Global Politics Analysis : अमेरिका के खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब से डेनमार्क के औटोनौमस इलाके ग्रीनलैंड पर कब्जा जमाने की बात शुरू की है तब से यूरोप और अमेरिका का विवाद खुले में आ गया है और इस का फायदा शायद भारत को हो जाए. अमेरिका की ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका में मिलाने की धमकी बेमतलब की है. 3 लाख से ज्यादा वर्ग किलोमीटर में, भारत से लगभग दोगुना, फैला ग्रीनलैंड बर्फ की मोटी परत से ढका है और उस की आबादी महज 57,000 है.

इस पर मिलिट्री के बेस तो बनाए जा सकते हैं पर इस से कोई आर्थिक लाभ होगा, ऐसा नहीं है. सिर्फ इसलिए कि यह नक्शे में बड़ा दिखता है, डोनाल्ड ट्रंप इसे खाने को बच्चों की तरह लपक रहे हैं. यूरोप, जो अमेरिका को 1945 से ही अपना लीडर मानता रहा है, इस बार बुरी तरह खफा हो गया है और कनाडा समेत सभी यूरोपीय देशों ने इस मामले में साफ नाराजगी जाहिर कर दी है. ग्रीनलैंड पर पहले तो डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप के कुछ देशों के अमेरिका जाने वाले सामान पर टैरिफ यानी कस्टम ड्यूटियां लगाने की धमकी दी पर फिर धमकी वापस ले ली.

यूरोप अब अमेरिका की जगह भारत से व्यापार बढ़ा रहा है. चाहे भारत 4 ट्रिलियन डौलर की अर्थव्यवस्था हो, जो छोटे से जरमनी और फ्रांस के आसपास है, अमेरिका की कमी पूरी नहीं कर सकता. यूरोप 600 अरब डौलर से ज्यादा का सामान अमेरिका को भेजता है जबकि भारत का कुल आयात 700 अरब डौलर का है लेकिन इस में से पैट्रोल पदार्थ 225 अरब डौलर के हैं जो यूरोप सप्लाई नहीं कर सकता. यूरोप उस सस्ते माल को भी भारत को नहीं बेच सकता जो चीन से आता है जो लगभग 100 अरब डौलर का है.

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