‘फिर अब आप क्यों आये हैं? आप क्यों यह बातें मुझे बता रहे हैं? क्या आप आशीष को वापस पाना चाहते हैं? या उसे यह सब बता देना चाहते हैं? प्लीज ऐसा मत करिएगा...’ संजीव की आवाज थरथराने लगी.

डॉ. अभय तुरन्त उठ कर उनके पास आये और उसके कन्धे पर हाथ रख कर वहीं सोफे पर बैठ गये, बोले, ‘अरे,  नहीं, नहीं... आप मुझे गलत समझ रहे हैं. मैं सिर्फ अपने दिल के हाथों विवश होकर कल रागिनी की तेरहवीं में आया था. मन में यह इच्छा भी थी कि इस बहाने से एक नजर अपने बेटे को देख सकूं. सो देख लिया.  मेरा उस पर कोई अधिकार नहीं है, आपने उसको पाला है, उसे प्यार दिया है, उसका भविष्य बनाया है, वह आपका ही है और हमेशा रहेगा. मैं तो बस एक चाह लेकर आया था आपके पास...’

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