व्यावसायिक मैडिकल शिक्षा को बल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया द्वारा आदेशित कौमन मैडिकल एंट्रैंस टैस्ट के नियम को असंवैधानिक करार दे दिया है.  इस से लगभग 300 कालेज खुश होंगे जो निजी सैक्टर के हैं. कौमन टैस्ट के कारण वे अपनी मनमरजी के अनुसार छात्रों को मैडिकल कालेजों में प्रवेश नहीं दे पा रहे थे. छात्रों को अब अलगअलग संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अलगअलग टैस्टों में बैठना पड़ेगा और वे देशभर में मारेमारे फिरेंगे.

शिक्षा सरकारी हो या निजी, यह बहस कभी खत्म न होने वाली है. सरकारी शिक्षा का तो शिक्षकों, शिक्षा प्रबंधकों और अफसरों ने ऐसा कबाड़ा किया है कि अरबों रुपए हर साल खर्च करने के बावजूद स्तर नीचे ही गिरता चला गया है. दशकों से शिक्षा संस्थान विवादों, हड़तालों, लूट, हेरफेर, चमचागीरी के केंद्र रहे हैं और वहां पढ़ाई के अलावा सबकुछ होता रहा है. सरकारी शिक्षा सस्ती होने के कारण सरकारी कालेजों के सामने लंबी लाइनें लगती रहीं और उच्च शिक्षा पर कुछ वर्गों और कुछ जातियों का एकाधिकार बनाए रखने के नाम पर सरकार ने इन की गिनती नहीं बढ़ाई.

इन सस्ते सरकारी संस्थानों में प्रवेश के लिए लंबी लाइनें लगीं और लाखों की रिश्वतें दी जाने लगीं. इन के पर्याय के रूप में प्राइवेट मैडिकल कालेज खुले और थोड़ीबहुत आनाकानी के बाद सरकार ने उन्हें स्वीकार कर लिया.  यह अच्छा था क्योंकि सरकार के बस में और कालेज खोलना न था. पर इन में चूंकि बहुत पूंजी लगती है, छात्रों से मोटी फीस देने की जबरदस्ती की गई, उन से कैपिटेशन फीस भी वसूली जाने लगी.

मैडिकल शिक्षा इस तरह बेहद महंगी हो गई और साथ ही, प्रवेश में ढेरों धांधलियां भी होने लगीं. मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ने इसे रोकने के लिए कौमन एंट्रैंस टैस्ट की व्यवस्था थोपी थी पर चूंकि इस से निजी कालेजों के प्रबंधकों के मौलिक अधिकार छिन रहे थे, सर्वोच्च न्यायालय ने उसे गलत ठहरा दिया.  इस समस्या का हल आसान नहीं. नाम वाले निजी कालेज अब पुराने सरकारी कालेजों की तरह ख्याति पाने लगे हैं और प्रवेश के लिए इच्छुकों की भीड़ कम नहीं हुई. बच्चों पर खर्च करने के लिए मातापिता के पास अब पैसा ज्यादा है तो उस की लूट मच गई है. बजाय कोई सही रास्ता सुझाने के सुप्रीम कोर्ट ने समस्या को अधर में छोड़ दिया है और अब सरकार उस पर कोई फैसला भी नहीं कर सकती. 

देश को चिकित्सा कालेजों की बहुत जरूरत है और गांवगांव में चिकित्सा उपलब्ध हो सके, इस के लिए हर तरह के चिकित्सक चाहिए ही. इस मामले में ज्यादा ढीलढाल आगे चल कर महंगी साबित होगी.

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