दलित दारू पीता है और श्रेष्ठिवर्ग सुरापान करता है. दलित देसी ठेके पर नशे में मस्त हो कर चखना चबाते नेताओं को गाली बकता है. ऊंची जाति वाला भुने काजू के साथ वाइन के सिप करते गंभीर हो जाता है और उस के मुंह से अंगरेजी में मार्क्स, अरस्तु और पिकासो का दर्शन झड़ने लगता है. सार यह कि शराब हर कोई पीता है पर उस में भी धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भेदभाव साफसाफ दिखता है.

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