‘सियापा’ पंजाबी का शब्द है, जिस का मतलब है रोनाधोना. पंजाबी भाषा में कहें तो सियापा तब किया जाता है जब घर में कोई बुरी घटना घटी हो. ‘टोटल सियापा’ फिल्म, जैसा कि टाइटल से स्पष्ट है, में सिर्फ सियापा है, इस के अलावा कुछ नहीं.

फिल्म के हीरोहीरोइन अली जफर और यामी गौतम ज्यादा जानेपहचाने नहीं हैं. अली जफर की 2-3 फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं, जिन में ‘मेरे ब्रदर की दुलहन,’ ‘लंदन पैरिस, न्यूयार्क’ और ‘चश्मे बद्दूर’ प्रमुख हैं. यामी गौतम फेयर ऐंड लवली क्रीम के विज्ञापन से फिल्मों में आई है और उस की एक फिल्म ‘विक्की डोनर’ प्रदर्शित हो चुकी है.

फिल्म में इस जोड़ी ने दर्शकों को बहुत ज्यादा आकर्षित नहीं किया है. ‘टोटल सियापा’ की कहानी एकदम सपाट है, फिल्म की रफ्तार भी धीमी है.

अमन (अली जफर) और आशा (यामी गौतम) लंदन में रहते हैं और एकदूसरे को पसंद करते हैं. आशा एक दिन अमन से अपने घर चलने को कहती है. अमन उस के घर नहीं जाना चाहता क्योंकि उसी दिन उसे लंदन पुलिस ने पाकिस्तानी होने के नाते पूछताछ के लिए रोका था. आशा की जिद करने पर वह आशा के साथ चला जाता है. आशा की मां (किरन खेर) एक पाकिस्तानी को अपना दामाद नहीं बनाना चाहती. आशा के भाई को भी पाकिस्तानियों से नफरत है. आशा के पिता (अनुपम खेर) उस वक्त घर में नहीं हैं. अमन वहीं आशा के घर में रुक जाता है. लेकिन जब आशा के पिता आते हैं तो पूरे घर में सियापा शुरू हो जाता है.

इस फिल्म में यामी गौतम ओवरऐक्ंिटग की शिकार हुई है. अनुपम खेर के किरदार को ज्यादा मौका नहीं मिला है, किरन खेर की ऐक्टिंग अच्छी है. फिल्म का निर्देशन साधारण है, गीतसंगीत में दम नहीं है. छायांकन ठीक है.

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