Student Protest: सत्ता चाहे अंग्रेजों की रही हो, कांग्रेस की या आज बीजेपी की, आंदोलन में पुलिस की भूमिका बेहद क्रूर, हिंसक और आतंकी किस्म की नजर आती है. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग होता है और कई बार गालियाँ, गोलियाँ भी देखने को मिलती है. सवाल यह है कि क्या पुलिस को जनता के साथ बर्बरता करने की ट्रेनिंग दी जाती है या कमजोर पर जुल्म करना भारत की सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न अंग रहा है?
कर्तव्य और अधिकार सिर्फ जनता के लिए नहीं पुलिस के लिए भी होते हैं. भीड़ को कंट्रोल करना, ख़राब स्थिति में भी आम नागरिकों की ढाल बनना और अराजक तत्वों की पहचान कर उन्हें क़ानून के रास्ते कंट्रोल करना यही पुलिस के अधिकार में आते हैं. किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस का कर्तव्य नागरिकों की सुविधा, सुरक्षा और व्यवस्था बनाये रखना ही होता है लेकिन जब सत्ता, जनता को नागरिक नहीं बल्कि भेड़ो की भीड़ समझने लगती है तब पुलिस सत्ता के लिए आज्ञाकारी सिपाही की भूमिका निभाने लगती है और सत्ता के डंडे से इसी भेड़ों की भीड़ को हाँकने लगती है. यह सच है की राजनीतिक दबाव और जनता के प्रति जवाबदेही की कमी के कारण पुलिस जनता के साथ दमन और हिंसा का रास्ता अपनाती है लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है की भारत की पुलिस जातिवादी संस्कृति के कारण स्वाभाविक रूप से उदंड ही है.
आज CJP आंदोलन के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज का नजारा कोई नई घटना नहीं है. आजादी से पहले अंग्रेजी शासन में भी आंदोलनों को डंडे से दबाया गया था. आजादी के बाद भी अलग-अलग सरकारों के समय आंदोलनों में पुलिस बल का इस्तेमाल ऐसे ही हुआ. अंग्रेजों के समय पुलिस में कौन लोग थे? लाला लाजपत राय पर डंडा बरसाने वाली पुलिस में गोरे सिपाही कितने थे? अंग्रेजों के समय के हर आंदोलन को कुचलने वाले पुलिसिया लोग यहीं के थे. वर्दी और डंडा मिलते ही जातिवादी मानसिकता को ताकत मिल जाती है और पुलिस की वर्दी में खड़े व्यक्ति को जनता नीच, अश्प्रिश्य और गंदे लोगों की भीड़ नजर आने लगती है. बस अंदर छुपी जातिवादी बर्बरता कुलांचे मारने लगती है.
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