लगभग सारे देश के पहाड़ों में रहने वाले आदिवासियों के शहरी धाॢमक जीवन पसंद नहीं आया है. वे पहाड़ों में खुश हैं, मस्ते हैं, अपनी सूखी रोटी, जानवरों के शिकार और फलफूल से तंदुरुस्त हैं. अफसोस यह है कि शहरी लोग उन्हें जबरन अपने ढांचे में ढालना चाह रहे हैं और उन के पहाड़ों, जमीन, जंगलों पर कब्जा करना चाह रहे हैं. ज्यादातर आदिवासियों ने तो यह हमलों का मुकाबला नहीं किया पर छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिमी बंगाल में ऐसे टुकड़े हैं जहां आदिवासियों ने माओवादी झंडे के नीचे इकट्ठे हो कर सत्ता से लडऩे की ठान रखी है.

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