भारत भूमि युगे युगे

लगातार नौवीं बार...

November 22, 2014

लगातार नौवीं बार

अक्तूबर के पहले हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा, फिर उन का झाड़ू पुराण और उस के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा के विधानसभा चुनावों में उन की गर्जना के बीच मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए. यह खबर बौक्स आइटम बन कर रह गई. क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय अधिवेशन बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं जिन का दायरा भले ही एक प्रदेश हो लेकिन बातें अंतरिक्ष तक की होती हैं. बहरहाल, मुलायम आंखें मिचमिचाए चेहरे पर ओज व तेज लिए 9वीं बार सपा के  राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए तो हमेशा की तरह कोई विरोध नहीं हुआ और किसी चिडि़या ने चूं तक नहीं की. इस लोकतांत्रिक खूबी पर कौन कुरबान न जाए जिस में एक पंक्ति का प्रस्ताव कोई अदना या दूसरी पंक्ति का नेता पढ़ता है और उस का कोई भाई अनुमोदन कर फख्र महसूस करता है और आखिर में अधिवेशन रात्रि भोज में सिमट कर रह जाता है.

ऐसी दीवानगी

दक्षिण भारत के लोग बड़े जज्बाती होते हैं, बातबात पर खुदकुशी करने पर उतारू हो आते हैं. तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता को पैसों की हेराफेरी के इल्जाम में अदालत ने जेल की सजा क्या सुनाई लोगों ने खुदकुशी करना शुरू कर दिया.

इस दीवानगी से लोगों का ध्यान आरोप से हट कर इस बेवकूफी पर आ कर टिक गया कि यह तो हद हो गई. और इसे लोकप्रियता एक दफा मान भी लिया जाए पर बेगुनाही का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए. लोगों को इस तरह किसी नेता के समर्थन में आत्महत्या नहीं करनी चाहिए. एक फर्क दिशाओं का भी है. उत्तर भारत की तरफ के लोग बड़ेबड़े घोटालेबाजों के जेल जाने पर जश्न मनाते हैं कि देखो, अपना नेता वाकई सच्चा नेता निकला, चलो इसी खुशी में किसी चौराहे पर मिठाई बांटते हैं. दक्षिण वालों को इन से सीखना चाहिए कि भावुकता और कैसे व्यक्त की जा सकती है.

राष्ट्रीय दामाद

अभी भी देहातों में एक घर का दामाद पूरे गांव का दामाद होता है. उस की सभी इज्जत करते हैं महज इसलिए कि वह गांव की बेटी को खुश रखे. सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा की परेशानी यह है कि अब उन के दामादपने पर सरेआम कीचड़ खासतौर से चुनाव के दिनों में उछाला जाता है और पब्लिक तालियां पीट कर सार्वजनिक अपमान में योगदान देती है.

जाने क्यों इसे संस्कृति का पतन कोई नहीं कहता, थोड़ीबहुत जमीन वह भी कथित रूप से कौडि़यों के दाम में हथिया लेना इतना बड़ा गुनाह भी नहीं है कि उसे बारबार चुनावी मुद्दा बनाया जाए लेकिन नरेंद्र मोदी ने चुनाव में इसे तुरुप के पत्ते की तरह खेला तो बचेखुचे कांग्रेसी सिपहसालारों के उतरे चेहरे जता गए कि दामादपुराण के समापन तक कांग्रेस का कुछ नहीं होने वाला.

झाड़ू का शौक

पेशेवर सफाई कर्मचारी, जो पुराने जमाने में जातिगत संबोधनों से ही पुकारा जाता था, आज भी रोज सुबह कमर चटकाने के बाद झाड़ू हाथ में ले कर अपने पुश्तैनी काम में जुट जाता है. झाड़ू लगाना उस के लिए रोजीरोटी की बात होती है, इसलिए सफाई की क्वालिटी पर सभी नाकभौं सिकोड़ते रहते हैं.

दूसरा गांधी बनने का ख्वाब देख रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चरखे के बजाय झाड़ू उठाई तो देखते ही देखते यह शौक बीमारी में बदल गया. भारतरत्न सचिन तेंदुलकर, तमाम नामी फिल्मी कलाकारों और अनिल अंबानी जैसे उद्योगपतियों ने भी झाड़ू लगाई. ऐसे में कहा जा सकता है कि झाड़ू लगाना योग की तरह एक अच्छा व्यायाम है. इस से बुढ़ापे में कमर संबंधी बीमारियां कम होती हैं, घुटनेजोड़ों के दर्द में राहत मिलती है. इसलिए उठाओ झाड़ू और चल पड़ो अपने शहर के किसी चर्चगेट की तरफ. इस के बाद तो यह काम फिर एक वर्ग विशेष के लोगों को ही करना है.

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हिट विकेट हुए आडवाणी

हरियाणा के सूरजकुंड में नवनिर्वाचित भाजपा सांसदों की हालिया आयोजित कार्यशाला का समापन करते लालकृष्ण आडवाणी राजनीतिक मैदान छोड़ सीधे क्रिकेट की पिच पर आ गए. नरेंद्र मोदी की तारीफ करते वे कह बैठे कि उन्होंने ऐसा कोई खिलाड़ी नहीं देखा जो पहले ही मैच में कप्तान बन बैठा हो और जिस ने तिहरा शतक जमा दिया हो. आजकल हर कोई नरेंद्र मोदी का गुणगान कर रहा है लेकिन आडवाणी की तारीफ माने रखती है जो खुद मोदी के मुकाबले फ्लौप साबित हुए और हिट विकेट हो गए. गनीमत यह है कि टीम में बने हुए हैं. जाहिर है उन की भूमिका विशेषज्ञ कमेंटेटर की होती जा रही है.

दखल नहीं दाखिल

बीते 15 सालों से राम माधव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की तरफ से मीडिया मैनेज करने का चुनौतीपूर्ण काम कर रहे थे जिस के तहत उन्हें पत्रकारों के सामने धैर्य से एक बात घुमाफिरा कर करनी होती थी कि संघ राजनीति नहीं करता, न ही भाजपा के अंदरूनी मामलों में दखल देता है. संघ अब राम माधव को पुरस्कृत करते हुए उन्हें भाजपा में भेज रहा है जिस से वे खुले तौर पर दखल देने का काम कर सकें और यह कह सकें कि संघ दखल नहीं दाखिला देता है. अब कोई क्या खा कर कहेगा कि संघ भाजपा या सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करता. मुमकिन है यह कदम हिंदुत्व से जुड़े विवादित मुद्दों को तकनीकी तौर पर उठाने की तैयारी का हिस्सा हो.

यशवंत की गाली

गाली भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है, इसे सभ्य और अभिजात्य लोग इस्तेमाल नहीं करते. इस आम धारणा को वरिष्ठ भाजपाई नेता यशवंत सिन्हा ने रांची के एक कार्यक्रम में छिन्नभिन्न कर दिया. हुआ यों कि कौन बनेगा झारखंड का मुख्यमंत्री के सवाल पर यशवंत भड़क कर बोले कि कोई भी ऐरागैरा बन सकता है, वे तो यहां कुछ भी नहीं हैं. गाली बकना बुरी बात है लेकिन बक दी तो कोई संगीन गुनाह भी इसे नहीं माना जाता. हां, उन के दिल की भड़ास जरूर निकल गई. अब इस गाली पर ध्यान भाजपा आलाकमान को देना है जो यशवंत की गाली से कन्नी काट रहे हैं.

बचपन में बिकिनी

युवतियां क्या पहनें और कितना पहनें इस की चिंता और तनाव धर्माचार्यों को ही रहता था पर अब नेताओं ने भी फतवे जारी करने शुरू कर दिए हैं. गोआ के वरिष्ठ मंत्री सुदीन धावलीकर ने पणजी में श्रीराम सेना के एक कार्यक्रम में नसीहत दे ही डाली कि नौजवान लड़कियां शौर्ट ड्रैस में पब में न जाएं.

गोआ कल्चर की दुहाई भी सुदीन ने दी. बवाल ज्यादा मचता इस के पहले ही मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर ने मनोहारी यह बयान दे डाला कि मैं तो बचपन से ही बिकिनी देख रहा हूं. दरअसल, पोशाक पर विवाद नई बात नहीं है, इस की आड़ में मंशा हिंदुत्व थोपने की रहती है. युवतियों की आजादी छीनने से बेहतर होगा कि गोआ सरकार घूंघट अनिवार्य कर दे. रही बात बचपन में बिकिनी देखने की तो आजकल के बच्चों के लिए यह कतई जिज्ञासा की बात नहीं.

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केजरीवाल, गांधीजी की तरह बातबात में जेल जाने की लत भी पाल बैठे हैं.

चिंतन का अड्डा जेल

महात्मा गांधी की लोकप्रियता में उन की कानून तोड़ने की आदत बड़ी अहम थी जिसे अरविंद केजरीवाल ने भी अपना लिया है. उन का कहना है कि वे एक नेक काम, भ्रष्टाचार खत्म करने का, कर रहे हैं फिर किसी भी कथित मानहानि पर वे बौंड क्यों भरें.

केजरीवाल, गांधीजी की तरह बातबात में जेल जाने की लत भी पाल बैठे हैं. उन के जेल जाने पर किसी को दुख नहीं होता, उलटे उन की आम आदमी पार्टी के लोग उकसाते हैं कि जाओ, अंदर चिंतन करो, यहां हम हल्ला मचा कर आप को गांधी की तरह हिट कर देंगे. आज देश में लोकतंत्र है और अरविंद की दलीलों को लोकसभा चुनाव में ‘आप’ को मिली हार की खिसियाहट माना जा रहा है. उम्मीद है, अब वे पक्के नेता बन जाएंगे.

प्रियंका आओ, कांग्रेस बचाओ

कुछ तो पहले से ही शोर मचा रहे थे पर अब कई कांग्रेसी चिल्लाने लगे हैं कि ‘प्रियंका आओ, कांगे्रस बचाओ’. ये लोग दरअसल कह यह रहे हैं कि ‘सोनियाराहुल हटाओ, कांग्रेस बचाओ’.

चिकित्सकीय भाषा में कहें तो कांग्रेस वैंटिलेटर पर है. अब कोई करिश्मा ही उसे बचा सकता है. उसे दवा की नहीं दुआ की जरूरत है. नेहरूगांधी परिवार के भक्तों की नजर में यह पूरा खानदान ही शंकर, पार्वती, गणेश जैसा है, इन में से कोई तो चलेगा. प्रियंका को उकसा रहे कांग्रेसी दरअसल खुद निकम्मेपन की चादर दोबारा ओढ़ कर सोना चाहते हैं, उन्हें चमत्कारों की आदत जो पड़ गई है.

बेदम सियासी दांव

महज 3 सांसद वे भी अपने कुनबे के समेटे सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक अजीब बात कही कि अगर नरेंद्र मोदी चीन से देश की जमीन छीन लाएं तो मैं उन का साथ देने को तैयार हूं. बात अजीब इसलिए है कि उत्तर प्रदेश और चीन का कोई संबंध नहीं है. दूसरे, एनडीए या नरेंद्र मोदी को मुलायम व उन की समाजवादी पार्टी का साथ चाहिए, यह बात न किसी ने कही, न इस की कोई कीमत है.

कल के पहलवान मुलायम सिंह कुश्ती के साथसाथ सियासत के दांव भी भूल गए हैं कि कमजोरी की स्थिति में चुप रह कर अपनी ताकत बढ़ाना बेहतर रहता है. ऐसे बयानों से जनता उन की दयनीय हालत पर हंसती ही है.

हारे को हरिनाम

बाड़मेर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े तो इस मंशा से थे कि जीत कर भाजपा को उस की हैसियत बता देंगे पर हुआ उलटा, जसवंत सिंह को खुद अपनी हैसियत पता चल गई. अब वापसी के लिए वे भाजपा की परिक्रमा में जुट गए हैं.

लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह को लोग राजनीति के ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहने लगे थे जिन में से पहले 2 तो समझदारी दिखाते बच गए थे लेकिन संहार करने चले तीसरे खुद संहार  के शिकार हो गए हैं.

जसवंत सिंह से भी हर किसी को सहानुभूति है पर इन्हीं लोगों का यह कहनासोचना भी है कि अब आराम करो और नए नेताओं को राजकाज संभालने दो क्योंकि दिलाया भी तो इन्हीं ने है.

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