समीर न जाने कब से आराम कुर्सी पर निश्चेष्ठ सा बैठा हुआ था. कहने को लैप टौप खुला हुआ था,पर शायद एक भी मेल उसने पढ़ी नहीं थी.रविवार के दिन वो अक्सर नंदिनी मौसी से बालकनी में कुर्सी डलवा कर बैठ जाया करता था,पर आज तो सूरज की अंतिम किरण भी अपना आँचल समेट चुकी थी.शीत ऋतु की ठंडी हवाएँ अजीब सी सिहरन उत्पन्न कर रही थीं,पर वो यों ही बैठा रहा.एक बार नंदिनी मौसी फिर चाय के लिए पूछ ग़ई थीं.बड़े ही प्यार से उन्होने समीर के कंधे पर अपना हाथ रक्ख़ा तो उसकी आँखे भीग आयीं थीं.नि:श्वास छोड़ते हुए बस इतना ही मुँह से निकला ,

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