देश में हो रहे आम चुनावों के लिए किए गए पार्टियों के गठबंधनों, ट्विटर व फेसबुक पर पोस्टों, और उन पर कमैंटों से जो तसवीर निकल रही है उस से यह साफ हो रहा है कि कांग्रेस के अलावा तकरीबन सभी पार्टियों में जम कर पौराणिक स्मृतिप्रद जाति, धर्म, भेद का जहर फैला हुआ है. विशुद्ध ब्राह्मण व उन के भक्त, जिन में कुछ वैश्य, कायस्थ और अमीर किसान या सरकारी नौकरी वाले शामिल हैं, दूसरी पार्टियां छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में जा रहे हैं. वे अपने गुरुओं के आदेशों पर अमल कर रहे हैं.

समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी अपनीअपनी जातियों की पार्टियां हैं. वे न तो देश, न आर्थिक नीतियों की सोच रही हैं, उन्हें जातियों पर वर्चस्व बनाए रखना ज्यादा जरूरी लग रहा है. यही लालू प्रसाद यादव की पार्टी का हाल है. पश्चिम बंगाल व ओडिशा में ऊंची जातियों के नेता भाजपा के खिलाफ हैं इसलिए कि वहां गरीबी के कारण उत्पन्न हुए रोष के आगे पौराणिक व्यवस्था ढीली हो गई. ममता बनर्जी और नवीन पटनायक बाकायदा पूजापाठी हैं पर वे उस का झंडा नहीं उठा रहे. दोनों ने अपनेअपने राज्य पर एकाधिकार का लाभ जातिगत भेदभाव को भुनाने में नहीं उठाया.

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भाजपा इन दोनों राज्यों में ब्राह्मणों और भक्त वैश्यों के बल पर कुछ दम दिखाने की कोशिश में लगी है. कांग्रेस 1947 से या यों कहिए 1895 से ही ऊंची जातियों की पार्टी रही है. लेकिन उस ने नीची जातियों को कभी दुत्कारा नहीं. हां, ऐसा भी कुछ नहीं किया कि जातिभेद समाप्त हो जाए. भाजपा और कांग्रेस में फर्क यह है कि भाजपा जातिभेद को भड़का कर लाभ उठाना चाहती है जबकि कांग्रेस इस पर वालपेपर चढ़ा कर. शिक्षा, तार्किक विचारों, स्वतंत्रताओं के नारों के 150 वर्षों बाद आज भी भारत पूरा का पूरा जातीय दलदल में फंसा है.

2019 का यह चुनाव इस दलदल को और बदबूदार बना रहा है. 2014 में नरेंद्र मोदी ने विकास, भ्रष्टाचारमुक्त, रोजगार, देशरक्षा के नारे लगाए थे जिस से पिछड़ी, निचली जातियों को लगा था कि बीमार कांग्रेस के मुकाबले सक्रिय भाजपा जातीय कहर से कहीं ज्यादा मुक्ति दिलाएगी, लेकिन हुआ उलटा.

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भाजपा के गलीगली के नुमाइंदे आज पौराणिक नियमों के चौकीदार बन बैठे हैं. वे हाथ में लट्ठ रख रहे हैं पौराणिकद्रोह के खिलाफ. ‘मैं भी चौकीदार’ की आवाज कट्टरपंथी सोच की सुरक्षा की आवाज है. किसी भी देश का विकास तब तक संभव नहीं जब तक उस का हर यूनिट एकमन से अपने विकास के लिए काम न करे. दूसरे का विध्वंस कुछ न देगा. आपस में वैरभाव शक्ति और पैसा दोनों खर्च तो कराता ही है, यह नई सोच पर लोहे की दीवार जैसी चौकीदारी भी खड़ी करता है. यहां दीवारें और उन पर खड़े चौकीदार सीमा पर नहीं, गलीगली, महल्लेमहल्ले, गांवगांव में हैं.

भूल जाइए कि देश में कोई सामाजिक या आर्थिक क्रांति होने वाली है, चुनावों में चाहे कोई जीते. मोदीजेटली की चौकीदारी बैंकों के बारे में जो भी आंकड़े दिए जाते हैं वे इतने उलझे व अगरमगर वाले होते हैं कि उन्हें समझना कठिन होता है, पर फिर भी जो बात मोटीमोटी समझ आ रही है उस के हिसाब से वर्ष 2017-18 में भारतीय बैंकों के, रिजर्व बैंक औफ इंडिया के मुताबिक, 41,167 करोड़ रुपए धोखेबाज खा गए.

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चौकीदारों में मोदीजेटली मौजूद हैं पर 2016-17 के मुकाबले 2017-18 में धोखेबाजों ने बैंकों को 72 प्रतिशत ज्यादा चूना लगा डाला. चौकीदार रातदिन कहते रहते हैं कि एक कालाबाजारी न बचेगा, एक रिश्वतखोर न बचेगा, एक करचोर न बचेगा. पर देश का धन इस तरह रातदिन बरबाद हो रहा है, यह निहायत ही शर्म की बात है. बैंकों की मारफत ही स?ारा लेनदेन हो, इस के लिए मोदीजेटली उपाय ढूंढ़ते रहते हैं जिन्हें वे आमजन पर जबरन थोप सकें. लेकिन बैंकों में जमा पैसे धोखेबाज भी निकाल ले जा रहे हैं और वे भी जो दिए गए कर्ज को चुका नहीं पा रहे. बैंकों के 10,39,700 करोड़ रुपए के कर्ज शक के दायरे में हैं. वे शायद लौटाए नहीं जाएंगे.

किसानों के कर्ज माफ करने पर हल्ला मचाने वाले मोदीजेटली उन 10 लाख करोड़ रुपयों के कर्ज के बारे में बहुत कम ही कुछ कहते हैं क्योंकि 5 वर्षों के अपने शासन में वे तो बैंकों का धंधा बढ़ाने में ही लगे रहे थे. नोटबंदी और जीएसटी से उन्होंने बैंकों को खूब धंधा दिया. बैंकों ने इसे भगवान का छप्पर फाड़ कर दिया समझा और उसे ऐसे ही लुटाया जैसे योगी आदित्यनाथ अनावश्यक कुंभ पर, शिवराज सिंह चौहान नर्मदा यात्रा पर और नरेंद्र मोदी पटेल की मूर्ति पर खर्च करने में सीना फुलाते हैं.

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बैंकों का पैसा जनता की धरोहर है, पर अब बैंक इसे जनता से मिला टैक्स मानने लगे हैं और बैंकों के अफसर महापंडों की तरह उसे उन्हें दे डालते हैं जिन्हें वे खुश करना चाहते हैं. मोदीजेटली के युग में भारतीय रिजर्व बैंक से ले कर छोटे से छोटा बैंक सरकारी इशारे पर चल रहा है और अपने खर्च पूरा करने के लिए जजमानों को तरहतरह के दामों की फेहरिस्त पकड़ा रहा है. बैंकों ने हर अकाउंट में से कुछ पैसे बिना पूछे निकालने के कंप्यूटरों से प्रोग्राम बना डाले हैं और शिकायत करने वाले को सिबिल के ग्रहचक्कर में डाल कर धर्मभ्रष्ट होने का विधान बना डाला है.

बैंकों के साथ यह खिलवाड़ देश के व्यापार में बढ़ती मंदी का परिणाम है. देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े ऊंचाइयां छू रहे हैं. इन आंकड़ों से खुश न हों क्योंकि भारत ही दुनिया का सब से ज्यादा तेजी से जनसंख्या बढ़ाने वाला देश भी है. ज्यादा लोग काम करेंगे, चाहे कितना खराब करें, कुल मिला कर तो उत्पादन बढ़ेगा. देखना तो यह है कि प्रतिव्यक्ति आय कितनी सुधर रही है. इस में भारत पड़ोसी चीन से 5 गुना कम है और अमेरिका से 30 गुना कम. जो नेता बैंकों को नहीं संभाल पा रहे, उन्हें आंकड़ेबाजी पर हल्ला करने का हक नहीं है, न ही कैशलैस का मंत्र पढ़ने का हुक्म देने का है.

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