Hindi Film Story: साहित्य ही नहीं बल्कि फिल्में भी समाज का आईना हमेशा से रही हैं जो बताती रहीं हैं कि समाज किस दिशा और दशा में है. फिल्मों का अहम किरदार खलनायक यह तय करता है कि कहानी आगे कैसे बढ़ेगी. 60 के दशक के बाद समाज तेजी से बदला, तो खलनायक उस से भी ज्यादा तेजी से बदला. उस की पहचान, हुलिया और खलनायिकी का स्टाइल भी बदला लेकिन वह लगातार अमीर होता गया.

साल 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘जंजीर’ कैसे अमिताभ बच्चन के स्टारडम की पहली सीढ़ी साबित हुई, यह हर कोई जानता है. इस फिल्म की एक बड़ी खूबी प्राण का शेरखान के कैरेक्टर रोल में होना था जो अब तक अपनी खलनायिकी के लिए पहचाने जाते थे. तब प्राण का औरा कुछ ऐसा था कि वे विलेन का करें या कैरेक्टर रोल करें, फीस उन की हीरो से भी ज्यादा होती थी. ‘जंजीर’ फिल्म में विलेन का रोल अजीत ने निभाया था जिन का असली नाम हामिद खान था. इस फिल्म में उन का नाम सेठ धरम दयाल तेजा था.

तेजा सेठ कोई ऐसावैसा विलेन नहीं था जिस के मुंह में पान की पीक भरी हो और जिस के एक हाथ में अधजली बीड़ी या सिगरेट हो और दूसरे हाथ में कोई छुरा या चाकू हो. न ही वह लुंगी और धारीदार बनियान वाला छपरी टाइप का विलेन था बल्कि तेजा वाकई में सेठ था जो पूरी फिल्म में महंगा सफेद या औफ व्हाइट सूट और पैरों में चमकते बूट पहनता था. तेजा के हाथ में महंगी शराब से भरा गिलास और उंगलियों में महंगी सिगरेट थी. आंखों पर रंगीन चश्मा उस के बड़ा आदमी होने की चुगली करता हुआ था. उस के सफेद बाल बेहद करीने से पीछे की तरफ सैट किए हुए थे.

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