फिल्म समीक्षा:

"मास्टर: खोदा पहाड़ निकली चुहिया"
रेटिंग: दो स्टार
निर्माता :झेवियर ब्रिटो
निर्देशक व लेखक: लोकेश कनगराज
कलाकार: थलापति विजय, विजय सेटुपति, मालविका मोहनन ,अर्जुन दास, अंडे्जा जेरेमियाह, शांतनु भरद्वाज, नासर, रम्या, धीना ,संजीव व अन्य
अवधि :3 घंटे
परिस्थिति वश अपराध करने वाले बच्चों को बाल सुधार गृह में भेजकर यह उम्मीद की जाती है कि यह बच्चे अच्छे नागिन बनकर बाल सुधार गृह से बाहर आएंगे, मगर बाल सुधार गृह से यह बच्चे बहुत बड़े अपराधी बन कर बाहर आते हैं, यह वास्तव में चिंता का विषय है. इसी विषय पर तमिल फिल्मों के मशहूर फिल्मकार लोकेश कनागराज तमिल और हिंदी भाषा में  एक्शन व रोमांचक फिल्म' मास्टर' लेकर आए हैं. अफसोस की बात यह है कि तमिल में 'मानागरम' और 'कैथी' जैसी सुपर डुपर हिट फिल्में दे चुके लोकेश कनागराज इस बार पूरी तरह से चूक गए हैं.
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कहानी:
फिल्म की कहानी शुरू होती है 3 दबंग लोगों द्वारा एक मकान को जलाए जाने से. पता चलता है कि इस जले हुए मकान के अंदर ट्रांसपोर्ट यूनियन के चेयरमैन को भी जिंदा जला दिया गया है. उसके बाद यह तीनों दबंग भवानी से कबूल करवाते हैं कि सिलेंडर फटने से घर में आग लगी. इसके अलावा भवानी पर चोरी का इल्जाम लगाकर बाल सुधार गृह में भिजवा देते हैं. तीनों दबंगों के कहने पर बाल सुधार गृह के वार्डन , भवानी को तरह-तरह की यातनाएं देते हैं.
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उधर भवानी(विजय सेटुपति )इस बाल सुधार गृह से एक बहुत बड़ा अपराधी बन कर बाहर निकलता है और अपने पिता के तीनों हत्यारों को जाकर धमकी देता है. भवानी बाल सुधार गृह के बच्चों को गांजा ,चरस, अफीम, शराब, सिगरेट सब कुछ मुफ्त में मुहैया  कराता है. भवानी जितने भी अपराध करता है, जितनी हत्याएं करता है ,उसका श्रेय किसी न किसी बालक को ही लेना पड़ता है . फिर बालक बाल सुधार गृह में पहुंचकर ऐश की जिंदगी जीता है.इस बार सुधार गृह में कोई भी शिक्षक एक या 2 दिन से ज्यादा टिक नहीं पाता है. उधर एक मशहूर कॉलेज में साइकोलॉजी के प्रोफेसर जेडी(थलापति विजय) से सभी परेशान हैं. प्रिंसिपल भी परेशान हैं.
क्योंकि जेडी शाम 6 बजे के बाद शराब में डूबे रहते हैं पर वह कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए बहुत कुछ अच्छा काम कर रहे हैं जिसके चलते सारे विद्यार्थी उनके इशारों पर कुछ भी करने को तैयार है. एक दिन कॉलेज के प्रिंसिपल जीतू को बताते हैं कि अंकित 3 माह की छुट्टी कबूल कर ली गई है और अब उन्हें बाल सुधार गृह में बच्चों को पढ़ाने जाना है. बाद में पता चलता है कि ऐसा कॉलेज की चारू(मालिका मोहनन) नामक शिक्षिका की करतूत के कारण हुआ है. चारु कभी  एनजीओ के साथ मिलकर बाल सुधार गृह में काम करते हुए सच देख चुकी थी और उन्हें लगा कि इस बाल सुधार गृह के बच्चों को केवल जेडी ही सुधार सकता है.
 बाल सुधार गृह में पहुंचने के बाद कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अब जेडी तथा भवानी आमने-सामने हो जाते हैं. अंततः जे डी के हाथों भवानी की हत्या हो जाती है और जेडी को सजा हो जाती है.
लेखन व निर्देशन:
फिल्म मास्टर देखने के बाद यह एहसास करना मुश्किल हो जाता है कि इस फिल्म के निर्देशक पहले मानागरम और कैथी जैसी फ़िल्मों का लेखन व निर्देशन कर चुके हैं.इसकी कहानी और पटकथा काफी कमजोर है. कहानी को बेवजह रबड़ की तरह तीन घंटे में खींचा गया है .
फिल्म का एक्शन भी अच्छा नहीं बना है. अफसोस की बात यह है कि क्लाइमेक्स से पहले निर्देशक लोकेश ने अपनी पुरानी फिल्म 'कैथी' के एक्शन दृश्य की अति घटिया नकल की है . फिल्म का बीएफ एक्स भी बहुत खराब है. फिल्म 3 घंटे लंबी है, लेकिन जेडी का किरदार  सही ढंग से लिखा नहीं  गया जेडी क्यों शराबी बना, इसके पीछे की क्या कहानी है ? इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है. चारु यानी कि मालविका मोहनन के किरदार को भी सही ढंग से विकसित नहीं किया गया.
अभिनय:
थलापति विजय और विजय सेटुपति दोनों ने अपने अपने किरदारों को पूरी तरह से जीवंतता के साथ जिया है ,मगर अफसोस पूरी फिल्म इतनी घटिया बनी है कि थालापति विजय और विजय सेटुपति दोनों का उत्कृष्ट अभिनय भी इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं दिला सकता.

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