देशभर में किसानों की जमीनों को बेरहमी से छीन कर उद्योगपतियों, निजी कालेजों और रिहायशी कालोनियां बनाने वालों को बिना डरे और बिना कानून का पालन किए दिया जा रहा है. राज्य सरकारों के पास किसानों से जमीन छीन कर बेचना राजनीतिक सत्ता का एक मुख्य आकर्षण है और नौकरशाही इस में बढ़चढ़ कर भाग लेती है. अगर दूध पहुंच वाले व्यापारियों को मिलता है तो मलाई अफसरशाही को और जो खुरचन नेताओं को मिलती है वही उन के लिए बहुत होती है.

गनीमत है अब अदालतों ने अपना रुख बदला है और वे ज्यादा मुआवजा दिलाने में लग गई हैं, चाहे अधिग्रहण को पूरी तरह निरस्त न कर रही हों. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के निकट नोएडा ऐक्सटैंशन में कई साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार के आपात अधिग्रहण पर सुनवाई करने के दौरान किसानों को बेदखल करने से इनकार कर दिया है. मजेदार बात यह है कि बहुत से बिल्डर जमीन मिलने से पहले ही वहां हवा में बिल्डिंग बना कर फ्लैट बेच चुके थे और कम से कम 50 हजार लोगों से पैसा जमा करा चुके थे. अब बिल्डरों का पैसा तो फंस ही गया है, भोलेभाले नागरिकों की भी जमापूंजी फंस गई.

अभी 20 साल पहले तक गांवों की खेती की जमीनों की कीमतें बहुत कम थीं. खेती से तो आज भी आमदनी बहुत कम है. जो किसान केवल खेती के लिए भी जमीन खरीदते हैं वे जानते हैं कि लगी पूंजी पर मुनाफा कमाना तो दूर ब्याज भरने लायक भी उपज न होगी. उन का आकर्षण केवल यह होता है कि तेजी से कृषि भूमि के जो दाम बढ़ रहे हैं, उस की वजह से जब वे जमीन बेचेंगे तब अगलापिछला सब चुकता कर देंगे.

देश के ऐसे कानून को जिस के तहत किसी की जमीन को निजी काम के लिए सरकार द्वारा छीन लेना, जनता के जीने का हक छीनने वाला कानून कहा जाएगा. इस का मतलब है कि देश में न्याय नहीं, सरकारी धौंस और तानाशाही चलती है और 60 साल का वोट डालने का हक केवल उंगली पर लगे निशान के बराबर का है. असली हक तो इन नौकरशाहों और उन की उंगलियों पर नाचते चुने हुए नेताओं का है जो जनता के हक को दबाने को असली सरकारी शक्ति मानते हैं. यह अच्छा है कि अब सरकारें चेत रही हैं. अदालतें किसानों के हक में खड़ी हो रही हैं और अफसरों, व्यापारियों व नेताओं के गठजोड़ पर थोड़ा अंकुश लग रहा है. पर यह कितने दिन चलेगा?

 

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