EU India Trade : अमेरिका से ठुकराए जाने पर यूरोपीय यूनियन को अचानक भारत का बाजार याद आने लगा है. डोनाल्ड ट्रंप ने एकएक कर के यूरोप के सब नेताओं को नाराज ही नहीं कर दिया, उन का व्यक्तिगत मखौल उड़ा कर बातचीत तक के रास्ते बंद भी कर दिए हैं. यूरोप और कनाडा अब भारत की मार्केट को ढूंढ रहे हैं कि क्या 145 करोड़ की जनता अमेरिका की 30 करोड़ की जनता के बराबर की खरीदारी कर पाएगी?

भारत चाहे तीसरी या चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का ढोल पीटता रहे, यूरोप के देश अच्छी तरह समझते हैं कि उन के सम्मलित 20 ट्रिलियन डौलर की खपत के लिए 4 ट्रिलियन डौलर की अर्थव्यवस्था बेकार है. भारत अमेरिका से भी कुछ ज्यादा नहीं खरीद सकता था और यूरोप से भी नहीं खरीद सकता क्योंकि देशों के सामान महंगे हैं चाहे बढिय़ा क्यों न हों. जहां भारत में प्रतिव्यक्ति आय 2,500 से 2,600 डौलर है वहीं यूरोप के देशों की प्रतिव्यक्ति आय 3,000 से 1,00,000 डौलर तक है.

भारत का आकार बड़ा है और सरकार के पास कर का मोटा पैसा जमा हो जाता है. यहां के 200 के करीब धन्ना सेठ विलासिता की चीजें भी खरीद रहे हैं और इंडस्ट्रियल सामान भी क्योंकि 145 करोड़ जनता को कपड़ा, मशीनें, घरेलू उपयोग की चीजें तो चाहिए ही, पर भारत की खरीदारी की क्षमता बेहद सीमित ही है, यह अमेरिका भी जानता है और यूरोप भी.

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को अपने दूसरी टर्म में भाव देना बंद कर दिया था क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि यहां पोला ढोल ज्यादा है, ठोस कम. भारत चंद हवाई जहाज, कुछ युद्धपोत, बंदूकें, तोपें खरीद ले पर उतना तो पिछड़ा पाकिस्तान भी खरीद लेता है. फिर भी अमेरिका से पल्ला झाडऩे के बाद यूरोप केवल जनसंख्या का समर्थन पाने के लिए अब भारत की ओर रुख कर रहा है.

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