Land Allotment Dispute : 1950 से 1960 तक जमींदारी उन्मूलन के काल में विनोबा भावे ने एक गांधीवादी आंदोलन चलाया था, भूदान, उस में उन्होंने जमींदारों से कहा था कि जहां भी जमींदारी हटाने के कानूनों के बावजूद जमीदारों के पास बहुत जमीन बच गई है जिस पर और कोई खेती कर रहा है, उस ज़मीन को वे खेती करने वाले किसानों को दान कर दें.
बहुतों ने ऐसा किया भी. उस समय विनोबा भावे का नारा था ‘सब भूमि गोपाल की’ यानी सारी जमीन तो भगवान की है, कोई जमींदार कैसे हक जमा सकता है. विनोबा भावे को और भूदान आंदोलन को आज कोई याद नहीं करता क्योंकि अब सारी जमीन लैंड एक्वीजन एक्ट के अंतर्गत सरकारों के हाथों में आ गई है और सरकारें उन्हें अपनी मरजी से पुराने राजाओं की तरह अपने चाटुकारों को दे रही हैं.
भाजपा सरकार ने जमीन के बड़ेबड़े टुकड़े मंदिरों और आश्रमों को देने शुरू कर दिए हैं क्योंकि मन में बैठा है कि जमीन या तो भगवान की है या सरकार की या किसी निजी व्यक्ति की. असल में किसी भी जमीन का टुकड़ा या तो किसी व्यक्ति या कंपनी का है या फिर आम जनता की साझी धरोहर है. साझी धरोहर की अवधारणा को अमेरिका की एक अदालत ने 1892 में कानूनी जामा पहनाया था. उस के अनुसार, जब कोई भी प्राकृतिक संसाधन आम जनता के साझे उपयोग में आ रहा हो और वह किसी की निजी संपत्ति न हो तो सरकार किसी को निजी उपयोग के लिए नहीं दे सकती.
इस निर्णय के बाद अमेरिका की सारी अदालतों ने यह मानना शुरू कर दिया और भारत तक यह अवधारणा पहुंच गई है. 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून, जिसे कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बड़ी मुश्किल से आखिरी सालों में पास कराया था, इस सिद्धांत को काफी हद तक लागू करता है. लेकिन अब सरकारें जनोपयोगी हजारों एकड़ भूमि, एयरवेज, एयरस्पेस, नदियों के तट, समुद्री तट, विकास के नाम पर निजी उद्योगपतियों को दे रही हैं या फिर मंदिरों को.
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