दिल्ली की महानगरीय जीवनशैली में सुबह से ही ट्रैफिक की भरमार से अंदाजा लगाया जा सकता है कि महानगरों में किस हद तक व्यस्तता अपने चरम पर है. महिला व पुरुष भेड़बकरियों की तरह बसों में चढ़तेउतरते हैं. ऐसे ही एक ठसाठस भरी बस में मुझे भी चढ़ने का अवसर मिला. यह बस इतनी भरी हुई थी कि बैठने के लिए जगह मिलना दूर, इस भीड़ में खड़े रहना भी मुश्किल था. बस में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें खड़े होने में ही आनंद आ रहा था. सीटें खाली होतीं पर जनाब खड़े रहते और खाली सीट पर कोई भद्र महिला अपना कब्जा जमा लेती. जब भी बस किसी स्टौप पर रुकती और अगर कोई महिला बस में चढ़ती तो पहले तो उसे गेट से अंदर आने के लिए खचाखच भरी भीड़ का सामना करना पड़ता, फिर जैसे ही वह अपने को व्यवस्थित करती, उस की खोजी नजर इस बात की तहकीकात करती नजर आती कि कहीं उसे महिला सीट पर पुरुष दिखाई दे जाए और वह महिला सीट के जुमले के सहारे उक्त सीट पर बड़ी विनम्रता के साथ आसन जमा सके.

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