Religion and Patriarchy: धर्म की एक और चालाकी देखिए. धर्म ने कभी भी रिश्तों को सुधारने के लिए औरत को ज्ञान नहीं दिया बल्कि उसे ढेर सारी पूजा, उपासना और व्रत दिया. पति शराबी है तो पत्नी व्रत रखे. पति बेरोजगार है तो पत्नी पूजा करे. पति हिंसक है तो पत्नी कथा सुने. यानी, बीमारी कहीं और जबकि इलाज औरत के शरीर पर. गरुड़ पुराण से ले कर तमाम व्रत कथाओं तक में यही ढकोसला है. पति को स्वर्ग (यदि कहीं हो तो) भेजने के लिए पत्नी भूखी रहे, प्यासी रहे, सती हो जाए. कभी किसी ग्रंथ में यह नहीं लिखा कि पत्नी के सुख के लिए पति व्रत रखे.

जब आज कोई कहता है कि पहले रिश्ते ज्यादा मजबूत थे तो उस से पूछिए कि किस के लिए मजबूत थे? उस औरत के लिए जो 13 से 16 साल की उम्र में ब्याह दी गई और 60 साल तक कभी अपनी पसंद का खाना भी नहीं मांग पाई?

उस मजबूत रिश्ते की कीमत किस ने चुकाई? तकनीक ने कोई आदर्श रिश्ता नहीं बनाया लेकिन उस ने पहली बार रिश्ते की कीमत चुकाने वाले को बोलने का माइक थमा दिया और माइक हाथ में आते ही पता चला कि धर्म की कहानी में कैकेयी, मंथरा, द्रौपदी और शूर्पणखा जैसी जो विलेन औरतें थीं असल में वे विलेन नहीं थीं बल्कि वे पहली औरतें थीं जिन्होंने अपनी मरजी से कुछ मांगने की हिम्मत की थी. धर्म ने उन्हें खलनायिका बना दिया क्योंकि अगर वे नायिका बन जातीं तो पितृसत्ता की पूरी कहानी ही पलट जाती. Religion and Patriarchy

 

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