Satirical Story In Hindi :
सरिता, 20 साल पहले, मार्च (द्वितीय) 1985
अचानक सुधींद्रजी ने देखा कि 5 लड़कों का दल एकसाथ उठ कर बाहर जा रहा है. सब मुट्ठी बांध कर बीच की उंगली दिखा रहे हैं. सुधींद्रजी ने कड़कदार आवाज में जो बाहर आतेआते घिघियाने लगी थी.
सुधींद्रजी दौड़े जा रहे थे और पीछे लड़कों की भीड़ ‘सुधींद्र मुरदाबाद’, ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे लगाती उन्हें खदेड़ रही थी, जैसे हांका हो रहा हो और शिकार को मचान पर बैठे शिकारी की ओर ले जाया जा रहा हो.
हांफते हुए सुधींद्रजी ने प्राचार्य के कमरे में शरण लेनी चाही, पर वहां सिर्फ रामू चपरासी बैठा था. तब वह प्राध्यापक कक्ष की तरफ भागे. वहां भी सन्नाटा पा कर वह शौचालय के चोर दरवाजे से कालिज के बाहर निकल जल्दी से रिकशा पकड़ कर घर को रवाना हो गए.
उन की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और वह पसीने में ऐसे डूब गए थे जैसे किसी ने नहा कर बिना बदन पोंछे कपड़े पहन लिए हों. उन की घिग्घी बंध गई थी और वह रोंआसे थे. पर रो इसलिए नहीं पा रहे थे क्योंकि आराम से रोने के लिए समय चाहिए और वक्त का उन के पास कतई अभाव था.
अभी भी उन की आंखों के सामने परीक्षा भवन का वही दृश्य रहरह कर घूम रहा था, जहां बी.ए. की परीक्षा में मुख्य निरीक्षक के रूप में उन की डयूटी लगी थी. उन की सहायता के लिए 4 अन्य प्राध्यापक भी नियुक्त थे.
उन्होंने प्राचार्यजी से पहले ही विनती की थी कि इस काम के लिए कालिज की खेलकूद परिषद के अध्यक्ष और भूतपूर्व पहलवान जनार्दनसिंह अधिक उपयुक्त होंगे, पर उन की एक न सुनी गई. प्राचार्य महोदय ने परीक्षा के महत्त्व और सुधींद्रजी की वरीयता का हवाला दिया और वह, कालिज के अंगरेजी विभाग के अध्यक्ष, ‘चढ़ जा बेटा सूली पर...’ के अंदाज से उस गुरुतर दायित्व को निभाने चल पड़े.
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