Election Commission of India: लोकतंत्र में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि हर योग्य नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना भी है. लेकिन दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान लगभग 43 लाख मतदाताओं का अचानक लापता हो जाना लोकतंत्र की बुनियाद पर गंभीर सवाल खड़े करता है. आखिर ये मतदाता कहां गए? क्या लाखों लोग अचानक दिल्ली छोड़कर चले गए, या चुनाव आयोग ने जानबूझ कर उन्हें उनके मताधिकार से दूर कर दिया?
28 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से न सिर्फ यह सवाल पूछा बल्कि जमकर फटकार भी लगाई है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आयोग से दो टूक कहा कि दो हफ्ते में उन 43 लाख लोगों को खोजिए, उनकी सूची प्रकाशित कराइये और उन्हें फॉर्म-6 के साथ फॉर्म-8 के जरिए भी नाम जुड़वाने का अवसर दीजिये.
गौरतलब है कि दिल्ली में पुनरीक्षण की शुरुआत में लगभग 1.45 करोड़ मतदाता थे. इनमें करीब 97 लाख ने गणना प्रपत्र जमा किए, जबकि लगभग 47 लाख ने ऐसा नहीं किया. आयोग ने करीब दो लाख मतदाताओं को मृतक और लगभग 43 लाख को स्थायी रूप से स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया. इनमें 31.59 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित और करीब 11 लाख लोग लापता बताए गए. इसके अलावा 33 लाख मतदाताओं का वर्ष 2002 की सूची से मिलान नहीं हुआ और 19.34 लाख को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की श्रेणी में रखा गया.
सवाल है कि इस श्रेणी का आधार क्या है? न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ को कभी अंतिम न्यायिक मंजूरी नहीं दी. बिहार एसआईआर का फैसला भी इसका कानूनी आधार नहीं बन सकता, क्योंकि वहां इस श्रेणी पर विचार ही नहीं हुआ था.
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि पहले से मतदाता रहे नागरिकों को दोबारा नाम जुड़वाने के लिए नए मतदाता वाला फॉर्म-6 भरने पर क्यों मजबूर किया गया? क्या एक प्रपत्र जमा नहीं करने से किसी नागरिक का मताधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है?
चुनाव आयोग का कहना है कि नाम जुड़वाने का रास्ता बंद नहीं हुआ है. लेकिन सवाल यह है कि जब लाखों नामों पर संकट है, तो जिम्मेदारी मतदाताओं पर क्यों डाली जाए?
सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को दो सप्ताह का समय देते हुए सूची प्रकाशित करने और आवेदन की प्रक्रिया खुली रखने को कहा है. अब जरूरत सिर्फ आंकड़ों की सफाई की नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की है. क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई सरकारी खानापूर्ति नहीं, जनता के अधिकारों का दस्तावेज है. 43 लाख मतदाताओं का हिसाब देना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है.
न्यायमूर्ति बागची ने इस मामले का मूल सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा कि मतदान का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है और चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह पूरी सावधानी और उचित परिश्रम के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे. Election Commission of India




