कौस्टयूम डिजाइनर से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली सोनाक्षी सिन्हा ने फिल्म ‘दबंग’ से अपने अभिनय की शुरुआत की, जिसमें उनके को स्टार सलमान खान थे. फिल्म सफल रही और सोनाक्षी सबकी नजरों में आ गयी. इसके बाद उन्होंने कई फिल्में की, जिसमें कुछ सफल तो कुछ असफल रही. फिल्मों में आने के लिए उन्होंने अपना वजन काफी घटाया, जिसके लिए सलमान ने ही उसे सलाह दी थी. सलमान खान को वे अपना मेंटर मानती हैं.

अभिनय के साथ-साथ सोनाक्षी फैशन और सिंगिंग को भी कायम रखी हैं. आगे वह इस बारे में और अधिक सोचेंगी. अलग कहानियां उन्हें हमेशा से प्रेरित करती है. यही वजह है कि उन्होंने सेक्स और गुप्त रोग पर आधारित फिल्म ‘खानदानी शफाखाना’ में बेबी बेदी की भूमिका निभाई है. पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

प्र. इस फिल्म को करने की खास वजह क्या है? कितना जरूरी है ऐसी फिल्मों का बनना ?

पहले मैं इसे करने को राजी नहीं हुई थी, क्योंकि इसे कैसे पर्दे पर दिखाया जायेगा, उस पर चिंतित थी, लेकिन इसकी कौंसेप्ट मुझे बहुत अच्छी लगी थी. ये एक बेहतर जरिया है जिससे हम एक टैबू को लोगों के सामने मजेदार रूप में दिखा सकते हैं. असल में हमारे समाज और परिवार में सेक्स संबंधी किसी भी बात पर लोग खुलकर बात नहीं करते. माता-पिता भी इस बारें में बात करने से झिझकते हैं. ये जीवन का फैक्ट है, जिसकी वजह से ये दुनिया बनी है. उसके बारें में हम खुलकर बात क्यों नहीं करते? हर बीमारी के बारें में लोग डौक्टर के पास जाते है, लेकिन सेक्स संबंधी बीमारी को लोग क्यों छुपाते हैं? बीमारी तो बीमारी है, इसी को ह्यूमर के साथ बताने की कोशिश की गई है. जिससे लोग देखें और इस बारे में सोचने पर विवश हो. बाकी विषयों की तरह इसे भी स्कूल लेवल से ही शुरू कर देना चाहिए, ताकि बच्चे को सही जानकारी इस विषय पर हो.

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प्र. आपको सेक्स एजुकेशन कब और कैसे मिला?

मुझे भी इस बारें में काफी देर में पता लगा. इस बारें में मेरे माता-पिता ने कभी बात नहीं की, क्योंकि मैं भी वैसे ही पली बढ़ी हुई हूं. मुझे दोस्तों से और बड़े होने पर पता चला.

प्र. इस फिल्म में निर्देशक के सोच को आप कैसे देखती हैं?

ये बहुत अच्छी बात है कि इस फिल्म को डायरेक्ट करने वाली एक महिला शिल्पी दासगुप्ता है, जिन्होंने बहुत ही मजेदार तरीके से इस बात को कहने की कोशिश की है. मुझे भी इसमें काम करने का मौका मिला. ऐसी फिल्म को निर्देश करना आसान नहीं था. इस बारें में उन्होंने सबको सेट पर काम करने की सहजता दी. कभी कोई गलत अनुभव नहीं हुआ.

प्र. आपने कई कौमेडी फिल्में की है, इसे करने में कितना मजा आता है?

कौमेडी करने और देखने में बहुत अच्छा लगता है. किसी को हंसाना आसान नहीं होता. इसमें टाइमिंग का खास ध्यान रखना पड़ता है. इस फिल्म में सारे साथी कलाकार ने बहुत सहयोग दिया है.

प्र. कौमेडी की रिपीट वैल्यू बहुत अधिक होती है, आप इस पर कितना विश्वास करती है?

ये सही बात है, क्योंकि आज के लोग काफी तनाव ग्रस्त होते हैं, ऐसे में कौमेडी उन्हें थोड़ी हंसी और राहत प्रदान करती है.

प्र. किसी फिल्म को चुनते समय किस बात का ध्यान रखती हैं?

मैं हमेशा ऐसी फिल्म करना चाहती हूं, जिसे मैं अपने परिवार के साथ देख पाऊं. इसके अलावा हर फिल्म की एक औडियेन्स होती है. थोड़ा-बहुत हर फिल्म चलती है. मेरे लिए किसी भी चरित्र को करने में मेरा पूरा सहयोग उसके साथ होगी या नहीं, इसे अवश्य परखती हूं.

प्र.फिल्म में आपने एक विरासत को आगे बढ़ाई है, कितना जरुरी होता है, विरासत को आगे ले जाना?

ये हर व्यक्ति की रुचि पर निर्भर करता है कि वे विरासत को आगे ले जाएं या नहीं. विरासत को आगे ले जाने से हमेशा अच्छा ही रहता है. रूचि न होने पर उसे न करें ,क्योंकि रुचि न होने पर आप उसे अच्छा नहीं कर सकते.

प्र. साइबर क्राइम आजकल बहुत होता है, ऐसे में सेक्स एजुकेशन इसे कितना कम कर सकती है?

जागरूकता बढ़ती है, तो जानकारी होती है और अपराध कम होते है, क्योंकि जिज्ञासा ही व्यक्ति को क्राइम की तरफ ले जाती है.

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प्र. फिल्म ‘दबंग’ से यहां तक आपने कितना ग्रो किया है?

मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं एक्टिंग करूंगी, जो भी सीखा है, मैंने सेट पर ही सीखा है. पहली फिल्म से अब तक सीख ही रही हूं. पहली फिल्म से अभी तक मैं अपने आप को पूरी तरह से बदली हुई पाती हूं. यह एक अच्छी जर्नी है और मुझे कोई रिग्रेट नहीं.

प्र. इंडस्ट्री में संघर्ष हमेशा रहता है, इस बात पर आप कितना यकीन रखती है?

ये बहुत सही है, कुछ लोग पहली फिल्म से सफल नहीं होते और अगर कोई होता भी है, तो उसे कामयाब रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. ये हर क्षेत्र में होता है. हर किसी को अपनी जगह बनाये रखने के लिए कड़ी मेहनत,लगन और धीरज रखनी पड़ती है.

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