झल्ली पटाका, होर नचदी, साला खड़ूस, आज फिर पीने की तमन्ना है, कमीना है दिल, कुकु माथुर की झंड हो गई, फुकरे, कमीने, बंबू लग गया, हर फ्रैंड कमीना होता है और क्यूतियापा. ये तमाम अश्लील और गालियों के लहजे वाली जबान किसी और की नहीं, बल्कि उस सिनेमा की है जो इन दिनों समाज और समाज की जबान को गालियों भरे डायलौग, हिंगलिश टाइटल की खिचड़ी और स्लैंग भाषा के पैरों तले कुचलने पर आमादा है. शायद इसीलिए आज की फिल्मों के टाइटल, किरदार, थीम और संवाद व गाने के नाम बदजबानी से भरे पड़े हैं. इस से पहले तक तो फिल्मों में सिर्फ अश्लीलता और द्विअर्थी संवादों का रोना था लेकिन अब हिंदी के साथ अंगरेजी के बेस्वाद कौकटेल और गालियों के मौकटेल ने यूथ व टीन जैनरेशन की जबान ही गंदी कर दी है.

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