मंडी हो या बाजार हर कदम पर किसान ठगे जाते हैं. नेतागण किसानों के लिए सिर्फ घडि़याली आंसू बहाते हैं, क्योंकि उन्हें किसानों के वोट लेने होते हैं. असल में किसान अपनी परेशानियों से तंग रहते हैं. जब तक उन के बस में होता है तब तक वे हर किस्म की मार सहते हैं. कई बार खुद जान गवां देते हैं, लेकिन ठगने, लूटने व सताने वालों की जान नहीं लेते. खेती से होने वाली कमाई बढ़ाने के सरकारी हथियार भोथरे हैं. किसानों से जुड़ी यह जमीनी हकीकत ओहदेदारों को नजर नहीं आती. लिहाजा किसानों के हालात नहीं सुधरते. प्रधानमंत्री ने किसानों की खातिर ठोस स्कीमें चलाने की हिदायत दी थी, लेकिन मातहत नहीं मानते. जब रसोईगैस की छूट खातों में जाने लगी, तो खाद की छूट किसानों के खातों में क्यों नहीं भेजी जाती? गन्नाकिसानों का बकाया क्यों नहीं मिल रहा? ऐसे और भी कई मामले  हैं.

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