप भी दोहराएंगे?’ नेताजी कुछ समझे नहीं. उन्होंने कहा, ‘मैं कुछ समझा नहीं.’ महिला ने उन के हाथ पर से हाथ फेरते हुए कहा, ‘क्या आप पसंद करेंगे कि अन्य लोग आप की पत्नी के इतने करीब आएं, उन के शरीर से बिलकुल सट कर पूछें कि आप ने कौन सा सेंट इस्तेमाल किया है, मैं भी अपनी पत्नी के लिए खरीदना चाहता हूं?’

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