आप ने किसी से उधार ले रखा हो और चुका न पाने पर देने वाला यदि जलील कर जाए तो क्या इसे आत्महत्या के लिए उकसाना कहेंगे? कम से कम तमिलनाडु के एक मजिस्ट्रेट और वहां के उच्च न्यायालय का तो यही खयाल है. तमिलनाडु के अर्जुनन ने राजगोपाल को 2001 में क्व80 हजार उधार दिए थे. सालभर बाद जब उस ने क्व80 हजार मूल और क्व5 हजार ब्याज मांगा तो राजगोपाल ने आत्महत्या कर ली और लिख गया कि आत्महत्या कर्ज देने वाले के तकाजों के कारण कर रहा हूं.

सैक्स संबंधों में उदासीनता क्यों

समझ नहीं आता कि इस देश की अदालतें कैसी हैं कि इस मामले में पैसे देने वाले को ही गुनहगार मान सकती हैं. छोटी अदालत और बड़ी अदालत दोनों ने अर्जुनन को कैद की सजा सुना डाली. भारतीय दंड विधि की धारा 306 के अंतर्गत आत्महत्या के लिए उकसाना अपराध है पर अपना पैसा वापस मांगना कैसे आत्महत्या के लिए उकसाना हो गया?

अगर कमजोर दिल का कोई व्यक्ति अपनी गलती पर कहे बुरेभले पर आत्महत्या कर लें तो इसे उकसाना कहना तो कानून का माखौल उड़ाना है. कानून तो यह चाहता है कि कोई इस तरह का माहौल न बना दे कि आदमी को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़े.

खतरे में है व्यक्तिगत स्वतंत्रता

घरों में इस तरह की बातें बहुत होती हैं. पति या सास की डांट, पिता की फटकार, बहन के रूठने, प्रेमिका के न करने पर अकसर लड़कियांलड़के आत्महत्या कर लेते हैं पर यह आत्महत्या के लिए मजबूर करना नहीं कहा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने अर्जुनन को राहत दी पर 15 साल बाद. क्व80 हजार देने पर अर्जुनन को लाखों रुपए वकीलों को देने पड़े होंगे. उस पर हर समय तलवार लटकती रही होगी. हो सकता है कुछ दिन जेल में भी रहा हो.

सावधान, आप बेचे जा रहे हैं

कानून व्यावहारिक होने चाहिए, अदालतों को उन्हें ढंग से लागू करना चाहिए. मनमानी बातें नहीं होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट को तो पुलिस, मजिस्ट्रेट और हाई कोर्ट सब को फटकारना चाहिए था कि आखिर क्यों ऐसा फैसला दिया कि एक बेगुनाह न्याय के लिए भटकता रहा?

Tags:
COMMENT