नए नोटों के कारण अपने घरों से दूर रह रहे छात्रों और ट्रेनियों को कितनी परेशानी हो रही है, इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. छोटे शहरों से आ कर बड़े शहरों में पढ़ाई कर रहे ज्यादातर छात्र नक्दी पर काम करते हैं. उन के मातापिता जहां रहते हैं या जितने पढ़ेलिखे हैं उन से नोटों को बदलना सांपसीढ़ी का खेल खेलने सरीखा मुश्किल है. उन के पास बच्चों की पढ़ाई के लिए जो था, वह नक्द था और अब छूमंतर हो गया है. सैकड़ों छात्र वापस अपने कसबों में चले जाएं तो बड़ी बात नहीं है. इन छात्रों ने रहने का जो ठीहा ढूंढ़ा है वह भी नक्दी पर काम करते हैं और वे ओवर नाइट बदल जाएंगे, इस की उम्मीद न करें. जब से बैंकों ने अकाउंट्स खोलने के लिए तरहतरह के प्रमाणपत्र मांगने शुरू किए हैं, वैसे भी कठिनाइयां होने लगी हैं.

ये छात्र सड़कछाप ढाबों के सहारे जीते हैं और इन के पास भी इतना पैसा नहीं होता कि ये कई दिन तक उधार दे सकें या क्रैडिट कार्ड (अगर किसी के पास है तो) का इस्तेमाल करने की मशीन रख सकें. नोट अवैधीकरण की मार बड़ों को पड़े या न पड़े छोटों को जरूर पड़ेगी, इस में शक नहीं. यह नोट अवैधीकरण इन छात्रों का कल सुधारेगा, इस की कोई गारंटी नहीं है. 19 जुलाई, 1969 को बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था तो लगा था कि अब चमचमाता सूरज निकलेगा. 50 साल बाद क्या हुआ? सरकारी बैंक बीमार हैं और निजी बैंक फिर से मौजूद हैं. इंदिरा गांधी का तुगलकी फैसला किस काम का रहा? उस समय के छात्र समुदाय ने समाजवाद का जम कर समर्थन किया था, पर वे छात्र आज वृद्ध हो गए हैं और उन्हें क्या मिला है? क्या बैंकों के सरकारीकरण का लाभ हुआ? परिणाम तो यह हुआ कि गद्दी बचाने के लिए 1975 में आपातस्थिति घोषित करनी पड़ी.

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