विश्वकप पुरुष वर्ग कबड्डी के खिताबी मैच में 2 बार के चैंपियन भारत ने ईरानी हमले को 38-29 की जीत में बदल कर विश्व विजेता का दरजा हासिल किया तो सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री से ले कर देश की तमाम बड़ी हस्तियों ने बढ़चढ़ कर बधाई दी. लेकिन यही खिलाड़ी जब नई दिल्ली हवाईअड्डे पर अहमदाबाद से लौटे तो उन्हें स्वागत करने और प्रोत्साहित करने के लिए एक भी सरकारी नुमांइदा वहां नहीं पहुंचा. जाहिर है पारंपरिक खेलों के प्रति सरकार का नजरिया अब भी जस की तस है.

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के लिए बड़ीबड़ी बातें करती हैं मगर खेलों को कितना बढ़ावा मिल रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है. यही यदि क्रिकेट होता तो मंत्री से ले कर अफसर तक एयरपोर्ट पर खिलाडि़यों के स्वागत के लिए खड़े रहते.

खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता कोई नई बात नहीं है. हौकी जैसे राष्ट्रीय खेल का जो हश्र हुआ है उस के लिए पूरी तरह से सरकारी तंत्र ही जिम्मेदार है. हौकी का स्तर गिरता गया और सरकारी तंत्र सोता रहा. सरकार ने सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया. विश्वकप जीतने वाली महिला कबड्डी खिलाडि़यों को होटल तक पहुंचने के लिए आटोरिकशा तलाशने पड़े तो समझा जा सकता है अव्यावसायिक खेलों के खिलाडि़यों से किस तरह का व्यवहार किया जाता है या फिर उन्हें किस तरह की सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं. रियो ओलिंपिक में भारत की लाज 2 महिला खिलाडि़यों ने बचाई. ये उन की अपनी उपलब्धि कही जा सकती है न कि सरकार की.

अधिकांश खेलों की लगाम अब औद्योगिक घरानों के हाथों में आती जा रही है, खिलाड़ियों की बोली लग रही है, खिलाड़ी अपने मालिक के प्रति वफादार हो रहे हैं, न कि देश के प्रति. खेलों का बेड़ा गर्क हो रहा है. विश्व में खेलों को ले कर भारत की किरकिरी हो रही है. लेकिन सरकारी नुमांइदों के चेहरों में शिकन तक नहीं.

बेशर्मी की हद तब हो जाती है जब रियो जैसे बड़े आयोजनों में सरकारी पैसे से मंत्री और मंत्री के चमचे अपने मजे के लिए भ्रमण पर जाते हैं और करोड़ों रुपए का हिसाब सरकारी खाते में डाल देते हैं. खेल के नाम पर पैसों की लूट मची हुई है. हर कोई अपनी जेबें भरने में लगा हुआ है लेकिन उन खिलाडि़यों की सुध लेने वाला कोई नहीं जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कई मैडल जीते हैं. आज वे दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं.

जितनी धनराशि ओलिंपिक विजेताओं को दी जाती है, यहां यह मतलब नहीं है कि उन्हें देना नहीं चाहिए, उतनी धनराशि यदि सरकार स्कूलों व विश्वविद्यालयों की खेल संबंधी गतिविधियों और प्रतिभाशाली खिलाडि़यों के प्रशिक्षण पर खर्च करती तो बात कुछ और ही होती.

खेल एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारत दुनिया के सब से गरीब देशों से भी पिछड़ा हुआ है. ओलिंपिक में छोटेछोटे गरीब देशों के खिलाड़ी मैडल जीत कर ले जाते हैं.

खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता के चलते न तो प्रतिभावान खिलाडि़यों को तलाशा जाता है और यदि तलाश भी लिया जाता है तो उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती हैं.

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