Ghamasaan Movie Review: बुंदेलखंड के जंगलों की सूखी झाड़ियों से उठती धूल, मीलों तक घनघोर चुप इलाका, देहाती बोली और बंदूकधारी डकैत अगर इन्हें एक फ्रेम में रखना हो, तो निर्देशक तिग्मांशु धुलिया इस के मास्टर हैं. उन की नई फिल्म ‘घमासान’ इसी देहाती दुनिया को दिखाती है जहां कानून और डकैतों की सीमाएं आपस में धुंधली हो चुकी हैं. हालांकि सवाल यह है कि क्या यह फिल्म वाकई कोई बड़ा ‘घमासान’ मचा पाती है, या फिर यह पुरानी घिसीपिटी डाकू फिल्मों की सिर्फ अमूमन कौपी पेस्ट बन कर रह जाती है?

देखा जाए तो सिनेमा का पूरी तरह से शहरीकरण हो चुका है. मल्टीप्लैक्स कल्चर ने देहात, खेतों और बीहड़ की कहानियों को जैसे सिनेमाघर के मेन गेट पर ही रोक दिया है. आज के दौर में जब हर प्रोड्यूसर चमकधमक वाली अर्बन थ्रिलर बनाने की होड़ में है, तब बुंदेलखंड के बीहड़ में उतर कर ऐसी फिल्म बनाना बिजनैस के लिहाज से एक बड़ा रिस्क तो है. इस रिस्क के लिए तिग्मांशु की तारीफ होनी चाहिए, लेकिन तारीफ सिर्फ मंशा की हो सकती है, रिजल्ट की नहीं.

फिल्म की कहानी 2006 के दौर में बुंदेलखंड के कुख्यात डाकू ददुआ से प्रेरित किरदार ‘महाराज’ (अरशद वारसी) के इर्दगिर्द घूमती है. महाराज कोई रौबिन हुड या पान सिंह तोमर जैसा ‘बागी’ नहीं है, बल्कि एक बेरहम अपराधी है. वह पूरे इलाके में दहशत फैलाता है, चुनाव तय करता है और नेताओं व पुलिस अफसरों को अपनी जेब में रखता है. उस का खौफ इतना है कि लोग उस का नाम लेने से भी डरते हैं, यहां तक कि जो जुर्रत करता है, महाराज उस की गरदन धड़ से अलग कर उसी गांव में टांग देता है.

महाराज के इस आतंक को खत्म करने के लिए एसटीएफ अफसर आदित्य सिंह (प्रतीक गांधी) की एंट्री होती है, जिस का काम इलाके में फेयर इलैक्शन कंडक्ट करवाना है, जिस के लिए महाराज के आतंक को खत्म करना है. मगर समस्या यह कि इंटरवल के बाद फिल्म सिर्फ पुलिस और डाकू की पकड़मपकड़ाई की कहानी मात्र बन कर रह जाती है और क्लाइमैक्स आतेआते डाकुओं का एनकाउंटर हो जाता है.

फिल्म में जाति की राजनीति और सत्ता का गठजोड़ दिखाया गया है. तिग्मांशु की फिल्मोग्राफी देखें तो वे यह दिखाने में संकोच नहीं करते कि कैसे नेता वोटबैंक की खातिर गलत लोगों को संरक्षण देते हैं. यहां बुंदेलखंडी देहात में डाकुओं और नेताओं की मिलीभगत दिखाई गई है, जो अपनी ही बिरादरी के लोगों का इस्तेमाल करते हैं. फिल्म में बूथ कैप्चरिंग से ले कर सिस्टम की सड़न को बिना किसी लागलपेट के दिखाया गया है. लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म इन मुद्दों को छू कर आगे निकल जाती है, उन की गहराई में उतरने का जोखिम नहीं उठाती.

पटकथा के स्तर पर फिल्म बेहद सुस्त है. ढाई घंटे का रनटाइम झेलना एक आम दर्शक के लिए सजा जैसा बन जाता है. शुरुआत में जो तनाव बनना चाहिए था, वह कहानी के ढीलेपन की वजह से पूरी तरह से गायब हो जाता है. कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे सिर्फ समय बिताने के लिए खींचे गए हों. खासकर पुलिस अफसर आदित्य की पत्नी (इशिता दत्ता) वाला ट्रैक तो बेवजह ठूंसा गया है, जहां वह सीधे टास्क फोर्स के कैंप में आ जाती है.

ऐक्टिंग की बात करें तो प्रतीक गांधी ने अपने किरदार को अच्छा निभाया है. एक शांत, संयमित और दिमाग से काम लेने वाले आईपीएस अफसर के रूप में वह सहज लगा है. दूसरी तरफ, अरशद वारसी को एक खूंखार डाकू के रूप में ढालने की कोशिश पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है. अरशद को देख कर खौफ ही नहीं आता, बल्कि हंसी आती है. उस के निभाए पुराने कौमेडी किरदार उस के कैरियर पर हावी हैं, जिसे वह इस फिल्म में तोड़ नहीं पाता.

इस पूरी लचर कहानी में अगर कोई सब से चमकदार किरदार है, तो वह है राजपाल यादव. गैंग से निकाले गए ‘कालिका’ के छोटे से किरदार में राजपाल यादव ने जान फूंक दी है. वह हंसाता भी है और उस के जरिए कहानी में एनर्जी भी आती है. जब भी राजपाल परदे पर आता है, फिल्म को सहारा मिलता है.

तकनीकी रूप से देव अग्रवाल की सिनेमेटोग्राफी शानदार है. बुंदेलखंड के सूखे जंगल, कच्चे मकान और धूलभरे रास्ते असल लगते हैं. लोक संगीत और बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल भी सीन के हिसाब से सही रखा गया है, जहां शोर की जगह सन्नाटे का इस्तेमाल कर के तनाव पैदा करने की कोशिश की गई है.

तिग्मांशु धुलिया इसी तरह की फिल्मों के लिए जाने जाते हैं. इस फिल्म को देख कर ‘पान सिंह तोमर’ की याद भी आती है. बाकी उन की फिल्मों में राजनीति और अपराध केंद्र में रहते हैं जैसे ‘हासिल’ और ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर’ में दिखाया गया. फिल्म में लोकल टोन रखी गई है, जो सुनने में अच्छी लगती है. Ghamasaan Movie Review

 

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