Women’s Rights: सच यह है कि पहले जो रिश्ते टिके हुए दिखते थे वो टिके नहीं थे, टांके हुए थे. धर्म ने औरत के लिए तलाक को पाप बता दिया था. हिंदू समाज में शादी को एक ऐसा बंधन माना जाता था जिसे आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता था. पति चाहे तो औरत को छोड़ कर दूसरी, तीसरी शादी कर सकता था लेकिन औरत के लिए उस का पति ही परमेश्वर था. पति चाहे जुआरी, शराबी, नपुंसक या हिंसक हो, पत्नी रिश्ते को खत्म नहीं कर सकती थी. आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू की सरकार में हिंदू विवाह अधिनियम बनाया गया, जो 1955 में लागू हुआ. इस में पहली बार हिंदू औरतों को तलाक, अलगाव और विवाह से जुड़े दूसरे कानूनी अधिकार मिले.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के तहत कोई पत्नी क्रूरता, व्यभिचार, पति द्वारा छोड़ दिए जाने पर तलाक मांग सकती है. धारा 13(2) के अनुसार पत्नी को कुछ विशेष परिस्थितियों में तलाक मांगने के आधार दिए गए. इस कानून में 1976 में संशोधन हुआ. विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम 1976 के जरिए आपसी सहमति से तलाक का प्रावधान धारा 13बी में जोड़ा गया.

इस कानून के बावजूद भारत में तलाक की दर दुनिया में सब से कम है, सिर्फ 1 फीसदी. क्या इस का मतलब है कि हमारे रिश्ते सब से अच्छे हैं? जवाब है नहीं. इस का मतलब यह है कि यहां औरत के पास निकलने का दरवाजा आज भी बंद है. समाज, धर्म, परिवार सब कहते हैं, थोड़ा सह लो तो औरतें सहती हैं, घुटती हैं और एक ही कमरे में रहते हुए भी अकेली हो जाती हैं. अब उस अकेलेपन को देख कर कहा जाने लगा है कि फोन की वजह से दूरी है. सच यह है कि फोन से पहले भी दूरी थी, बस वह दिखाई नहीं देती थी. अब कम से कम वह दूरी दिखती तो है.

तकनीक दुश्मन नहीं है, तकनीक तो गवाह है. असली दूरी मोबाइल की स्क्रीन से नहीं, धर्म की उन दीवारों से पैदा होती है जो तय करता है कि पति ऊंचा है, पत्नी नीची है, प्रेम बराबरी नहीं बल्कि समझौता है और शादी प्यार नहीं बल्कि कर्तव्य है. जब तक रिश्तों को धर्म के तराजू पर तोला जाएगा तब तक 2 लोग एक ही बिस्तर पर लेट कर भी अजनबी ही रहेंगे. अगर रिश्ते बचाने हैं तो फोन फेंकने से नहीं, धर्म के बनाए हुए पतिपरमेश्वर और पतिव्रता वाले ढोंग को फेंकना होगा. रिश्ता तब जुड़ेगा जब 2 लोग इंसान की तरह बराबर हो कर जुड़ेंगे, भक्त और देवी बन कर नहीं.

तकनीक ने जातिधर्म की दीवारें तोड़ीं

धर्म ने प्यार की परिभाषा ही बदल दी. प्यार को कर्तव्य बना दिया, अधिकार बना दिया, सेवा बना दिया. मगर कभी बराबरी की बात नहीं की. धर्म ने मां से कहा, तुम ममता की मूर्ति हो तो उस से थकने का हक छीन लिया. पत्नी से कहा, तुम लक्ष्मी हो तो उस से खर्च का हिसाब मांगने का हक छीन लिया. प्रेमिका से कहा, तुम पवित्र हो तो उस से अपनी इच्छा कहने का हक छीन लिया. इन सुंदर शब्दों के पीछे एक ही साजिश थी कि औरत को इंसान से देवी बनाओ ताकि वह शिकायत न कर सके. देवी थकती नहीं, देवी गलती नहीं करती और देवी मना नहीं करती.

अब कानून और तकनीक ने मिल कर इस मूर्ति को जगाया है और उसे इंसान होने का एहसास कराया है. लड़की अब ममता की मूरत नहीं बनना चाहती. वह घर की लक्ष्मी नहीं बनना चाहती. वह किसी परमेश्वर की दासी भी नहीं बनना चाहती. अब लड़कियों को भी बराबरी, न्याय, शिक्षा और सैलरी चाहिए. यह बगावत नहीं, यह इंसान बनने की प्रक्रिया है. जहां औरत इंसान बनती है, वहीं पितृसत्तात्मक धर्म की मौत तय हो जाती है.

तकनीक ने जातिधर्म की दीवारें तोड़ीं, धर्म ने उन्हें सीमेंट किया. एक समय था जब आप जिस से प्यार करते थे, उस से शादी नहीं कर सकते थे क्योंकि पंडित, मौलवी और समाज के ठेकेदारों को आप के प्यार से पहले अपनी पोथी और पगड़ी की चिंता थी.

आज भी जाति और धर्म की आड़ में ही 90 फीसदी औनरकिलिंग को अंजाम दिया जाता है. प्रेम पर इस पहरे के पीछे धर्म खड़ा है, फोन नहीं. फोन ने तो जाति और धर्म की दीवारें तोड़ दी हैं. आज इंस्टाग्राम पर कोई लड़की अपनी पसंद के लड़के को ढूंढ़ लेती है जो पहले उस के गांव में कभी मुमकिन नहीं था. डेटिंग ऐप का डेटा बताता है कि भारत में 56 फीसदी जेनजी अपनी जाति से बाहर डेट करने को तैयार है. यह बदलाव धर्म से नहीं बल्कि टैक्नोलौजी की वजह से आया.

सब से बड़ा झूठ यह है कि पहले परिवार जुड़े हुए थे. जुड़े नहीं थे, डरे हुए थे. दादा का हुक्म, चाचा का डर, बूआ के ताने और रिश्तेदारों की पंचायत. यही तो परिवार था. एकसाथ बैठ कर खाना खाते थे, पर बात कोई नहीं करता था. बाप बेटे से नहीं पूछता था कि तू खुश है या नहीं. बस, कहता था कि नौकरी लगी या नहीं. तकनीक ने इस खामोश खाने को असहज बना दिया. अब बेटा खाने की टेबल पर भी हैडफोन लगाता है तो बाप को लगता है रिश्ता टूट गया. असल में रिश्ता तब भी नहीं था, तब सन्नाटा था. अब कम से कम बेटा हैडफोन में कोई पौडकास्ट सुन कर दुनिया के बारे में जान तो रहा है. पहले तो इस सन्नाटे में सिर्फ आज्ञा चलती थी.

धर्म वाला रिश्ता तो वह था जहां सब साथ दिखते थे पर अंदर से सब अकेले थे. जहां औरत देवी थी पर इंसान नहीं, जहां शादी सफल दिखती थी क्योंकि तलाक लेना मना था. अब तकनीक वाला रिश्ता देखिए, जहां दूर बैठे 2 लोग भी वीडियोकौल पर सच बोल लेते हैं, जहां लड़की कह सकती है, मुझे यह रिश्ता नहीं चाहिए. जहां प्यार कर्तव्य नहीं, चुनाव है. तकनीक ने हमें अकेला नहीं किया. तकनीक ने हमें पहली बार बताया है कि हम कितने अकेले थे?

रिश्तों की टूटन का बोझ औरतों पर क्यों

रिश्तों के टूटने का सारा दोष औरतों पर डालना धर्म का पुराना आविष्कार है. यह कोई इत्तफाक नहीं, बल्कि यह पैटर्न है. जब भी घर टूटता है तो कहानी में एक औरत खलनायक बना दी जाती है. अयोध्या का राज्य टूटा तो नाम आया कैकेयी का और मंथरा का. सवाल किसी ने नहीं पूछा कि दशरथ ने बिना सोचे 3 वरदान क्यों दे दिए थे? पूरी राजसत्ता का संकट एक दासी और एक रानी की साजिश में समेट दिया गया.

ठीक वैसे ही हस्तिनापुर टूटा तो ठीकरा द्रौपदी के एक वाक्य पर फोड़ दिया गया, ‘अंधे का पुत्र अंधा.’ जबकि सच यह है कि द्रौपदी का चीरहरण एक भरी सभा में हुआ था, दांव पर उसे लगाने वाला उस का पति था. युद्ध की नींव तो बहुत पहले शकुनि के पासों और धृतराष्ट्र के मोह ने रख दी थी. लेकिन धर्मकथा ने आसान रास्ता चुना कि औरत ने जबान चलाई, इसलिए महाभारत हुआ.

धर्म ने ही सिखाया है कि औरतें चालबाज होती हैं. मनु स्मृति, बाइबिल या कुरान में औरतों के बारे ऐसी ही बातें लिखी हैं. आज अगर रिश्तों के टूटने की जिम्मेदारी तकनीक पर डाला जा रहा है तो सवाल यह है कि धर्म ने रिश्तों को जोड़ने के लिए क्या किया? धर्म का सारा जोर परलोक सुधारने पर है लेकिन परलोक का यह लालच भी सिर्फ इंडिवीजुअल के लिए है वहां कोई भाई, बाप, बहन, मां का रिश्ता नहीं है. हां, गरुण पुराण जैसे ग्रंथों में औरतों के सती हो जाने के बाद पति के साथ स्वर्ग में रहने की बात जरूर है. इसलाम में भी औरत अगर खूब नेकी करे तो वह जन्नत में अपने पति की रखैलों की सुपरवाइजर बन कर इनाम पा सकती है.

यही पैटर्न हर धर्मग्रंथ में कौपीपेस्ट है. मनु स्मृति में लिखा है, स्त्री कभी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं. बाइबिल में इव को पहले पाप की जड़ बताया गया. कुरान में औरत को खेत कहा गया. मकसद एक ही था. अगर रिश्ता टूटे, परिवार बिखरे तो दोष व्यवस्था पर न आए, पुरुष पर न आए बल्कि दोष औरत पर जाए क्योंकि औरत को दोषी बनाना सस्ता है और व्यवस्था को बदलना महंगा.

परलोक की व्यवस्था में भी औरतों के साथ धोखा

धर्म का पूरा बिजनैस मौडल ही परलोक पर टिका है. इहलोक के रिश्ते औरत के लिए सिर्फ सीढ़ी हैं. गरुड़ पुराण खोलिए, आप को पन्ने के पन्ने मिलेंगे कि पति के मरने पर सती होने से पत्नी को पति के साथ स्वर्ग में कितने हजार साल रहने को मिलेगा? यानी, औरत के जीते जी उस के सुख की कोई बात नहीं, मरने के बाद भी उस का इनाम यही है कि वह फिर उसी पति के साथ रहे जिस ने उसे जीवनभर दबा कर रखा. किसी भी धर्म में नारी के अपने स्वर्ग की कोई कल्पना नहीं.

इसी तरह इसलामिक कथाओं में नेक औरत के लिए जन्नत का जो सब से बड़ा इनाम है वहयह कि वह वहां अपने शौहर की हूरों की सरदार बन जाएगी. सोचिए, दुनिया में उस ने पूरी जिंदगी सौतन का दर्द सहा, परदा किया, खिदमत की और आखिरत में उसे इनाम क्या मिला? वही पति और उस की रखैलों की निगरानी? यह कैसा जोड़ना हुआ? यह तो गुलामी का स्थाई कौन्ट्रैक्ट है. इस कौन्ट्रैक्ट में मां, बहन, बेटी, पिता का कोई अपना स्वतंत्र रिश्ता नहीं बचता. सब रिश्ते एक पुरुष के इर्दगिर्द घूमते हैं. बेटी बाप की इज्जत है, पत्नी पति की जायदाद है, मां बेटे के स्वर्ग की चाबी है. औरत का अपना कोई रिश्ता नहीं, वह हमेशा किसी के रिश्ते से पहचानी जाती है.

धर्म कभी भी 2 लोगों के बीच बराबरी का पुल नहीं बना पाया. उस ने हमेशा रिश्तों को वर्टिकल बनाया. ऊपर पुरुष, नीचे स्त्री. ऊपर सास, नीचे बहू. ऊपर बड़ा भाई, नीचे छोटी बहन. और जब भी वर्टिकल रिश्ता होता है तो उस में प्यार नहीं, डर चलता है. सम्मान नहीं, आज्ञा चलती है. सो, हमारे घरों में लोग एकदूसरे से बात नहीं करते, फरमान सुनते हैं.

तकनीक पर दोष डालना इसलिए आसान है क्योंकि तकनीक नया है और धर्म पुराना. फोन हाथ में दिखता है, धर्म दिमाग में नहीं दिखता. लेकिन डेटा कहता है कि जिन घरों में धर्म का दखल सब से ज्यादा है, वहीं औरतों की हालत सब से खराब है. थौमसन रौयटर्स फाउंडेशन के सर्वे में भारत को औरतों के लिए दुनिया का सब से खतरनाक देश बताया गया था. वजह, धर्म नहीं तो क्या था? क्या मोबाइल ने दहेज हत्या सिखाई? एनसीआरबी कहता है हर दिन 19 दहेज हत्याएं होती हैं. यह कौन सा ऐप सिखा रहा है?

औरत की आजादी से हिली धर्म की इमारत

जबजब औरत ने अपना मुंह खोला है, तबतब रिश्ता टूटा नहीं, रिश्ते में पहली बार बराबरी आई है. सावित्री बाई फुले ने जब स्कूल खोला तो कहा गया वे परिवार तोड़ रही हैं. रुकैया सखावत हुसैन ने जब मुसलिम लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो कहा गया वे समाज तोड़ रही हैं. आज जब कोई लड़की कहती है मैं लिवइन में रहूंगी तो कहा जाता है वह संस्कृति तोड़ रही है. असल में वह संस्कृति नहीं बल्कि अपनी युगों पुरानी जंजीर तोड़ रही है.

कोई भी रिश्ता पवित्र नहीं होता, सारे रिश्ते मानवीय होते हैं. मानवीय रिश्तों का सीधा मतलब यह होता है कि ये रिश्ते टूट सकते हैं, बन सकते हैं और बातचीत से ठीक भी हो सकते हैं. धर्म ने रिश्तों को पवित्र बना कर उन्हें अटूट होने का श्राप दे दिया. अटूट का मतलब हो गया कि चाहे मारो, पीटो, गाली दो, रिश्ता तोड़ना पाप है. तकनीक ने पहली बार कहा कि नहीं, कोई भी रिश्ता पवित्र नहीं होता बल्कि सहमति से बनता है. सहमति खत्म, तो रिश्ता खत्म. यह बात पितृसत्ता को सब से ज्यादा चुभती है. सो, अगर कोई कहे कि रिश्ते मोबाइल ने तोड़े हैं तो उस से पूछिए कि धर्म ने कौन सा रिश्ता बनाया था जहां औरत इंसान थी?

ध्यान दीजिए, हर कथा में आदर्श औरत वही है जो सहती है. सीता ने अग्निपरीक्षा दी, फिर भी वनवास दिया गया, मगर वे चुप रहीं. गांधारी ने अपने अंधे पति की खातिर जीवनभर आंखों पर पट्टी बांधी. सावित्री ने यमराज से पति के प्राण वापस लिए. इन कहानियों को औरत के त्याग की मिसाल साबित करने के लिए पढ़ाया गया लेकिन सच बात यह है कि इन कथाओं के भीतर एक खतरनाक संदेश छिपा था कि रिश्ता बचाने की पूरी जिम्मेदारी औरत की है. पुरुष गलती करेगा और औरत उस गलती को अपने त्याग से सुधारेगी. पुरुष छोड़ देगा, फिर भी औरत उस पति का जिंदगीभर इंतजार करेगी.

इस का नतीजा क्या हुआ? रिश्ते में 2 बराबर के लोग रहे ही नहीं. एक कर्ता रहा और एक भोक्ता हो गया. एक फैसले लेता रहा और दूसरा भुगतता रहा और जब किसी भुगतने वाली ने थक कर कहा कि अब नहीं सहना तो धर्म ने तुरंत उसे कुल्टा और चरित्रहीन घोषित कर दिया. सोचिए, तलाक के लिए हिंदू ग्रंथों में एक ही शब्द है- परित्यक्ता. यह शब्द सिर्फ औरतों के लिए क्यों है? परित्यक्त पुरुष क्यों नहीं होता? क्योंकि धर्म ने मान ही लिया है कि छोड़ने का अधिकार सिर्फ पुरुष के पास है और परित्यक्त होने का ठेका औरत के पास.

अब इसी धार्मिक ठेके को तकनीक ने तोड़ा है. लड़की के हाथ में जब अपना पैसा आया, अपना फोन आया, अपनी पढ़ाई आई तो उस ने पहली बार पूछा कि मैं क्यों सहूं? और यहीं से धर्म को तकनीक से दिक्कत शुरू हुई. असली दिक्कत फोन की लत से नहीं, फोन की आजादी से है क्योंकि वही लड़की जो पहले सास के ताने सुन कर रोती थी, अब यूट्यूब पर सर्च करती है कि क्या सास द्वारा ताना मारना घरेलू हिंसा है. वही लड़की जो करवाचौथ को भूखे रहना समय की जरूरत समझती थी, अब गूगल करती है कि व्रत का वैज्ञानिक आधार क्या है.

 

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