मोदी सरकार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बस में चढ़ कर करोड़ों भक्त बनाए थे जो जन्म से पाठ पढ़ते आए हैं कि पूजापाठ करने से ही जीवन मिलता है, सुख मिलता है, स्मृद्धि मिलती है, लक्ष्मी मिलती है, अगला जन्म अच्छे कर्म में होता है. ये भक्त भाजपा के लिए मरनेमारने को तैयार तो हैं पर देश या समाज के लिए कुछ करने को तैयार हैं, यह एकदम अस्पष्ट है.

इस बार फिर 5 विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी देश निर्माण, औद्यिगत निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण आदि की नहीं, राम मंदिर, कृष्ण मंदिर, गंगा किनारे घाटों, चारधामों, ङ्क्षहदूमुस्लिम, ङ्क्षहदू राष्ट्र की ही बात करती दिखी. एक भक्त के चूंकि लगता है कि इसी से तो उस का धर्म के प्रति कर्तव्य पूरा होगा जिस से कोई न कोई भगवान प्रसन्न होगा और वह झप्पड़ फाड़ कर कटोरे में खाना भी डाल देगा और लक्ष्मी भी.

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आम ङ्क्षहदू मंदिरों में पूजापाठ अपनी गलतियों के लिए दुख मनाने नहीं जाता, वह मंदिर से कुछ पाना चाहता है. बिना हाथपैर हिलाए लगता है यह बात महाभारत युग में भी कृष्ण को मालूम थी कि उन के युग में भी लोग काम चोर हैं क्योंकि पूरा गीत पाठ कर्म करने पर लगा रहा. हां यह बात दूसरी कि गीता बारबार कहती रही कि इस कर्म का फल तुम ही पाओगे यह जरूरी नहीं. अब कर्म किया है तो कोई तो फल पाएगा न. यह कोई उस युग में भी और आज भी या तो राजा और उस के बाङ्क्षशदे थे या मंदिरों के रखवाले या उस से जुड़े लंबे चौड़े व्यवसाय से.

भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी में ऐसा प्रचारक देखा जो एक सुंदर भविष्य के सपने दिखा कर लोगों के कर्म का फल छीन सकता था और उन से अपनी भक्ति भी करवा सकता था. ज्यादातर धर्मों में यही हुआ है पर आज शायद सिर्फ नरेंद्र मोदी विश्व के इकलौते शासक हैं जो धर्म का वादा कर के लोगों को खुश करने की क्षमता रखते हैं.

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