Hindi Story: “बताओ न मां, मैं जानती हूं, आप के पास नहीं थे पैसे और भाई भी अभी परेशान चल रहा है.” अंजू को अपनी चोटों से अधिक हौस्पिटल के खर्चों की परवा थी. वह जानती थी कि 5 महीने पहले हुई उस की शादी में मां की सारी जमापूंजी खर्च हो चुकी है और 2 महीने पहले ही भैया की कंपनी में छंटनी के दौरान उन की नौकरी जा चुकी है. ऐसे में उन के अपने खर्चे ही नहीं पूरे हो रहे. उस की आंखों में चिंता के भाव थे.

“तन्वी ने सब किया है, बेटा. हमारे तो हाथपांव फूल गए थे तेरे एक्सिडैंट की खबर सुन कर.” मां के मुंह से भाभी का नाम सुनते ही अंजू कुछ चौंकी और फिर भावशून्य हो कमरे की छत निहारने लगी. वह मां से क्या कहे, उसे समझ नहीं आ रहा था.

अभी थोड़ी देर पहले जब उसे होश आया था तो उस ने मां को देखा था.

“अंजू, अब कैसा लग रहा है, बेटा?” अचेत सी अवस्था में पड़ी अंजू अपने नाम की पुकार सुन मानो किसी गहरी नींद से उठी थी.

“ठीक हूं, मां. सिर बहुत भारीभारी सा हो रहा है और दर्द है. मुझ से तो उठा भी नहीं जा रहा,” माथे पर बाईं ओर हाथ फिराते हुए बेहद कमजोर स्वर में अंजू कराह उठी.

“उधर न छुओ बेटा, टांके लगे हैं, इसीलिए दर्द हो रहा है. देखना जल्दी ही ठीक हो जाओगी. मेरी बहादुर बेटी.” बेटी को होश में आया देख मां की आंखों में दुनियाभर का प्यार उमड़ आया.

“मैं यहां कैसे आई, कौन लाया मुझे और शेफाली कैसी है?”

“ठीक है वह, उसे ज्यादा चोट नहीं लगी. घर चली गई है. उसी ने फोन किया था हमें, तभी खबर हुई थी. परेश को भी बता दिया है पर उस की एक बहुत जरूरी मीटिंग है, इसलिए आ नहीं पाया अभी. परसों तक आ जाएगा. तुम बिलकुल चिंता न करना.”

“और मेरे इलाज का खर्च, कैसे इंतजाम किया आप ने?” अंजू चिंतित स्वर में बोली.

“तुम अभी यह सब न सोचो. ठीक हो जाओ, बस. जल्दी से. हम सभी तो बहुत घबरा गए थे.” सुनीता की आंखों के कोर गीले हो चले. तब मां ने बताया उस की भाभी तन्वी ने पैसे दिए.

34 वर्षीय सौफ्टवेयर इंजीनियर अंजू लोअर मिडिल क्लास से आती थी, घर में मां और एक छोटे भाईभाभी के अतिरिक्त कोई न था. पिता 2 साल पहले ही एक रोड एक्सिडैंट में सब को छोड़ कर जा चुके थे.

यों तो अंजू एक पढ़ीलिखी, समझदार लड़की थी पर पता नहीं क्यों 5 साल पहले शादी कर घर में आई छोटे भाई की पत्नी तन्वी से उस की कभी नहीं बनी. हालांकि, तन्वी एक संस्कारी और खुशमिजाज लड़की थी जिस ने आते ही घर में सभी का मन मोह लिया था. उस के आने से घर में रौनक सी हो गई थी लेकिन तन्वी को उस की सारी अच्छाइयां सिर्फ दिखावा लगतीं. वह खुद जौब करती थी, लिहाजा, उस को वह बिलकुल नकारा समझती थी. जबकि, ऐसा नहीं था.

तन्वी ने नृत्यकला में ग्रेजुएशन किया था. घर के कामों के अतिरिक्त वह घर में ही बच्चों की डांस क्लास भी लेती थी पर अंजू के लिए उस का काम व उपस्थिति दोनों ही सदा नगण्य रहे.

सासबहू सीरियल देखदेख कर उस के दिमाग में भी भाभी की एक खौफनाक तसवीर बन गई थी. उन सीरियलों के केंद्र में हरेक में भाभी ही होती थी जो हर तरफ से ननद को परेशान करती थी, ननद की दुश्मन होती थी.

मम्मी सुनीता उसे बहुत समझातीं पर अंजू तन्वी का नाम सुनते ही भड़क उठती. ‘जब देखो तन्वीतन्वी, जाने क्या जादू किया है इस तन्वी ने आप लोगों पर?’ सुनीता बेचारी चुप हो कर रह जाती. उसे समझ न आता इतनी प्यारी हंसमुख लड़की से भला किसी को क्या रागद्वेष हो सकता है.

दरअसल, अंजू की शादी अभी तक नहीं हुई थी. ऐसा नहीं था कि उस में कोई कमी थी या वह शादी नहीं करना चाहती थी लेकिन अपने को सब से बेहतर समझने वाली अंजू ने अपनी शादी के लिए आए रिश्तों में इतनी कमियां निकालीं कि हर जगह बात बनतेबनते रह गई. हार कर माता ने उस से पहले उस के छोटे भाई नितिन की शादी कर दी और इस तरह तन्वी उस की भाभी बन कर आ गई. सालभर में ही उस की गोद में नन्ही परी के आने से उस का मातृत्व भी खिल उठा, जिस से उस के संपूर्ण व्यक्तित्व में चारचांद लग गए.

जो अंजू अभी तक घरवालों की केंद्रबिंदु थी, सब की लाड़ली थी, अचानक तन्वी के आ जाने से वह अपने अस्तित्व को घर में बौना समझने लगी. ऊपर से अपने से 5 साल छोटी तन्वी की खुशहाल शादीशुदा जिंदगी भी उस से नहीं देखी जाती. हालांकि यह सिर्फ अंजू का भ्रम था. मां, पिता व भाई का उस के प्रति वही प्यारभरा रवैया था जो पहले हुआ करता था और तन्वी भी उसे बहुत इज्जत देती थी.

लेकिन अपने भीतर के खालीपन से जूझती अंजू तन्वी का सुख देख कर मन ही मन उस से जलने लगी थी. लिहाजा, हमेशा ही उसे नीचा दिखाने की कोशिश करती.

समझदार तन्वी अंजू के पद व उम्र की गरिमा का मान रख कर अकसर उस की बातों को सह जाती पर इस बार करवाचौथ वाले दिन जब अंजू ने उस पर रुपयों की चोरी का इलजाम लगाया तो वह बरदाश्त न कर सकी.

बरसों बाद आखिर उस का मौन मुखर हो उठा, ‘दीदी, आप पद, प्रतिष्ठा और उम्र में मुझ से बड़ी हैं, इस का यह मतलब नहीं कि जब जी चाहे मेरे ऊपर झूठे आरोप मढ़ दें. मेरे चरित्र पर उंगली उठाएं. मैं ने कह दिया है कि मैं ने आप के रुपए नहीं लिए, मतलब, नहीं लिए. आप को विश्वास हो तो ठीक है वरना जो भी सोचना हो सोचें, मुझे फर्क नहीं पड़ता.’ तीखी सी प्रतिक्रिया दे तन्वी अपने कमरे में चली गई थी.

‘देखा आप ने, बहुत सीधी कहती थीं न इसे? किस तरह से मुझ से बात कर रही थी. लेकिन आप को क्या, आप की तो लाड़ली बहू है.’ तन्वी की दोटूक सुन कर अंजू तिलमिला गई थी.

‘इस की शुरुआत तुम ने ही की है अंजू. अगर वह कह रही है कि उस ने रुपए नहीं निकाले तुम्हारी अलमारी से तो नहीं लिए होंगे. वह झूठ क्यों बोलेगी?’

‘आप का मतलब झूठ मैं बोल रही हूं?’ मां द्वारा तन्वी की साइड लिए जाने पर अंजू और चिढ़ गई.

‘मैं ने ऐसा नहीं कहा. हो सकता है कहीं और रुपए रख कर तुम भूल गई हो. मुझे उस पर पूरा विश्वास है,’ सुनीता ने दृढ़ता से कहा.

‘आप के इसी प्रोत्साहन ने उस की हिम्मत को बढ़ाया है. मगर आप सोच कर देखो, उस के पास 20 हजार रुपए आखिर आए कहां से?’

‘उस ने बचा कर रखे थे और क्या.’

‘वाह, कमाई धेले भर की नहीं और चली हैं बचत करने.’

‘क्यों, कभी उस के मायके से मिलते हैं, कभी नितिन देता है घर के खर्चों के लिए. और फिर, उस की डांस क्लास से भी तो कुछ कमाई होती है. तो अपने शौक पर सब खर्च न कर के यदि वह समझदारी से उस में से कुछ बचा कर, छिपा कर जोड़ लेती है तो तुम्हें तकलीफ क्या है?’

‘तकलीफ मुझे नहीं, आप लोगों को होगी एक दिन. और बढ़ावा देते रहो. एक दिन सब छिपा कर अपने मायके पहुंचा देगी. उसे खानापानी मिलता है न, तो रुपए जोड़ कर, छिपा कर रखने की क्या जरूरत है. यहां भूखी तो नहीं मर रही है वह.’

‘कुछ तो सोचसमझ कर बोलो, अंजू. मत भूलो, अपनी भाभी के बारे में बात कर रही हो. खुद तुम जौब करती हो लेकिन उस के बाद भी खाली हाथ ही रहती हो. घर के खर्चों में भी हाथ नहीं बंटाती. वह जो भी जैसे भी हो, थोड़ेबहुत जमा करती है और जरूरत पड़ने पर मुझे मदद करती है. तो पैसे छिपाए या खर्च करे, तुम्हें उस से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. और हां, आइंदा से उस के बारे में कुछ भी गलत कहा तो मुझ से बुरा कोई न होगा.’ सुनीता ने उसे सख्त स्वर में ताकीद की.

‘भाभी, माय फुट, अगर इतनी ही अच्छी लगती है वह तो अपनी पूरी जायदाद उस के नाम लिख दो.’ अंजू को मम्मी द्वारा तन्वी की तरफदारी करना बहुत अखर रहा था.

वास्तव में उसे इस बात की चिढ़ थी कि तन्वी के पास इतने रुपए कैसे जमा हो गए. अपनी 50 हजार रुपए की सैलरी में वह ज्यादा कुछ नहीं बचा पाती अपने खुले हाथ की वजह से. इधर तन्वी ने घर में रह कर छिपतेछिपाते इतनी बड़ी रकम जमा कर ली और आज जरूरत होने पर मां को देने जा रही थी.

हालांकि अलमारी में रखे उस के वे रुपए भी बाद में उसे वहीं कपड़ों की तह के नीचे रखे मिल गए थे जिन की चोरी का इलजाम उस ने तन्वी पर लगाया था पर स्वयं झूठी साबित न हो जाए, यह सोच कर उस ने किसी से इस का जिक्र तक न किया.

अंजू सोचती जा रही थी कि उस ने तन्वी के साथ आज तक कितना गलत व्यवहार किया, उस पर कैसेकैसे इलजाम लगाए. अपनी जलन में अंधी हो कर उस की सभी अच्छाइयों को दरकिनार करती चली गई. आत्मग्लानि में डूबी अंजू बहुत देर तक भाभी के प्रति किए अपने व्यवहार का आकलन करती रही. उस के इतने गलत व्यवहार के बाद भी तन्वी ने कितना बड़ा दिल दिखाया.

दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद भी उसे ठीक से याद न आ रहा था कि कैसे उस का एक्सिडैंट हुआ, कैसे वह वहां लाई गई. बस, इतना याद था कि उस दिन वह और उस की दोस्त शेफाली फिल्म देखने के बाद शौपिंग कर घर लौट रही थीं. वही एक्टिवा ड्राइव कर रही थी कि सामने से एक डौग आ गया. उसे बचाने के लिए वह अपनी साइड से जरा सी हटी कि पीछे से आती जीप से उस की एक्टिवा टकराई और उस के हाथों से छिटक कर दूर जा गिरी और वह सीधे रोड से रगड़ खाते हुए जीप के सामने लुढ़क गई.

यह जीप के ड्राइवर की ही खूबी थी कि उस ने तुरंत ब्रेक लगाते हुए उसे पहियों के बीच आने से बालबाल बचा लिया. पहियों के अचानक रुकने व हौर्न की तेज आवाज व स्वयं के गिरने की धमक सुनतेसुनते उस के कान सुन्न हो कर आंखें मुंदने लगी थीं.

2 दिनों बाद जब उसे होश आया तो सिर और माथे पर हो रहे असहनीय दर्द के साथ वह अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी और अब मां से बात होने पर वह इस सच को स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि तन्वी के कारण ही उस का इलाज संभव हो पाया. सच कितना बड़ा दिल दिखाया है तन्वी ने. यहां तक कि नितिन ने भी उसे कभी कुछ न कहा. जबकि तन्वी के प्रति दीदी का रवैया उस से छिपा न था.

उसे याद आया 6 महीने पहले जब औफिस में काम करने वाले परेश को पसंद कर उस ने उस से शादी करने की इच्छा जाहिर की थी तो मां ने साफ मना कर दिया था क्योंकि परेश गैर व छोटी जाति का था. तब उस ने खुद तन्वी को मां को समझाते हुए सुना था कि दीदी की खुशी को सर्वोपरि मान कर हमें शादी कर देनी चाहिए क्योंकि परेश एक अच्छा लड़का है और दोनों की खुशी जातिधर्म से ऊपर है.

तब भी वह यह समझी थी कि तन्वी यह इसलिए कर रही है क्योंकि वह चाहती है कि जैसे भी हो वह अपने घर से निकल जाए ताकि तन्वी महारानी की तरह पूरे घर पर राज कर सके.

“सुनिए, ये दवाएं लेनी हैं आप को और बीपी वगैरह भी चैक करना है,” कमरे में आई नर्स की आवाज ने अंजू की तंद्रा भंग की.

“जी” कहते हुए नर्स की सहायता ले कर हलकी कराह के साथ वह तकिए के सहारे अधलेटी सी हो गई.

“बहुत दर्द है न, आप को. पूरी तरह ठीक होने में कुछ समय लगेगा. सिर में लगी चोट बहुत गहरी है. बस, अपनों का प्यार ही समझिए जिस ने आप को बचा लिया. यदि थोड़ी और देर होती आप को लाने या इलाज में तो कुछ भी हो सकता था. आप के अपने बहुत चाहते हैं
आप को.”

“जी, सो तो है,” वह धीरे से मुसकरा दी. सच तो कह रही है नर्स. तभी तो इतना प्यार करने वाले रिश्ते हैं उस के जीवन में. परेश भी तो कितना चाहता है उसे. वह तो कंपनी के काम से थाईलैंड गया है वरना तो यहां से हिलता भी न. वह इंटैलिजैंट होने के साथ एक अच्छा इंसान भी है. थैंक्यू तन्वी, अगर तुम मां को न समझातीं तो मुश्किल था हमारा साथ होना. दिल ही दिल में उस ने पहली बार तन्वी के लिए अच्छा सोचा.

वास्तव में, कितनी गलत थी वह. जब नजरिया ही नकारात्मक हो तो अच्छी से अच्छी बात भी बुरी लगती है और यही उस के साथ हो रहा था. तन्वी को अपना प्रतिद्वंदी मान उस ने उस की एक गलत छवि अपने मन में बना ली थी और उसे ही ढोए जा रही थी. उस से बेहतर दिखने की होड़ में उस से नफरत करती जा रही थी, उसे नीचा दिखाती जा रही थी.
आज उस के दिमाग पर पड़े जाले साफ होने की प्रक्रिया में थे. कुछ ही देर में दवाओं के असर से अंजू को गहरी नींद ने आ घेरा.

शाम को माथे पर किसी के कोमल हाथों का स्पर्श पा अंजू ने आंखें खोलीं. सामने तन्वी बैठी थी. सूनी आंखों से तन्वी को निहारते हुए आज उस ने पहली बार उस पर भरपूर नजर डाली. दूध सी धुली रंगत पर दो निष्पाप आंखें. हाय आज तक कैसे न उसे तन्वी की मासूमियत नजर आई.

“कैसी हो दीदी?” तन्वी ने उस का हाथ अपने हाथों में थाम लिया. जाने क्यों अंजू का जी चाहा कि उठ कर तन्वी को गले लगा ले पर कुछ कमजोरी और शर्मिंदगी के कारण वह ऐसा न कर सकी.

अपने झूठे अभिमान के चलते उस ने इतने सुंदर रिश्ते की मानो बलि चढ़ा दी. अचानक ही उसे लगा कि तन्वी के प्रति बरसों से उस के भीतर जमी बर्फ पिघलने लगी है. वह अपनेआप को आधिक देर संयत न रख सकी और फफक कर रो पड़ी.

रे, क्या हुआ दीदी, मुझ से फिर कोई गलती हुई क्या?” पहली बार अंजू को इस तरह रोते देख तन्वी घबरा गई.

“नहीं तन्वी, आज पहली बार मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा है. मैं ने तुम्हारे साथ कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया, कभी तुम्हें इज्जत नहीं दी. फिर भी तुम ने सदा ही मेरा भला चाहा.”

“अरे, यह वक्त इन बातों का नहीं है. और वैसे भी, आप मुझ से बड़ी हैं. अगर कुछ कह भी दिया तो मुझे भला क्यों बुरा लगेगा?” उस ने तुरंत खड़े हो कर दीदी को सहारा दिया, उन के आंसू पोंछे.

“नहीं, वास्तव में बड़ी तो तुम हो जिस ने इतनी गलतियों के बावजूद बड़ा दिल रख कर मुझे माफ कर दिया है. मैं ने जिस पैसे की खातिर तुम्हें अपमानित किया, तुम्हारी उसी बचत की आदत ने आज मुझे बचा लिया. सौरी तन्वी, मैं ने तुम्हें समझने में बड़ी भूल की.

“तन्वी, असल में हम बेटियों को इतनी बार पराया कहा जाता है कि हम अपने ही पेरैंट्स के घर में इनसिक्योर हो जाते हैं. सारे पंडित, मुनि, स्वामी और कहानीकिस्से बेटियों को ससुराल भेजने में लगे रहते हैं. पेरैंट्स और भाइयों पर हमारी नहीं चलती तो हमारा गुस्सा भाभियों पर उतरता है जिन पर भाई झिड़कना शुरू कर देता है.

तन्वी, दोष तुम्हारा या हमारा नहीं, उस पूरे समाज का है जो हमें लगातार गलत पाठ पढ़ा रहा है. मुझे माफ कर दो, मैं यह साजिश समझ न पाई,” अंजू के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

“दीदी, बस करें आप. मैं ने ऐसा
कुछ नहीं किया. बस, अपनी ड्‍यूटी निभाई है.”

“आज मुझे कह लेने दो, तन्वी. शुक्रिया अदा करना चाहती हूं तुम्हारा. जीना चाहती हूं जिंदगी के उन पलों को तुम्हारे साथ जो मैं ने अपनी झूठी अकड़ में मिस कर दिए.”

“तो फिर उदासी की यह चादर उतार फेंकिए और मेरे साथ मस्ती के लिए तैयार हो जाइए क्योंकि आप की सभी रिपोर्ट्स नौर्मल आई हैं. बस, एकदो दिन में आप डिस्चार्ज हो जाएंगी,” तन्वी ने प्यार से अंजू के माथे को चूमते हुए कहा. बदले में अंजू ने तन्वी का हाथ पकड़ कर उसे चूम लिया.

ई, अपनी खुशी में दोनों हमें न भूल जाना,” नितिन की यह आवाज सुन कर दोनों ने चौंक कर देखा तो वह आशी को गोद में लिए दरवाजे पर खड़ा हंस रहा था. “सच दीदी, जल्दी से ठीक हो जाओ, मां घर पर बेसब्री से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं.”

“और फिर जीजाजी भी तो परसों आने वाले हैं. उन के स्वागत की तैयारी भी तो करनी है. है न दीदी?” तन्वी ने इस तरह शरारतभरे अंदाज में पूछा कि अंजू शरमा गई.

“मम्मा, मैं भी बूआ को पारी करूंगी.” नन्ही आशी अपनी तोतली आवाज में बोलते हुए बूआ के ऊपर झुकी जा रही थी. यह देख कर सब हंस पड़े.          l

 

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